पावन प्रांगण में गूँजीं दिवंगत माता-पिता की स्मृतियाँ, ‘आदि शक्ति माँ अवंतिका’ पुस्तक हाथ में आते ही क्यों खिल उठीं बाबू भाई की आँखें?
लालकुआँ की पावन धरा पर विराजित माँ अवंतिका देवी का भव्य शक्तिपीठ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि अनगिनत श्रद्धालुओं की आस्था का वह दीप स्तंभ है जहाँ पहुँचते ही जीवन के सब दुख-दर्द विलीन हो जाते हैं। इस पावन धाम से स्वर्गीय श्री पी. एल. गुप्ता जी का एक ऐसा आत्मीय और निश्छल संबंध था, जिसे याद कर आज भी हर श्रद्धालु का हृदय भर आता है। अपने दिनभर के व्यावसायिक व सांसारिक दायित्वों से मुक्त होते ही उनके कदम स्वतः ही माँ के श्रीचरणों की ओर बढ़ चलते थे। जीवन की राहों में कठिनाइयों का अपरंपार समंदर था, पर उन्होंने अपने चेहरे पर कभी संताप की एक शिकन भी नहीं आने दी। माँ के प्रति उनका अगाध विश्वास ही उनका संबल था। मंदिर परिसर का भव्य जीर्णोद्धार, विशाल भंडारे, सांस्कृतिक अनुष्ठान और निर्माण कार्य—गुप्ता जी का पूरा जीवन माँ अवंतिका के चरणों में समर्पित एक पावन पुष्प की भांति बीता।
अमर स्मृतियों का एक पावन प्रसंग: लीलावती देवी (सीमा देवी) को समर्पित यह धाम
इस मंदिर की हर एक दीवार और हर एक पत्थर एक ऐसी मूक गाथा सुनाते हैं, जो समर्पण और वात्सल्य की अनुपम मिसाल है। यह जानकर हृदय और भी द्रवित हो उठता है कि इस भव्य मंदिर का निर्माण स्वर्गीय श्री पी. एल. गुप्ता जी और उनके स्नेही परिजनों ने परिवार की आधारशिला रहीं स्वर्गीया लीलावती देवी (सीमा देवी) की मधुर स्मृति में कराया था। अपनी जीवनसंगिनी के प्रति असीम प्रेम और माँ अवंतिका के प्रति अटूट आस्था का संगम करते हुए, स्वर्गीय पी एल गुप्ता व गुप्ता परिवार ने इस मंदिर का नवनिर्माण कराकर लीलावती जी की यादों को अनंत काल के लिए अमर कर दिया। इस प्रांगण में जलने वाला हर दीप आज भी उसी पवित्र बंधन और निश्छल प्रेम की गवाही देता है।
समय के क्रूर चक्र ने भले ही उनसे उनका पार्थिव शरीर छीन लिया हो, लेकिन उनके द्वारा बोए गए भक्ति के बीज आज भी उनके परिवार में अमर हैं। इसी पावन विरासत को सींचते हुए उनके सुपुत्र और समूचे क्षेत्र के चहेते राकेश गुप्ता (बाबू भाई) आज जब माँ अवंतिका के प्रांगण में पधारे, तो समूचा वातावरण एक अजीब सी भावुकता से भर उठा। ऐसा लगा मानो बाबू भाई के रूप में स्वयं स्वर्गीय गुप्ता जी की पुण्य आत्मा अपने प्रिय धाम को निहारने उतरी हो। बाबू भाई ने अत्यंत भावपूर्ण और सजल हृदय से माँ के चरणों में अपनी श्रद्धा के पुष्प अर्पित किए। उन्होंने मंदिर परिसर में चल रहे विकास कार्यों का अवलोकन किया और निस्वार्थ भाव से जुटी कमेटी के प्रयासों की मुक्तकंठ से सराहना की।
इस अलौकिक और भावुक क्षण में जब मंदिर कमेटी द्वारा उन्हें ‘आदि शक्ति माँ अवंतिका’ की पावन पुस्तक सप्रेम भेंट की गई, तो मानो माता-पिता की स्मृतियों का एक समंदर आँखों के कोर से छलक पड़ा। पुस्तक को अपने हाथों में थामते ही बाबू भाई का हृदय खिल उठा और वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति के हृदय में माँ के प्रति अद्भुत आस्था का संचार देखने को मिला। ऐसा प्रतीत हुआ मानो इस पुस्तक के रूप में माँ अवंतिका का वरदहस्त, पूज्य पिता का वात्सल्य और माता लीलावती देवी का आशीर्वाद एक साथ उन्हें प्राप्त हो गया हो। माता-पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए उनका समूचा परिवार आज भी पूर्ण समर्पण भाव से मंदिर की सेवाओं में निरंतर जुटा हुआ है।
इस अत्यंत भावुक और गरिमामयी अवसर पर मंदिर कमेटी के अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह खाती, एडवोकेट हरीश नैनवाल, समाजसेवी नारायण सिंह बिष्ट, दीपू नयाल, मंगल सिंह, अभिषेक सिंह, रौनक कनवाल सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे। सभी की आँखें इस अद्भुत भक्ति और आत्मीयता को देखकर श्रद्धा से नतमस्तक हो उठीं।
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