​काल के भाल पर अमिट हस्ताक्षर: ‘अक्षय तृतीया’ का तात्विक और आध्यात्मिक रहस्य

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सनातन धर्म की कालगणना केवल समय का मापन नहीं है, बल्कि यह चेतना के स्पंदन और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रवाह का विज्ञान है। इस कालगणना में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जो स्वयं में पूर्णता समेटे होते हैं। इन्हीं में से एक सर्वोपरि और दिव्य क्षण है – ‘अक्षय तृतीया’।

​वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि, जिसे लोकभाषा में ‘अखा तीज’ भी कहा जाता है, केवल सोना खरीदने या मांगलिक कार्यों की एक तिथि मात्र नहीं है। शास्त्रों के गहरे गलियारों में उतरें और ज्योतिषीय शोध की कसौटी पर परखें, तो यह तिथि अबूझ मुहूर्तों की शिरोमणि और आध्यात्मिक रूपांतरण का एक गुप्त द्वार प्रतीत होती है।

 

​आइए, अक्षय तृतीया के उन अनछुए, शोधपरक और शास्त्र-सम्मत पहलुओं का अन्वेषण करें, जो इसे ‘रहस्यमयी’ और ‘अमर्त्य’ बनाते हैं:

शोधपरक ज्योतिषीय आधार: सूर्य-चंद्र का चरम सामंजस्य

अक्षय तृतीया की महिमा का सबसे बड़ा वैज्ञानिक और ज्योतिषीय कारण सूर्य और चंद्रमा की स्थिति है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को ‘आत्मा’ और चंद्रमा को ‘मन’ का कारक माना गया है।

​”एतद्दिनं तु देवस्य सूर्यस्य चंद्रस्य च।

उच्चस्थित्या पूर्णफलं ज्ञेयं सर्वकर्मसु॥”

​शोध बताते हैं कि पूरे वर्ष में केवल यही एक ऐसा दिन होता है, जब ज्योतिष मंडल के दोनों सबसे प्रदीप्त ग्रह – सूर्य (मेष राशि में) और चंद्रमा (वृषभ राशि में) – अपनी-अपनी ‘उच्च’ राशि में होते हैं। सूर्य का उच्च होना प्रखर आत्मबल का प्रतीक है, जबकि चंद्रमा का उच्च होना मानसिक शांति और पूर्णता का परिचायक है। जब आत्मा और मन दोनों अपने वैभव के शिखर पर हों, तो उस समय किया गया कोई भी संकल्प या कर्म ‘अक्षय’ होना स्वाभाविक है। यही खगोलीय घटना इसे ‘स्वयं सिद्ध मुहूर्त’ बनाती है।

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शास्त्र-सम्मत पौराणिक सूत्र एवं अलौकिक आध्यात्मिक घटनाएँ

​अक्षय तृतीया केवल ग्रहीय स्थितियों का गणित नहीं है, बल्कि यह वह पुण्य-लग्न है जिसे स्वयं परमात्मा ने अपनी लीलाओं और आध्यात्मिक घटनाओं के लिए चुना। यह तिथि सृष्टि के चक्र में कई युगांतकारी घटनाओं का साक्षी है:

युगादि तिथि: शास्त्रों के अनुसार, इसी तिथि को कृत (सत) युग का अंत और त्रेता युग का आरंभ हुआ था। यह समय के एक महाचक्र के परिवर्तन और नई चेतना के अवतरण का दिन है।

श्री बांके बिहारी जी के दुर्लभ ‘चरण दर्शन’: वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर में वर्ष के 364 दिन भगवान के चरणों को वस्त्रों से ढँक कर रखा जाता है। संपूर्ण वर्ष में केवल अक्षय तृतीया ही वह एकमात्र दिन है, जब भक्तों को ठाकुर जी के ‘श्रीचरणों’ के दर्शन प्राप्त होते हैं।

भगवान नर-नारायण का प्राकट्य एवं बद्रीनाथ के कपाट: तपस्या और संयम के सर्वोच्च प्रतीक भगवान नर-नारायण का अवतरण इसी पावन तिथि पर हुआ था। इसी आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण श्री बद्रीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के पश्चात प्रायः इसी दिन दर्शनार्थ खोले जाते हैं।

अवतारी चेतनाएँ: विष्णु के आवेश अवतार, शस्त्र और शास्त्र के समन्वय, भगवान परशुराम का जन्म इसी दिन हुआ था। इसी दिन माता पार्वती ने देवी अन्नपूर्णा के रूप में अवतार लिया था और महादेव ने सृष्टि के भरण-पोषण के लिए उनसे भिक्षा मांगी थी।

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द्रौपदी को ‘अक्षय पात्र’ और गंगा का भू-अवतरण: महाराजा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर माँ गंगा इसी दिन पृथ्वी पर उतरी थीं। वहीं महाभारत काल में, वनवास के दौरान सूर्यदेव (या श्रीकृष्ण) ने द्रौपदी को इसी दिन ‘अक्षय पात्र’ प्रदान किया था, जिसका भोजन कभी समाप्त नहीं होता था।

जगन्नाथ रथ निर्माण का शुभारंभ: पुरी (ओडिशा) में भगवान जगन्नाथ की 

विश्व-प्रसिद्ध रथ यात्रा के लिए नए रथों के निर्माण का शुभारंभ (चंदन यात्रा) भी अक्षय तृतीया के दिन से ही होता है, जो जीव की परमात्मा तक जाने वाली अक्षय यात्रा का आरंभ है। शिव कृपा से कुबेर को निधियों का स्वामित्व भी आज ही के दिन मिला था।

​’अक्षय’ शब्द का दार्शनिक रहस्य: ज्ञान और भाव का महायोग

सर्वसाधारण में धारणा है कि इस दिन सोना खरीदने से वह कभी कम नहीं होता। किंतु ‘अक्षय’ का अर्थ केवल भौतिक संपदा की अधिकता नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में आत्मा को ‘अक्षय’ कहा है।

ज्ञान का अक्षय पात्र: इसी दिन भगवान वेदव्यास ने महाभारत लिखना प्रारंभ किया था और गणेश जी उसके लेखक बने थे। यह ज्ञान के अक्षय होने का प्रतीक है।

​सत्यकाम और सुदामा प्रसंग: सुदामा ने कृष्ण को मुट्ठी भर तंडुल (चावल) अर्पित किए थे, और बदले में कृष्ण ने उन्हें ‘अक्षय’ संपदा दे दी। यह सिद्ध करता है कि निष्काम भाव से किया गया लघु अर्पण भी इस दिन अनंत गुना होकर लौटता है।

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दान और सत्कर्म का विज्ञान: ‘तस्य अक्षय्यं फलं स्मृतम्’

भविष्य पुराण स्पष्ट रूप से उद्घोष करता है कि इस दिन किया गया दान, जप, तप और हवन ‘अक्षय’ होता है।

​”यत्किंचित् दीयते दानं स्वल्पं वा यदि वा बहु।

तत्सर्वं अक्षय्यं याति वैशाखस्य तृतीयाके॥”

​वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो, जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा अपने चरम पर होती है, तब हमारे द्वारा की गई क्रिया (Action) की प्रतिक्रिया (Reaction) भी तीव्र होती है। ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होने के कारण इस दिन जल, घड़ा, पंखा, छाता, सत्तू और फल दान करने का विधान है। यह प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने और करुणा के भाव को जाग्रत करने का एक वैज्ञानिक तरीका है।

​कुल मिलाकर: चेतना के नव-विहान का दिन ​अक्षय तृतीया एक तिथि मात्र नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अवसर है। यह रहस्यमयी इसलिए है क्योंकि यह भौतिक और आध्यात्मिक – दोनों जगत के कल्याण का द्वार एक साथ खोलती है। सोना खरीदना शुभ हो सकता है, लेकिन ‘सत्कर्मों का सोना’ कमाना इस दिन का वास्तविक संदेश है।

​यदि हम इस दिन सूर्य जैसी प्रखरता, चंद्रमा जैसी शीतलता, परशुराम जैसा न्याय, गंगा जैसी पवित्रता और सुदामा जैसा भावपूर्ण समर्पण अपने जीवन में ला सकें, तो हमारे जीवन का आनंद सचमुच ‘अक्षय’ हो जाएगा। यह काल के भाल पर अंकित वह अमिट हस्ताक्षर है, जो हमें याद दिलाता है कि हम नश्वर शरीर नहीं, बल्कि अनश्वर आत्मा हैं।

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