हल्द्वानी
सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, तब ब्रह्मांड में एक ऐसी अदृश्य हलचल होती है जो मृत्युलोक और पितृलोक के बीच की दूरियों को समाप्त कर देती है। सुप्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य एवं धर्मशास्त्री डॉ. नवीन के अनुसार, 16 दिनों का यह पितृपक्ष मात्र एक कर्मकांड नहीं, बल्कि पितरों की चेतना का पृथ्वी के निकट आने का एक दुर्लभ खगोलीय व आध्यात्मिक संयोग है।
डॉ. नवीन ने बताया कि इस वर्ष पितरों के प्रति श्रद्धा, तर्पण और कृतज्ञता अर्पित करने का महापर्व पार्वण श्राद्ध 26 सितम्बर 2026 को पूर्णिमा तिथि से आरंभ हो रहा है, जबकि महालया श्राद्ध का प्रथम श्राद्ध 27 सितम्बर 2026 (रविवार) को प्रतिपदा से शुरू होगा। ‘पर्वणि भव पार्वण:’ की व्याख्या करते हुए डॉ. नवीन स्पष्ट करते हैं कि पितरों का विशेष पर्व होने के कारण ही इसे पार्वण श्राद्ध कहा जाता है। इन 16 दिनों में पितर पृथ्वी के अत्यंत निकट रहकर अपने वंशजों के श्रद्धा-अन्न और जल की प्रतीक्षा करते हैं।
पितृ पूजन से मिलता है आयु, संतान और ऐश्वर्य का वरदान
डॉ. नवीन के अनुसार शास्त्रों में पितृ पूजन को देव पूजन के समान ही फलदायी माना गया है। जो साधक श्रद्धा भाव से तर्पण व श्राद्ध करते हैं, उन्हें पितृ देवता प्रसन्न होकर अमोघ आशीर्वाद प्रदान करते हैं:
आयु: प्रजां यश: स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियं। पशून सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृ पूजनात् ।।
डॉ. नवीन ने श्लोक का मर्म समझाते हुए बताया कि पितरों के निमित्त किया गया पूजन कभी व्यर्थ नहीं जाता; इससे मनुष्य को दीर्घायु, सुयोग्य संतति, यश, स्वर्ग, शारीरिक पुष्टि, बल, वैभव, सुख और धन-धान्य की पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है।
डॉ. नवीन जोशी जी द्वारा प्रामाणित: पार्वण श्राद्ध 2026 तिथिवार सारणी
श्राद्ध कर्म पितरों की देहावसान तिथि पर ही करना शास्त्रसम्मत है। डॉ. नवीन ने माताओं व सौभाग्यवती स्त्रियों के श्राद्ध के लिए 4 अक्टूबर (मातृ नवमी) की तिथि को अत्यंत विशेष बताया है:
| तिथि | श्राद्ध का विधान | दिनांक (2026) |
|---|---|---|
| पूर्णिमा | प्रोष्ठपदी / पूर्णिमा श्राद्ध | 26 सितम्बर |
| प्रतिपदा | महालया आरम्भ / प्रतिपदा श्राद्ध | 27 सितम्बर |
| द्वितीया | द्वितीया श्राद्ध | 28 सितम्बर |
| तृतीया | तृतीया श्राद्ध | 29 सितम्बर |
| चतुर्थी एवं पंचमी | भरणी श्राद्ध / संयुक्त तिथि | 30 सितम्बर |
| षष्ठी | षष्ठी तिथि श्राद्ध | 1 अक्टूबर |
| सप्तमी | सप्तमी तिथि श्राद्ध | 2 अक्टूबर |
| अष्टमी | अष्टका / अष्टमी श्राद्ध | 3 अक्टूबर |
| नवमी | मातृ नवमी श्राद्ध | 4 अक्टूबर |
| दशमी | दशमी तिथि श्राद्ध | 5 अक्टूबर |
| एकादशी | एकादशी श्राद्ध | 6 अक्टूबर |
| द्वादशी | संन्यासी / यति श्राद्ध | 7 अक्टूबर |
| त्रयोदशी | मघा त्रयोदशी श्राद्ध | 8 अक्टूबर |
| चतुर्दशी | शस्त्र व अकाल मृत्यु श्राद्ध | 9 अक्टूबर |
| अमावस्या | सर्वपितृ विसर्जन अमावस्या | 10 अक्टूबर |
पंचबलि, कुश और काले तिल: इनके बिना तृप्त क्यों नहीं होते पितर?
डॉ. नवीन जोशी ने रेखांकित किया कि पार्वण श्राद्ध में केवल ब्राह्मण भोज ही पूर्णता नहीं लाता, बल्कि प्रकृति के विभिन्न जीवों तक अन्न पहुंचाना अनिवार्य है:
- पंचबलि का शास्त्रीय रहस्य: डॉ. नवीन जोशी जी के अनुसार, श्राद्ध का भोजन तैयार होने पर सबसे पहले 5 जीवों के लिए अंश निकाला जाता है—गौ (गाय), काक (कौवा), श्वान (कुत्ता), पिपीलिका (चींटी) और देव बलि। ये पांचों माध्यम प्रकृति के विभिन्न आयामों के जरिए पितृ ऊर्जा से संपर्क स्थापित करते हैं।
- कुश, जौ और काले तिल की अनिवार्यता: तर्पण के समय हाथ में कुश की पवित्री, जल में जौ और काले तिल का होना अनिवार्य है। काले तिल नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करते हैं और कुश ऊर्जा का सुचालक बनकर संकल्प को पितरों तक पहुंचाता है।
- नित्य तर्पण और दान: पूरे 16 दिनों तक दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जलांजलि देने, ब्राह्मणों को सात्विक भोजन कराने और निर्धनों को सामर्थ्यानुसार दान देने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और कुल की वृद्धि होती है।
26 सितम्बर से शुरू होकर 10 अक्टूबर को सर्वपितृ विसर्जन अमावस्या तक चलने वाला यह पक्ष अदृश्य पूर्वजों से आशीर्वाद पाने और अपने संस्कारों को जीवंत रखने का सबसे पवित्र काल है।
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