​अन्याय पर धर्म की विजय का प्रतीक: बदायूं के सहसवान में मौजूद है भगवान परशुराम के पराक्रम का ऐतिहासिक साक्ष्य

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​अन्याय पर धर्म की विजय का प्रतीक: बदायूं के सहसवान में मौजूद है भगवान परशुराम के पराक्रम का ऐतिहासिक साक्ष्य
​विशेष रिपोर्ट
​बदायूं: उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में स्थित सहसवान नगर केवल एक सामान्य कस्बा नहीं है, बल्कि इसके गर्भ में सदियों पुराना पौराणिक और ऐतिहासिक रहस्य छिपा है। यहाँ स्थित एक विशाल और गगनचुंबी टीला आज भी उस भयंकर युद्ध की गवाही देता है, जब भगवान परशुराम ने अन्याय का अंत करते हुए राजा सहस्त्रबाहु के भव्य किले को मिट्टी में मिला दिया था। आज यह स्थान न केवल आस्था का प्रमुख केंद्र है, बल्कि पर्यटन के लिहाज से भी अपार संभावनाएं समेटे हुए है।
​यहाँ जानिए इस ऐतिहासिक टीले, ‘सरसोता’ के रहस्य और इससे जुड़ी लोक मान्यताओं की विस्तृत कहानी:
​कामधेनु गाय का अपहरण और भगवान परशुराम का क्रोध
​किंवदंतियों और पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में सहसवान पर अत्यंत बलशाली और अभिमानी राजा सहस्त्रबाहु का शासन हुआ करता था। सत्ता के नशे में चूर सहस्त्रबाहु एक बार भगवान परशुराम के पिता, महर्षि जमदग्नि के आश्रम पहुंचा। वहां उसने महर्षि की चमत्कारी ‘कामधेनु’ गाय देखी और अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हुए उसे जबरन अपने साथ ले आया।
​जब यह बात भगवान परशुराम को पता चली, तो उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। अपने पिता के अपमान का प्रतिशोध लेने और पवित्र कामधेनु को मुक्त कराने के लिए उन्होंने सहस्त्रबाहु के अभेद्य माने जाने वाले किले पर धावा बोल दिया। इस प्रलयंकारी युद्ध में भगवान परशुराम ने अपने फरसे से सहस्त्रबाहु का वध कर दिया और उसके विशाल किले को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। आज सहसवान के उत्तर में मौजूद वह विशाल टीला उसी ध्वस्त किले का अंतिम अवशेष है।
​फरसे के प्रहार से फूटे जल के सात स्रोत: ‘सरसोता’ का रहस्य
​इस स्थान से केवल युद्ध की ही नहीं, बल्कि एक अद्भुत चमत्कार की कथा भी जुड़ी है। मान्यता है कि सहस्त्रबाहु का वध करने के बाद भगवान परशुराम को तीव्र प्यास लगी। जब आसपास कहीं जल नहीं मिला, तो उन्होंने अपने फरसे से धरती पर जोरदार प्रहार किया।
​इस प्रहार से धरती चीरकर प्राकृतिक जल के सात स्रोत फूट पड़े, जिसने उनकी प्यास बुझाई। आज इन सात जल स्रोतों को ‘सरसोता’ (सप्तस्रोत) के नाम से जाना जाता है। किले के टीले के समीप स्थित यह निर्मल जल स्रोत स्थानीय लोगों और दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था का केंद्र है।
​किले का वर्तमान स्वरूप: विशाल टीला और ‘दंड झील’
​वर्तमान में राजा सहस्त्रबाहु का वह अजेय किला एक बहुत ऊंचे टीले में तब्दील हो चुका है। इस टीले की तलहटी में सैकड़ों बीघा में फैली ‘दंड झील’ स्थित है। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि एक समय में इस खूबसूरत झील में कमल के फूल खिला करते थे और इसके आसपास महकदार केवड़े की खेती होती थी, जो पूरे इलाके को सुवासित कर देती थी।
​प्रशासन द्वारा भी समय-समय पर इस ऐतिहासिक धरोहर को संवारने के प्रयास किए गए हैं:
​टीले को ‘भगवान परशुराम स्थल’ के रूप में विकसित करने की योजना।
​श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए टीले पर सीढ़ियों का निर्माण।
​सुरक्षा और प्रकाश के लिए हाईमास्ट लाइटों की व्यवस्था।
​ऐतिहासिक ‘दंड झील’ की खुदाई कर उसे पुनर्जीवित करने का कार्य।
​अटूट आस्था: मन्नत के ‘सतिये’ और चर्मरोग दूर करने की मान्यता
​यह पौराणिक स्थल लोक मान्यताओं और परंपराओं से भी गहराई से जुड़ा है। श्रद्धालु ‘सरसोता’ के पवित्र जल में स्नान कर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं।
​मन्नत मांगते समय लोग यहाँ गोबर के ‘सतिये’ (स्वास्तिक चिह्न) बनाते हैं। जब उनकी मुराद पूरी हो जाती है, तो वे कृतज्ञता स्वरूप वापस आकर यहाँ सोने और चांदी के सतिये दान करते हैं। इसके साथ ही, पास ही स्थित नाथ बाबा के मंदिर में एक विशेष मान्यता है। लोगों का अटूट विश्वास है कि इस मंदिर में झाड़ू चढ़ाने से गंभीर चर्मरोग (त्वचा संबंधी बीमारियां) भी ठीक हो जाते हैं।
​कुल मिलाकर सहसवान का यह विशाल टीला महज़ ईंट और मिट्टी का ढेर नहीं है। यह अन्याय पर धर्म की शाश्वत विजय, महर्षि जमदग्नि के तपोबल और भगवान परशुराम के असीम पराक्रम का एक जीता-जागता ऐतिहासिक साक्ष्य है, जिसे आज भी सहेज कर रखने की आवश्यकता है।

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