देवभूमि (उत्तराखंड)। हिमालय की शांत उपत्यकाओं में बिखरी अलौकिक दिव्यता केवल प्रकृति का विलास नहीं, अपितु युगों-युगों की उन तपस्याओं और चमत्कारों की धरोहर है जो साधारण मानवीय बुद्धि से परे हैं। महाभारत के सबसे प्रचंड और अजेय योद्धा महाबली भीमसेन के जीवन से जुड़ा एक ऐसा ही अद्भुत और रहस्यमयी प्रसंग सनातन धर्म के परम पावन ग्रंथ स्कन्दपुराण के ‘मानसखण्ड’ के 45वें अध्याय में सुरक्षित है। यह गाथा बताती है कि किस प्रकार कुरुक्षेत्र को थर्रा देने वाले गदाधारी भीम ने एक अज्ञात आकाशवाणी के आदेश पर अपनी महाविनाशक गदा को भूमि पर टिका दिया और उनके एक ही प्रहार से सात सरोवरों के मुकुटमणि ‘भीमताल’ तथा साक्षात मनोकामना सिद्धिकारक ‘भीमेश्वर महादेव’ का प्राकट्य हुआ।
सप्त सरोवरों का रहस्य और भीमताल की केंद्रीय सत्ता
नैमिषारण्य के तपोवन में जब शौनक आदि मुनिवरों ने महर्षि वेदव्यास से जिज्ञासा की कि देवभूमि के वे सात पुण्यदायी सरोवर कौन से हैं और उनमें ‘भीमह्रद’ (भीमताल) को इतना विशिष्ट स्थान क्यों दिया गया है?
तब महर्षि व्यास ने उद्घाटन करते हुए बताया कि ये सातों सरोवर मानसरोवर के समान ही पावन हैं—तृषि सरोवर (नैनीताल), भीमह्रद (भीमताल), नौ कोणों में विस्तृत सनत्कुमार सरोवर (नौकुचियाताल), नल सरोवर, दमयन्ती सरोवर, राम सरोवर और सीता सरोवर। व्यास जी ने स्पष्ट किया कि इन सभी दिव्य सरोवरों के ठीक केंद्र में स्थित होने के कारण ‘भीमताल’ ही सबका अधिपति और ‘सरनायक’ है, जिसकी सेवा में सिद्ध और विद्याधर गण नित्य उपस्थित रहते हैं।
चित्रशिला वंदन और पर्वत शिखर पर गूंजी आकाशवाणी
कथा के अनुसार, एक बार देवराज इंद्र के समान पराक्रमी भीमसेन अकेले ही हिमालय पर्वत की ओर बढ़े। मार्ग में उन्होंने सर्वप्रथम परम पावन चित्रशिला (वर्तमान रानीबाग-काठगोदाम संगम) का दर्शन-पूजन किया और वहाँ स्थित विशाल वटवृक्ष की भावपूर्वक परिक्रमा कर पर्वत के उत्तुंग शिखर पर आरूढ़ हुए।
पर्वत शिखर पर पहुंचते ही एकाएक दसों दिशाएं आलोकित हो उठीं और शून्य आकाश से एक गंभीर अशरीरी वाणी गूंजी:
“हे भीम! हे महाबाहो! अविलंब देवाधिदेव भगवान शिव की आराधना करो। उनकी आराधना कर अंजलि-दान द्वारा शिवत्व को प्राप्त करो और इस पृथ्वी पर अपनी कीर्ति को कल्प-कल्पांतर के लिए अमर कर दो!”
गदा का प्रहार, पाताल-गंगा और भीमताल की उत्पत्ति
उस रहस्यमयी आकाशवाणी को सुनकर महाबली भीम का हृदय भक्तिभाव से विगलित हो उठा। उन्होंने अपनी गदा भूमि पर रख दी और महेश्वर को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। भीम ने वहीं पर्वत पर लोककल्याणकारी भगवान शिव (शिवलिंग) की स्थापना की तथा गंध, अक्षत, पुष्प, माला, वस्त्र और नाना प्रकार के नैवेद्यों से उनका षोडशोपचार पूजन किया।
किंतु, प्रभु के जलाभिषेक हेतु जल का कोई विशाल स्रोत न पाकर भीमसेन ने अपनी महाबली गदा उठाई और पर्वत की कठोर शिला पर ऐसा भीषण प्रहार किया कि पर्वत का सीना विदीर्ण हो गया। भीम ने पाताल को स्पर्श करते हुए साक्षात पाताल-गंगा का आह्वान किया, जिससे पर्वत के गर्भ से निर्मल गंगाजल की अविरल धारा फूट पड़ी। भीमसेन ने दोनों हथेलियों की अंजलियाँ भर-भरकर देवाधिदेव शूलपाणि को जल अर्पित किया। उस अंजलि-दान से वह विशाल गर्त भर गया और क्षणभर में एक हिलोरें मारते दिव्य महासरोवर ‘भीमताल’ में परिणत हो गया। देखते ही देखते इसमें मगरमच्छ, मछलियां और चंचल जलपक्षी विहार करने लगे तथा देवगण और देवांगनाएं आनंदमग्न होकर वहाँ क्रीड़ा करने उतर आईं। पूजा उपरांत आकाशवाणी ने पुनः भीम को प्रसन्नचित्त होकर हस्तिनापुर लौटने का आदेश दिया।
मनोवांछित सिद्धि के दाता ‘भीमेश्वर महादेव’
भीम द्वारा स्थापित यही पावन शिवलिंग आगे चलकर ‘भीमेश्वर महादेव’ के नाम से तीनों लोकों में विख्यात हुआ। महर्षि वेदव्यास स्कन्दपुराण में भीमताल और भीमेश्वर महादेव की अमोघ महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि इस पावन सरोवर का जल साक्षात गंगाजल के समान है और यहाँ भीमेश्वर महादेव की पूजा समस्त सिद्धियों को देने वाली है। मानसखण्ड के पृष्ठ पर अंकित यह पावन श्लोक इसकी महिमा को प्रत्यक्ष प्रमाणित करता है:
तत्र भीमेश्वरं देवं सम्पूज्य मुनिसत्तमाः। मनोऽभिलषितां सिद्धिं ददाति परमेश्वरः॥ (भावार्थ: हे मुनिश्रेष्ठों! वहाँ भीमह्रद के तट पर विराजमान देवाधिदेव ‘भीमेश्वर’ का श्रद्धापूर्वक पूजन-अर्चन करने से देवाधिदेव परमेश्वर साधक को उसकी समस्त मनोवांछित सिद्धियां सहज ही प्रदान कर देते हैं।)
महर्षि व्यास आगे यह भी बताते हैं कि इस सरोवर में स्नान करने वाला मनुष्य प्रलयकाल तक देवलोक में वास करता है और इस क्षेत्र की पर्वत कंदराओं व गुफाओं में आज भी सिद्ध महापुरुष आदिशक्ति भगवती महादेवी की गुप्त उपासना में लीन रहते हैं।
पौराणिक गरिमा से ऐतिहासिक वैभव तक
द्वापर काल की इसी पावन आधारशिला पर 17वीं शताब्दी (सन् 1667) में कुमाऊं के प्रतापी चंद वंशीय राजा बाज बहादुर चंद ने वर्तमान नागर शैली के भव्य भीमेश्वर महादेव मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था। आज भी जब भीमताल के अथाह नीले जल पर भीमेश्वर देवालय के शिखर की परछाईं पड़ती है और शंख-घंटियों का दिव्य नाद वादियों में तैरता है, तो ऐसा लगता है मानो महाभारत काल का वह पराक्रम और देवाधिदेव महादेव की अनन्य कृपा आज भी इस नीरव सरोवर के कण-कण में सजीव है।
@ रमाकान्त पन्त
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