कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि सनातन संस्कृति के उस अद्भुत दर्शन का साक्षात्कार कराती है, जहाँ जीवन की पूर्णता केवल भौतिक संचय में नहीं, बल्कि आरोग्य, अभय और आत्मिक समृद्धि के संतुलन में देखी गई है। पंच-दिवसीय दीपोत्सव का शुभारंभ करने वाला यह पावन पर्व ‘धनतेरस’ अथवा ‘धनत्रयोदशी’ के नाम से जाना जाता है। लोक-व्यवहार में भले ही इसे स्वर्ण, रजत और नवीन पात्रों के क्रय तक सीमित मान लिया गया हो, किंतु पुराणों के पन्नों में इस तिथि का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्य अत्यंत गूढ़ एवं मानव-कल्याणकारी है।
१. समुद्र मंथन और भगवान धन्वन्तरि का प्राकट्य
श्रीमद्भागवत महापुराण (अष्टम स्कन्ध) और विष्णु पुराण में वर्णित क्षीरसागर मंथन की कथा इस पर्व का मूल आधार है। जब देव और दानव अमृत प्राप्ति की अभीप्सा से वासुकि नाग को नेती और मन्दराचल पर्वत को मथानी बनाकर समुद्र मंथन कर रहे थे, तब कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन सागर के गर्भ से एक अद्भुत पुरुष का प्राकट्य हुआ:
ततोऽमृतं समुपहृत्य पाणिना विभाजयामास सुरेषु केशवः। पीतेऽमृते तु देवेषु सम्प्रवृत्तो महाहवः॥ (श्रीमद्भागवत महापुराण, ८/८/३२-३४)
नीलवर्ण, विशाल वक्षस्थल, चतुर्भुज स्वरूप, पीतांबर धारण किए हुए यह दिव्य पुरुष अपने हाथों में अमृत से भरा कलश (अमृत-कुंभ), शंख, चक्र और जलोका (औषधि/लीच) लिए प्रकट हुए। ये साक्षात भगवान विष्णु के अंशावतार भगवान धन्वन्तरि थे। वे समस्त औषधियों और आयुर्वेद के प्रवर्तक बने।
पुराणों में उनकी स्तुति इस प्रकार की गई है:
नमामि धन्वन्तरिं आदिदेवं सुरासुरैर्वन्दितपादपद्मम्। लोके जरारुग्भयमृत्युनाशं दातारमीशं विविधौषधीनाम्॥
धन्वन्तरि का आविर्भाव यह स्मरण कराता है कि संसार का सबसे बड़ा ‘धन’ निरोगी काया और दीर्घायु है। यदि शरीर ही रुग्ण हो, तो समस्त सांसारिक वैभव निरर्थक सिद्ध होते हैं।
२. स्कन्द पुराण और यम-दीपदान: अकाल मृत्यु से मुक्ति
धनतेरस की संध्या का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान ‘यम-दीपदान’ है। स्कन्द पुराण (वैष्णव खण्ड – कार्तिक माहात्म्य) और पद्म पुराण में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके यमराज के निमित्त दीप प्रज्वलित करना चाहिए:
कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे। यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनश्यति॥ (स्कन्द पुराण)
पौराणिक आख्यानों में राजा हिम के पुत्र की कथा आती है, जिसकी कुंडली में विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से अकाल मृत्यु का योग था। उसकी नवविवाहिता पत्नी ने उस तिथि पर शयन कक्ष के द्वार पर स्वर्ण-चांदी के आभूषणों का ढेर लगा दिया और चारों ओर असंख्य दीप जला दिए। जब यमराज सर्प रूप धारण कर आए, तो दीपों के दिव्य तेज और आभूषणों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं। वे अंदर प्रवेश न कर सके और मृत्यु का पाश खाली लौट गया।
इसी स्मृति में धनतेरस की संध्या को आटे अथवा मिट्टी का चौमुखा दीपक बनाकर, उसमें सरसों या तिल का तेल डालकर यम देवता का ध्यान किया जाता है:
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥
यह दीपदान मनुष्य को अकाल मृत्यु, दुर्घटना, असाध्य व्याधियों और भय से मुक्ति दिलाकर जीवन में सुरक्षा का अभय-कवच प्रदान करता है।
३. ‘धन’ का तात्विक अर्थ: धातु क्रय का रहस्य
धनतेरस पर नए बर्तन या धातु खरीदने की जो परंपरा सदियों से चली आ रही है, उसका संबंध किसी विलासिता से नहीं, बल्कि भगवान धन्वन्तरि के हाथ में स्थित ‘अमृत कलश’ से है।
- पात्र (बर्तन) का महत्व: सनातन परंपरा में खाली पात्र को दरिद्रता और जल या अन्न से भरे पात्र को पूर्णता का प्रतीक माना गया है। धन्वन्तरि जयंती पर जब हम नया पात्र घर लाते हैं, तो वह केवल धातु नहीं, बल्कि आरोग्य रूपी अमृत को धारण करने का प्रतीक होता है।
- धातुओं की सात्त्विकता: आयुर्वेद और रसशास्त्र में पीतल, तांबा, कांसा, चांदी और स्वर्ण को त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) नाशक माना गया है। तांबे और पीतल के पात्र में जल ग्रहण करना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत गुणकारी है, जबकि चांदी मानसिक शांति और शीतलता प्रदान करती है। इसलिए इस दिन सात्त्विक धातुओं को घर में स्थापित करने का विधान बना।
४. महालक्ष्मी, कुबेर और धन्वन्तरि: त्रिकोणीय संतुलन
धनतेरस केवल एक देवता की पूजा नहीं, बल्कि सृष्टि के त्रि-आयामी संतुलन का पर्व है:
- भगवान धन्वन्तरि: दैहिक और मानसिक आरोग्य के दाता (प्रथम सुख)।
- आदिशक्ति महालक्ष्मी: ऐश्वर्य, पोषण, सौहार्द और सौभाग्य की अधिष्ठात्री (द्वितीय सुख)।
- यक्षराज कुबेर: धन के संरक्षक और न्यायपूर्ण वितरण के अधिपति।
शास्त्रों के अनुसार, केवल धन का होना ही पर्याप्त नहीं है; उस धन का उपभोग करने के लिए स्वस्थ शरीर (धन्वन्तरि), धन में सात्त्विकता व शांति (लक्ष्मी) और धन के संरक्षण का विवेक (कुबेर) होना अनिवार्य है। यही कारण है कि धनतेरस पर इन तीनों शक्तियों की सम्मिलित अर्चना की जाती है।
५. पर्व का शाश्वत संदेश
धनतेरस का संदेश केवल बाह्य चकाचौंध या उपभोगवादी दौड़ नहीं है। यह पर्व अंतःकरण के शुद्धिकरण का आह्वान करता है। जिस प्रकार समुद्र मंथन में विष (हलाहल) निकलने के बाद ही अंत में अमृत घट प्रकट हुआ, उसी प्रकार जब मनुष्य अपने अंतर्मन के काम, क्रोध, लोभ और अहंकार रूपी विष का शमन करता है, तभी उसके जीवन में आरोग्य और दिव्य शांति रूपी धन्वन्तरि का प्राकट्य होता है।
स्वच्छ परिवेश, सात्त्विक जीवनशैली, दूसरों के प्रति दया और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ही इस पर्व की सच्ची पूजा है। जब घर के द्वार पर यम का दीप जलता है, तो वह केवल अंधकार को ही नहीं मिटाता, बल्कि मनुष्य के भीतर से भय, हीनता और मृत्यु के त्रास को भी भस्म कर देता है।
@ रमाकान्त पन्त @
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