रुड़की/चुड़ियाला: देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में देवताओं का वास है। यहाँ के हर मंदिर की अपनी एक विशिष्ट पौराणिक व ऐतिहासिक महत्ता है। इसी कड़ी में हरिद्वार जिले के रुड़की के समीप स्थित माँ चूड़ामणि देवी मंदिर आस्था का एक ऐसा प्रमुख केंद्र है, जो न केवल एक जाग्रत सिद्धपीठ है, बल्कि अपनी एक बेहद अनोखी परंपरा के लिए पूरे देश में विख्यात है। रुड़की शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर भगवानपुर विकासखंड के ‘चुड़ियाला’ गाँव में स्थित यह मंदिर विशेषकर निःसंतान दंपत्तियों के लिए अगाध श्रद्धा का केंद्र है।
सती का ‘चूड़ा’ गिरने से बना सिद्धपीठ
माँ चूड़ामणि देवी का यह धाम माता के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। शिव पुराण व अन्य धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ कुंड में सती ने आत्मदाह किया, तो क्रोध और शोक में डूबे भगवान शिव उनके मृत शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंग काटे थे।
मान्यता है कि इसी चुड़ियाला गाँव के स्थान पर माता सती का ‘चूड़ा’ (सिर का आभूषण या बालों का जूड़ा) गिरा था। माता का आभूषण यहाँ गिरने के कारण ही इस स्थान का नाम ‘चुड़ियाला’ पड़ा और यहाँ विराजमान देवी ‘माँ चूड़ामणि’ कहलाईं।
राजा लंढौर का स्वप्न और भव्य मंदिर का निर्माण
स्थानीय इतिहास और किंवदंतियों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण सन 1805 के आसपास लंढौर रियासत के राजा द्वारा कराया गया था। कहा जाता है कि राजा एक बार इस घने जंगल में शिकार खेलते हुए रास्ता भटक गए और प्यास से व्याकुल हो गए। थके-हारे राजा जब एक पेड़ के नीचे सोए, तो उन्हें स्वप्न में माँ चूड़ामणि के दर्शन हुए। माता के निर्देशानुसार जब राजा ने उस स्थान पर खुदाई करवाई, तो वहाँ से मीठे जल की धारा फूट पड़ी और साथ ही माता की एक स्वयंभू ‘पिंडी’ के दर्शन हुए। इसी चमत्कार से अभिभूत होकर राजा ने यहाँ माता के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।
सूनी गोद भरने के लिए ‘लोकड़ा’ (लकड़ी का गुड्डा) चोरी करने की अद्भुत परंपरा
यूं तो दुनिया में चोरी करना पाप है, लेकिन माँ चूड़ामणि के दरबार में भक्तिभाव से की गई ‘चोरी’ से सूनी गोद आबाद हो जाती है।
लकड़े की चोरी: जिन दंपत्तियों को संतान सुख नहीं मिलता, वे माता के दर्शन करने यहाँ आते हैं। वे माता के चरणों में रखे ‘लोकड़ा’ (लकड़ी के गुड्डे) को चुपचाप चुराकर अपने साथ घर ले जाते हैं। यह अटूट विश्वास है कि ऐसा करने से माँ चूड़ामणि उन्हें निश्चित रूप से संतान रत्न का आशीर्वाद देती हैं।
मन्नत पूरी होने पर वापसी: जब मन्नत पूरी हो जाती है और घर में बच्चे की किलकारी गूंजती है, तो दंपत्ति उस चुराए हुए लकड़ी के गुड्डे को वापस माता के चरणों में रखते हैं। साथ ही, कृतज्ञता स्वरूप अपने नवजात शिशु के जन्म की खुशी में एक नया लकड़ी का गुड्डा भी माता को अर्पित करते हैं।
नवरात्रों में उमड़ता है आस्था का महासागर
चुड़ियाला गाँव का यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण के लिए जाना जाता है। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही एक विशाल और कलात्मक सिंहद्वार श्रद्धालुओं का स्वागत करता है। चैत्र और शारदीय नवरात्रों में यहाँ एक विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और हिमाचल से लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं। कई भक्त अपनी मन्नत पूरी होने पर गाजे-बाजे के साथ पैदल यात्रा करते हुए माता को लाल ध्वजा (निशान) अर्पित करने भी आते हैं।
यात्रा मार्ग: कैसे पहुँचें माँ के दरबार?
सड़क मार्ग: रुड़की या सहारनपुर से भगवानपुर होते हुए चुड़ियाला गाँव तक आसानी से पहुँचा जा सकता है।
रेलवे मार्ग: सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन रुड़की और चुड़ियाला हैं। चुड़ियाला स्टेशन से मंदिर की दूरी मात्र 2-3 किलोमीटर है, जहाँ से स्थानीय साधन सुलभ हैं।
हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा जौलीग्रांट (देहरादून) लगभग 70 किलोमीटर दूर है।
लेटैस्ट न्यूज़ अपडेट पाने हेतु -
👉 वॉट्स्ऐप पर हमारे समाचार ग्रुप से जुड़ें
