: सकुनी और कुमियां नदियों के पावन संगम पर स्थित सैज गाँव का वह स्वयंभू धाम, जहाँ दावाग्नि से झुलसे नागों को महर्षि कपिल की समाधि से मिली थी मुक्ति; स्कन्दपुराण के मानसखण्ड में दर्ज ‘कपिल-क्षेत्र’ की विस्मयकारी गाथा।
विशेष खोज रिपोर्ट | रमाकान्त पन्त
देवात्मा हिमालय के सघन वक्षस्थल और कुमाऊं मण्डल की सुरम्य पर्वतमालाओं के बीच अल्मोड़ा जनपद का यह अंचल केवल प्राकृतिक सौंदर्य का ही नहीं, बल्कि सनातन चेतना के अनगिनत अनसुलझे रहस्यों का भी केंद्र रहा है। जनपद मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर क्वारब पहुँचकर जब मौना-सरगाखेत मार्ग पर बढ़ा जाए, तो मुख्य सड़क से करीब साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी पर बसा सैज गाँव अचानक एक ऐसे मौन, प्राचीन देवलोक में प्रवेश करा देता है जहाँ कदम रखते ही आधुनिक समय ठहर जाता है।
यहाँ चीड़ और देवदार के गगनचुंबी वृक्षों, विविध पुष्प-लताओं और पर्वत शिखरों की गोद में स्थित है भगवान शिव का अति-प्राचीन तीर्थ—कपिलेश्वर महादेव। दो पहाड़ी सरिताओं—सकुनी नदी और कुमियां नदी के पावन मध्य में बसा यह देवालय सदियों से दया, करुणा और अलौकिक कल्याण के धाम के रूप में पूजा जाता रहा है।
कत्यूरी स्थापत्य का चमत्कार और स्वयंभू पिंडी का रहस्य
शिव-भक्त कत्यूरी वंश के प्रतापी नरेशों द्वारा निर्मित यह मंदिर पाषाण स्थापत्य की दृष्टि से बेजोड़ और अलौकिक है। पत्थरों को तराशकर बिना किसी आधुनिक बंधक सामग्री के गढ़ा गया यह देवालय कत्यूरी कालीन नागर शैली का जीवंत प्रमाण है।
मंदिर के आस्थावान भक्त गोपाल सिंह खत्री बताते हैं कि यहाँ का नैसर्गिक और आध्यात्मिक सम्मोहन अनायास ही श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींच लेता है। कल-कल नाद करती सकुनी और कुमियां नदियाँ मानो कपिलेश्वर के चरणों को नतमस्तक होकर पखारती हुई आगे बढ़ती हैं।
मंदिर के गर्भगृह में किसी मनुष्य द्वारा गढ़ी गई प्रतिमा नहीं, बल्कि स्वयं प्रकृति की कोख से प्रकट स्वयंभू शिव-पिण्डी विराजमान है। लोक-मान्यता में इसके दो गूढ़ अर्थ मिलते हैं—कुछ श्रद्धालु इसे भगवान आशुतोष के ‘कपाल’ (मस्तक) का साक्षात स्वरूप मानकर पूजते हैं, तो कुछ इसे सांख्य-दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल के आराध्य ईश्वर यानी ‘कपिल के ईश्वर’ के रूप में वंदन करते हैं। इसी पावन परिक्षेत्र को भगवान शंकर की प्रिय कपिला देवी की वासभूमि भी माना गया है।
स्कन्दपुराण के मानसखण्ड में ‘कपिल-क्षेत्र’ का साक्ष्य
कपिलेश्वर महादेव का यह तीर्थ केवल जनश्रुति तक सीमित नहीं है, बल्कि सनातन संस्कृति के प्रामाणिक ग्रंथ स्कन्दपुराण के मानसखण्ड में इसका विशद महात्म्य दर्ज है। मानसखण्ड के 56वें अध्याय में जब जिज्ञासु ऋषियों ने महर्षि व्यास से सांख्य और योग को सिद्ध करने वाले गुप्त तीर्थ के विषय में पूछा, तब व्यास जी ने बताया कि कौशिकी के वामभाग में स्थित पवित्र शक्तिपीठ ‘वृन्दगिरि’ (बानोली देवी) और देवाधिदेव के धाम ‘दारुकानन’ (जागेश्वर) के मध्य का यह समूचा भूभाग ‘कपिल-क्षेत्र’ कहलाता है।
महर्षि व्यास बताते हैं कि यह तीर्थ नंदी, स्कंद, गणेश तथा षोडश (सोलह) मातृकाओं की जाग्रत ऊर्जा से निरंतर सुरक्षित है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण जिस विभूति की पुष्टि करते हुए कहते हैं—“सिद्धानां कपिलो मुनिः”, उसी दिव्य सिद्ध परंपरा के केंद्र में विराजमान कपिलेश्वर महादेव के विषय में मानसखण्ड में कहा गया है:
तमेव योगमार्गस्य दर्शकं ज्ञायतां द्विजाः। राजते यत्र देवेशः कपिलेशो महेश्वरः ॥ मूकमागंरतानां च योगमार्गप्रदर्शकः। तमाराध्य मनुष्याणां जायते सिद्धिरुत्तमा ॥
अर्थात् हे श्रेष्ठ मुनियों! जहाँ स्वयं देवेश कपिलेश्वर महेश्वर विराजते हैं, उसे ही योगमार्ग का सच्चा प्रदर्शक जानो। जो साधक मौनव्रत धारण कर अंतर्मुखी साधना करते हैं, कपिलेश्वर महादेव उन्हें स्वतः योग का मार्ग दिखाते हैं और उनकी आराधना से जीव को सर्वोत्तम सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
दावाग्नि से झुलसे नागराज वासुकि और कपिलाश्रम की शरण
मानसखण्ड के 56वें और 57वें अध्याय की कथा इस बात को प्रमाणित करती है कि इस घाटी और कपिलेश्वर का संबंध पाताल के महाप्रतापी नागों से अत्यंत गहरा रहा है। पौराणिक प्रसंग के अनुसार, जब नागराज वासुकि और समस्त नागगण संसार के पाप, संताप और अहंकार रूपी दावानल से भीतर तक झुलसने लगे (“अद्य दावाग्निदग्धास्त्वां वयं हि शरणं गताः”), तब वे व्याकुल होकर शांति की खोज में महर्षि कपिल के आश्रम में पहुँचे।
फन झुकाए नागों ने कातर स्वर में प्रार्थना की थी कि जो लोग सांख्य और योग के कठिन नियमों को नहीं जानते, वे किस तीर्थ के दर्शन से इस संताप से मुक्त हो सकते हैं? तब महर्षि कपिल ने दीर्घ समाधि के उपरांत उन्हें इसी कपिलेश्वर क्षेत्र का दर्शन कराया। महर्षि के उपदेश से नागों के हृदय का समस्त मैल और दाह शांत हो गया, जिसका प्रमाण पुराण के शब्दों में मिलता है:
इति कपिलमुनेर्वचनमवाप्य नागा हृदयकलुषनाशं प्राप्य देवं भजन्ते ॥
महर्षि कपिल के वचनों को पाकर नागों ने अपने अंतर्मन के कल्मष का नाश किया और कपिलेश्वर महादेव की अनन्य भक्ति में लीन होकर इसे अपनी तपोभूमि बना लिया। आज भी मंदिर के समीप बहने वाली नदी के किनारे विशाल पाषाणों पर नागों की रहस्यमयी प्राकृतिक आकृतियाँ स्पष्ट दृष्टिगोचर होती हैं।
मौना और कपिलेश्वर: दो नागों की रहस्यमयी प्रतिस्पर्धा
कपिलेश्वर तीर्थ के साथ लोक-परंपरा में दो महाप्रतापी नागों का एक अत्यंत विस्मयकारी और रोमांचक आख्यान भी जुड़ा है। जनश्रुति के अनुसार, प्राचीन काल में इस घाटी में दो शक्तिशाली नाग राजाओं के मध्य एक भीषण प्रतिस्पर्धा ठन गई। शर्त यह रखी गई कि नियत समय के भीतर जो नाग दूसरे के देवालय को पहले ध्वस्त कर देगा, वही विजयश्री का वरण करेगा।
इस अलौकिक होड़ में एक ओर मौना का मंदिर था और दूसरी ओर कपिलेश्वर का पावन देवालय। दोनों नाग अपनी संपूर्ण मायावी और दैवीय शक्ति के साथ इस प्रतिस्पर्धा में उतरे, किंतु कपिलेश्वर महादेव के जाग्रत अधिष्ठान और तपोबल के कारण कपिलेश्वर के नाग राजा ने इस स्पर्धा में विजय प्राप्त की और यह पवित्र मंदिर अक्षुण्ण बना रहा। यह लोक-कथा आज भी इस घाटी के पत्थरों में गूँजती है।
आदि-योगी की वंदना और संरक्षण की प्रतीक्षा
कपिलेश्वर महादेव का यह स्वरूप सनातन स्तुति में पिनाकधारी, त्रिनेत्र, योगियों के परम गुरु, भस्मविभूषित और कपालमालाधारी के रूप में वर्णित है। यह वह पावन भूमि है जहाँ योग, सांख्य, कत्यूरी इतिहास और नाग-संस्कृति का एक अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
सकुनी और कुमियां नदियों के नीरव तट पर खड़ा यह 1100 वर्ष प्राचीन कत्यूरी देवालय आज भी सरकारी तंत्र के व्यापक प्रचार-प्रसार की बाट जोह रहा है। जागेश्वर की मुख्य धारा से कुछ दूरी पर स्थित यह गुप्त तीर्थ आज भी हर उस जिज्ञासु और श्रद्धालु को आमंत्रण दे रहा है, जो पत्थरों की नीरवता में आदि-शिव की जाग्रत स्पंदन और महर्षि कपिल की समाधि के अमृत को महसूस करना चाहता है।
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