​हल्द्वानी के निकट रहस्यमयी ‘कालीचौड़ धाम’: जहां लंकापति रावण के पितामह महर्षि पुलस्त्य ने की थी महाकाली की कठोर तपस्या

ख़बर शेयर करें

​नवरात्रि विशेष: हल्द्वानी के वन क्षेत्र में स्थित वह प्राचीन शक्तिपीठ, जो रहा है रावण के दादा और सप्तऋषियों की तपोभूमि
​रावण के पितामह की तपोस्थली ‘कालीचौड़’: कुमाऊं का वह सिद्धपीठ जहां कण-कण में बसती हैं आदिशक्ति महाकाली

​​आदिशक्ति भगवती महाकाली की महिमा अनंत है। मनुष्य तो क्या, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, त्यागी-तपस्वी और सुर-असुर कोई भी माँ की महिमा का बखान करने में पूर्णतः समर्थ नहीं है। शास्त्रों तथा पुराणों में महामाया के विविध स्वरूपों और उनकी उपासना पद्धतियों का विशद वर्णन मिलता है। सृष्टि के मूल में स्थित महामाया भगवती काली संपूर्ण जगत की नियंता हैं। वह कल्याण स्वरूपा, करुणामयी और दयामयी हैं, जो प्राणीमात्र के मंगल का कारण हैं। माँ के जिस स्वरूप का जिसने भी निर्मल भाव से स्मरण किया, माँ ने उसी रूप में उसके भाव सदैव ग्रहण किए और उस प्राणी का सदा कल्याण किया।

हल्द्वानी के समीप स्थित जाग्रत शक्तिपीठ: कालीचौड़

कल्याणी कालिका के इस भू-लोक में अनेक शक्ति स्थल हैं, जिनकी विमल आभा में प्राणी जगत स्वयं को सदैव सुखी व सुरक्षित महसूस करता है। ऐसा ही एक परम शक्ति स्थल है ‘कालीचौड़ धाम’। यह एक ऐसा धाम है जहां निर्मल मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती। हमारे विद्वान महापुरुष कतिपय कारणों से या फिर संभवतः जानकारी के अभाव में इस दिव्य धाम को शक्तिपीठ की मान्यता प्रदान न कर सके, जबकि वास्तविकता यही है कि कालीचौड़ धाम की महिमा किसी शक्तिपीठ से कम नहीं है।
​”काली-काली महाकाली कालिके परमेश्वरी।
सर्वानन्द करो देवी नारायणी नमोअस्तुते।।”
​काली का यह पावन मंत्र बीहड़ वन के मध्य कालीचौड़ में भक्तों के मुखारबिंदु से अक्सर गुंजायमान रहता है। आध्यात्मिक शांति को समेटे काठगोदाम (हल्द्वानी) के पास स्थित यह मंदिर माता जगदम्बा की ओर से भक्तों के लिए एक अनुपम भेंट है। पावन भूमि उत्तराखंड में कुमाऊं क्षेत्र के अंतर्गत यह वन प्राचीन काल से ऋषि-मुनियों की आराधना और तपस्या का केंद्र रहा है। यह एक ऐसा स्थान है जहां पहुंचते ही सांसारिक मायाजाल में भटका मानव अनायास ही कालिका के चरणों में एक निराली शांति का अनुभव करता है।

यह भी पढ़ें 👉  नागेश्वर महादेव मंदिर में जब गूंजी नैमिषारण्य की दिव्य वाणी: अयोध्या के महंत भी खिंचे चले आए, जानिए तीसरे दिन का वह आध्यात्मिक रहस्य जिसने भक्तों को भावविभोर कर दिया

रावण के पितामह और सप्तऋषियों की तपोभूमि

पुराणों के अनुसार, हल्द्वानी से सटे ये तमाम पर्वतीय क्षेत्र महान आस्थाओं के सिद्ध क्षेत्र रहे हैं। स्कंद पुराण के इकतालीसवें अध्याय के श्लोक- “अत्रिः पुलस्त्यः पुलहः ऋषयो गर्ग पर्वतम्” से यह संकेत मिलता है कि इसी क्षेत्र में लंकापति रावण के पितामह पुलस्त्य ऋषि ने महाकाली की कठोर तपस्या करके उनके दर्शन किए थे। महर्षि पुलस्त्य के साथ यहां ब्रह्मा के पुत्र अत्रि और पुलह ने भी इन वन क्षेत्रों में घोर तप किया था।
​कथाओं के अनुसार, सतयुग में सप्त ऋषियों ने भी इसी स्थान पर भगवती की आराधना कर मनोवांछित लौकिक व अलौकिक सिद्धियां प्राप्त की थीं। श्री मार्कण्डेय ऋषि ने भी यहां तपस्या करके काली की कृपा प्राप्त की और चराचर जगत की नश्वरता का ज्ञान पाया। इसी शक्ति की कृपा के फलस्वरूप उन्होंने श्री महाकाली दरबार के निकट ही पाताल भुवनेश्वर में पुराणों की रचना की। कालीचौड़ के एक ओर गर्गांचल (गर्ग ऋषि की तपस्थली) व समीप ही भद्रवट क्षेत्र स्थित है। महर्षि व्यास जी ने मानस खंड में इस क्षेत्र की उपमा तीर्थराज के रूप में करते हुए लिखा है- “क्षेत्र भद्रवट नाम सर्वपापप्राणशनम्”।

यह भी पढ़ें 👉  अयोध्या से लालकुआँ पहुंची एक दिव्य अनुभूति, अवंतिका शक्तिपीठ में सदियों पुरानी धूनी के पुनरुद्धार के पीछे छिपा है कौन सा आध्यात्मिक रहस्य?

गुरु गोरखनाथ और अनेक संतों की साधना स्थली

ऐसा माना जाता है कि जब बाबा गुरु गोरखनाथ जी ने इस वसुंधरा में कदम रखा, तो सर्वप्रथम इसी क्षेत्र को अपनी आराधना का केंद्र बनाया। कुमाऊं का प्रवेश द्वार होने के कारण यह क्षेत्र संतों का प्रथम पड़ाव रहा। गुरु गोरखनाथ जी ने यहीं धूनी रमाकर कालिका की कठोर आराधना की। महायोगी महेंद्र नाथ, सोमवारी बाबा, नानतिन बाबा, टाटम्बरी बाबा और हैड़ाखान बाबा सहित अनेकों संतों ने इस स्थान पर साधना करके कालिका माता से निर्मल ज्ञान की प्राप्ति की है।

आदिगुरु शंकराचार्य का आगमन और कैसे पड़ा ‘कालीचौड़’ नाम?

सनातन धर्म की महान ध्वजावाहक आदि जगद्गुरु शंकराचार्य महामाया भगवती के अनन्य भक्त थे। भारत भ्रमण करते हुए जब वे देवभूमि उत्तराखंड आए, तो कूर्मांचल की तराई में उन्होंने गार्गी (गोला) नदी के दर्शन किए। यहाँ पहुंचकर जगद्गुरु एकाएक कह उठे कि “यहां तो भगवती काली की अद्भुत आभा सर्वत्र बिखरी है।” स्थानीय भक्तों ने उन्हें वन में स्थित एक प्राचीन मंदिर की जानकारी दी। शंकराचार्य जी ने वहां पहुंचकर दर्शन किए और कई दिनों तक साधनारत रहे। पुराने बुजुर्ग बताते हैं कि यह मंदिर घनी झाड़ियों के बीच स्थित था। आदिगुरु के आदेश पर भक्त मंडली द्वारा मंदिर के चारों ओर की झाड़ियों और उबड़-खाबड़ भू-भाग को काटकर चौरस (समतल) किया गया, और यहीं से लोग इसे ‘कालीचौड़’ कहने लगे। लगभग सात दशक पूर्व (1942 के आसपास) कलकत्ता के एक बंगाली भक्त और हल्द्वानी निवासी रामकुमार जी ने माँ की कृपा से इस स्थान को एक भव्य मंदिर के रूप में स्थापित किया।

यह भी पढ़ें 👉  अयोध्या से लालकुआँ पहुंची एक दिव्य अनुभूति, अवंतिका शक्तिपीठ में सदियों पुरानी धूनी के पुनरुद्धार के पीछे छिपा है कौन सा आध्यात्मिक रहस्य?

कुमाऊं के अन्य काली मंदिरों से जुड़ाव

कालीचौड़ की कालिका की कथा और महिमा अनंत है। पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट क्षेत्र में स्थित श्री महाकाली का जाग्रत शक्तिपीठ भी सदियों से पूजनीय है। बड़ा ही विराट है कालीचौड़ की कालिका का स्वरूप; यहां मूर्ति रूप में पूजित काली, गंगोलीहाट में शक्तिपीठ के रूप में पूजी जाती हैं। बागेश्वर के समीप कांडा का भद्रकाली दरबार हो या कुमाऊं के अन्य नाग मंदिर, हर स्थान पर काली की कोई न कोई अलौकिक लीला के रहस्य छिपे हैं। कालीचौड़ धाम भी उन्हीं रहस्यों और अनंत कृपाओं का एक जाग्रत केंद्र है।
​।। जय काली मैया ।।
​लेखक: राजेन्द्र पंत ‘रमाकांत’

Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad