एक नहीं, रामायण काल में हुए थे कुल पाँच रावण! जानिए इन मायावी असुरों की रहस्यमयी कथाएं

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​जब भी ‘रावण’ का नाम आता है, तो जहन में केवल दस सिर वाले लंकापति दशानन की तस्वीर ही उभरती है। लेकिन हमारे धर्मग्रंथों और विभिन्न रामायणों का गहराई से अध्ययन करने पर एक बेहद ही रोचक और रहस्यमयी तथ्य सामने आता है। रामायण काल में केवल एक नहीं, बल्कि कुल पाँच रावण हुए थे, जिनका सामना भगवान श्री राम, माता सीता और हनुमान जी को करना पड़ा था। आइए जानते हैं इन पाँचों मायावी असुरों की विस्तृत कथाएं:

1. अहंकार का पतन: लंकापति दशानन (10 सिर)
​(आधार: महर्षि वाल्मीकि कृत ‘वाल्मीकि रामायण’)
​ऋषि विश्रवा और राक्षसी कैकसी का पुत्र दशानन चारों वेदों का ज्ञाता और भगवान शिव का परम भक्त था। कठोर तपस्या से ब्रह्मा और शिव जी से अजेय होने का वरदान पाकर वह अहंकार में अंधा हो गया था। उसने अपने ही भाई कुबेर से लंका और पुष्पक विमान छीन लिया। दशानन का पतन तब शुरू हुआ जब उसने छल से माता सीता का हरण किया। भगवान श्री राम ने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई की। विभीषण के रहस्य बताने पर श्री राम ने रावण की नाभि में स्थित अमृत को आग्नेयास्त्र से सुखा दिया और इस महाज्ञानी किंतु अहंकारी रावण का वध कर धर्म की स्थापना की।

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2. पाताल का मायाजाल: तांत्रिक अहिरावण
​(आधार: महर्षि कृत्तिवास कृत ‘कृत्तिवासी रामायण’)
​अहिरावण पाताल लोक का राजा और भयंकर मायावी तांत्रिक था। लंका युद्ध में हारते हुए दशानन ने अपने इस भाई से मदद मांगी। अहिरावण ने विभीषण का रूप धरकर राम-दल के शिविर में प्रवेश किया और अपनी माया से सबको गहरी नींद में सुलाकर राम-लक्ष्मण का अपहरण कर लिया। वह पाताल भैरवी के सामने उनकी बलि देना चाहता था। जब हनुमान जी उन्हें खोजते हुए पाताल पहुंचे, तो उन्हें पता चला कि अहिरावण के प्राण पाँच अलग-अलग दिशाओं में जल रहे पाँच दीपकों में हैं। तब हनुमान जी ने ‘पंचमुखी रूप’ (वानर, नृसिंह, गरुड़, वराह और हयग्रीव) धारण कर एक ही फूंक में पाँचों दीपक बुझा दिए और अहिरावण का वध कर दिया।

3. पाताल का दूसरा खूंखार राजा: महिरावण
​(आधार: क्षेत्रीय लोककथाएं एवं विभिन्न ग्रंथ)
​महिरावण को अहिरावण का सगा भाई माना जाता है। ये दोनों मिलकर पाताल लोक पर राज करते थे और तंत्र-मंत्र में निपुण थे। राम-लक्ष्मण के अपहरण के समय महिरावण भी अहिरावण के साथ इस षड्यंत्र में शामिल था। जब राम-लक्ष्मण को बचाने के लिए हनुमान जी ने पाताल लोक में प्रवेश किया, तो उनका सामना इन दोनों मायावी भाइयों से हुआ। पांचों दीपकों को बुझाने के बाद हनुमान जी ने जहां अहिरावण का अंत किया, वहीं उसके भाई महिरावण का भी वध करके पाताल लोक को इनके आतंक से मुक्त कराया।

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4. शक्ति का महासंग्राम: सहस्रमुख रावण (1000 सिर)
​(आधार: ‘अद्भुत रामायण’)
​अद्भुत रामायण के अनुसार, दशानन का एक बड़ा भाई भी था जो पुष्कर द्वीप का शासक था। यह हजार सिरों वाला ‘सहस्रमुख रावण’ था। दशानन के वध के बाद जब श्री राम अपनी विशाल सेना के साथ पुष्कर द्वीप पहुंचे, तो सहस्रमुख रावण ने अपने ब्रह्मास्त्र के प्रहार से श्री राम सहित पूरी सेना को मूर्छित कर दिया। अपने स्वामी को मूर्छित देख माता सीता के भीतर की आदि-शक्ति जागृत हो गई। उन्होंने एक अत्यंत उग्र ‘महाकाली’ का रूप धारण किया और रणभूमि में उतरकर एक ही झटके में सहस्रमुख रावण के हजार सिर धड़ से अलग कर दिए। बाद में भगवान शिव ने आकर देवी के रौद्र रूप को शांत किया।

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5. सौ शीश का अंत: शतमुख रावण (100 सिर)
​(आधार: महर्षि वाल्मीकि रचित ‘आनंद रामायण’)
​आनंद रामायण के सार-कांड में ‘शतमुख रावण’ (सौ सिर वाले रावण) की कथा आती है। एक बार अयोध्या में दशानन रावण के वध की प्रशंसा हो रही थी, तब माता सीता ने बताया कि असली संकट तो सौ सिरों वाला शतमुख रावण है। यह सुनकर श्री राम ने उस पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में शतमुख रावण अपनी माया से अजेय प्रतीत हो रहा था। तब माता सीता ने स्वयं रणचंडी का रूप धारण किया और अपने अस्त्र-शस्त्रों से उसकी सारी माया नष्ट कर उस बलशाली शतमुख रावण का वध कर दिया।
​शैल शक्ति ब्यूरो

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