जब भाई बद्रीनाथ लेकर पहुँचे भिटौल, कनारा माँ धाम में जाग उठी प्राचीन देवपरंपरा की दिव्य कथा, देखिये अद्भूत वीडियो

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आस्था का अलौकिक संगम: जब बहन कनारा मां को ‘भिटौली’ देने उनके द्वार पहुंचे भगवान बद्रीविशाल
​गंगोलीहाट (पिथौरागढ़): देवभूमि उत्तराखंड की लोक परंपराओं और आध्यात्मिक वैभव की एक अनूठी तस्वीर जनपद पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट क्षेत्र में देखने को मिली। चैत्र मास की प्रथम नवरात्रि और हिन्दू नववर्ष के पावन अवसर पर, कनारा गूंथ गांव में हिमालय की गोद और माता महाकाली के आंचल में बसी भगवान बद्रीनाथ जी की डोली अपनी बहन, कुलदेवी जय माता देवी कनारा मां को ‘भिटौली’ अर्पित करने पहुंची। इस देव-मिलन से पूरा क्षेत्र भक्तिमय और अलौकिक आभा से दमक उठा।

​भक्ति, उल्लास और देव-परंपरा का निर्वहन

​श्री श्री मां भगवती मित्र मंडल कनारा गूंथ धार्मिक संगठन के सानिध्य में आयोजित यह भिटौल पर्व अत्यंत भव्यता के साथ सम्पन्न हुआ। भगवान श्री हरि बद्रीनाथ की भव्य पालकी (डोली) जब कनारा मां धाम पहुंची, तो ढोल-नगाड़ों की थाप और “नरसिंह बद्री विशाल” व “जय माता देवी कनारा मां” के जयघोष से आसमान गूंज उठा।
​कनारा गूंथ, बोयल, बूरसम और जरमाल सहित आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने-अपने घरों से भिटौल लेकर माता के दरबार में पहुंचे। मंदिर परिसर में विशाल भंडारे का आयोजन हुआ और समापन के अवसर पर माता-बहनों द्वारा पारंपरिक झौड़ा-चांचरी और सांस्कृतिक भजन संध्या की मनमोहक प्रस्तुति दी गई।

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​पौराणिक महत्व: राजाओं के काल से चली आ रही ‘नैनाक’ परंपरा

​रामगंगा नदी के किनारे स्थित भगवान बद्रीनाथ का यह मंदिर गुमनामी के साये में होने के बावजूद गहरी आस्था का केंद्र है। स्थानीय निवासी श्री सूरज सिंह भंडारी के अनुसार, यह परंपरा सैकड़ों वर्ष पुरानी है।
​प्राचीन काल में नेपाल के राजा की प्रेरणा से कुमाऊं के राजा ने यह भूमि भगवान बद्रीनाथ को दान में दी थी और यहां भंडारी उपजाति के लोगों को बसाया था। राजाज्ञा थी कि इस भूमि पर उत्पन्न अन्न की पहली उपज (जिसे स्थानीय भाषा में ‘नैनाक’ कहा जाता है) का भोग भगवान बद्रीनाथ को लगाया जाएगा। भगवान विष्णु की कृपा से भंडारी परिजनों ने यहां बद्रीनाथ धाम की स्थापना की और यह मान्यता स्थापित हुई कि भगवान बद्रीनाथ मां कनारा के भाई हैं। इसी प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हुए हर वर्ष चैत्र की पहली नवरात्रि को भगवान बद्रीश अपनी बहन को भिटौली देने आते हैं। (ज्ञात हो कि कुमाऊं के सोमेश्वर क्षेत्र में भी बद्रीनाथ जी का एक ऐसा ही प्राचीन मंदिर है, जिसकी मूर्ति स्वयं विश्वकर्मा जी द्वारा निर्मित मानी जाती है।)

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​शूरवीरों की भूमि और नया सुगम मार्ग

​कनारा गांव न केवल आध्यात्म, बल्कि कुमाऊं के वीरों की गौरव गाथा भी समेटे हुए है। वीर चक्र विजेता और मां काली के परम भक्त स्वर्गीय श्री शेर सिंह भंडारी ने इसी भूमि पर जन्म लिया था। उन्होंने ही 1950 में पहले गणतंत्र दिवस के अवसर पर हाट काली के शक्ति स्थल पर पहली मूर्ति की स्थापना करवाई थी।

गंगोलीहाट से महज 10 किलोमीटर दूर स्थित इस धाम तक पहुंचना अब आसान हो गया है। जरमालगांव से कनारा गूंथ के लिए वीर चक्र विजेता श्री शेर सिंह भंडारी मार्ग का निर्माण एक वर्ष पूर्व ही हुआ है, जो माता देवी कनारा मां धाम की परिक्रमा करते हुए मंदिर तक जाता है।
​आयोजन को सफल बनाने वाले प्रमुख नाम
​इस भव्य डोली यात्रा और भिटौल पर्व में देश-प्रदेश से आए नारायण भक्तों के साथ-साथ आयोजन समिति का

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महत्वपूर्ण योगदान रहा:

​संरक्षक: श्री सर्वेश्वर गिरी महाराज (निरंजनी अखाड़ा)
​संघ रक्षक: श्री भीम सिंह भंडारी (चित्रगुप्त अखाड़ा वृंदावन मंडलेश्वर)
​सह-संरक्षक: श्री ठाकुर सिंह भंडारी
​आयोजक: श्री बसंत सिंह भंडारी
​सह-आयोजक: श्री संजय सिंह भंडारी
​अध्यक्ष: श्री पुष्पेंद्र सिंह भंडारी
​कुलपुरोहित: श्री जगदीश चन्द्र जोशी
​सह-कुलपुरोहित: श्री दिनेश चंद्र जोशी
​पुजारी: श्री किशोर सिंह भंडारी
​मीडिया प्रभारी: श्री सूरज सिंह भंडारी
​सह-मीडिया प्रभारी: श्री राहुल रावत
​सामाजिक एकता, भाई-बहन के स्नेह और धार्मिक आस्था की यह डोली यात्रा श्रद्धालुओं के हृदय में एक अमिट छाप छोड़ गई।

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