जब दैत्यों की चर्बी से बनी थी यह पृथ्वी: देवभूमि का वह आदि-रहस्य, जिसे सुन कैलाश पर कांप उठे थे देवता

ख़बर शेयर करें

 

शून्य से जन्मी मेदिनी: मानसखण्ड का वह प्रलयंकारी रहस्य, जिसे सुन कैलाश पर मौन हो गए थे देवता

हिमालय की उन अगम्य, बर्फ से ढकी और रहस्यमयी चोटियों के बीच जब रात का सन्नाटा उतरता है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं सृष्टि का आदि-नाद अब भी इन वादियों में गूंज रहा हो। देवदारों के घने जंगल, बादलों में लिपटे शिखर और कैलाश की ओर बहती शीतल हवाएं आज भी उस ब्रह्मांडीय रहस्य की साक्षी हैं, जिसे सुनने के लिए कभी देवता, ऋषि, गंधर्व, नाग और अप्सराएं कैलाश पर्वत पर एकत्रित हुए थे।

यह कथा केवल पृथ्वी की उत्पत्ति की नहीं, बल्कि उस “मेदिनी” की है, जिसके गर्भ से आगे चलकर मानसखण्ड और देवभूमि कुमाऊँ का प्राकट्य हुआ। यह रहस्य स्कंद पुराण के मानसखण्ड में वर्णित है, जिसे महर्षि वेदव्यास ने प्रकट किया और सूत जी ने राजा जनमेजय को सुनाया।

जब केवल शून्य था और जल ही जल

कल्पना कीजिए उस समय की, जब न दिन था, न रात… न आकाश था, न पृथ्वी… केवल एक अनंत जलराशि थी, जिसमें काल भी मौन पड़ा था।

उस अथाह प्रलय-सागर के मध्य शेषनाग की दिव्य शय्या पर परमपुरुष भगवान विष्णु योगनिद्रा में लीन थे। उनकी नाभि से निकले कमल पर सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा विराजमान थे। सम्पूर्ण ब्रह्मांड में केवल मौन था एक ऐसा मौन, जिसके भीतर आने वाली सृष्टि का रहस्य छिपा था।

यह भी पढ़ें 👉  अयोध्या से लालकुआँ पहुंची एक दिव्य अनुभूति, अवंतिका शक्तिपीठ में सदियों पुरानी धूनी के पुनरुद्धार के पीछे छिपा है कौन सा आध्यात्मिक रहस्य?

तभी उस शांति को चीरती हुई एक विचित्र घटना घटी।
भगवान विष्णु के कानों के मैल से दो महाभयंकर दैत्यों का जन्म हुआ— मधु और कैटभ। उनका आकार पर्वतों के समान विशाल और तेज अग्नि के समान प्रचंड था। जन्म लेते ही वे अहंकार और शक्ति के मद में चूर हो उठे।
जब उनकी दृष्टि कमल पर विराजमान ब्रह्मा पर पड़ी, तो वे उन्हें नष्ट करने के लिए दौड़े। ब्रह्मांड के उस आदिकाल में पहली बार भय ने जन्म लिया। चारों ओर जल ही जल था और उसी जल में ब्रह्मा की व्याकुल पुकार गूंज उठी।

सहस्रों वर्षों तक चला वह प्रलयंकारी युद्ध

ब्रह्मा की स्तुति सुन भगवान विष्णु की योगनिद्रा भंग हुई। उन्होंने देखा कि दो असुर सृष्टि के मूल को ही समाप्त करना चाहते हैं। तब आरंभ हुआ एक ऐसा युद्ध, जिसे न पृथ्वी ने देखा था और न आकाश ने। अनंत जलराशि के मध्य भगवान विष्णु और मधु-कैटभ के बीच सहस्रों वर्षों तक भीषण बाहुयुद्ध चलता रहा। कभी जल अग्नि समान उफनता, कभी ब्रह्मांड कांप उठता। देवता भयभीत होकर उस युद्ध को देख रहे थे। लेकिन वे दोनों दैत्य अत्यंत बलशाली थे। अंततः भगवान हरि ने अपने दिव्य सुदर्शन चक्र का आह्वान किया। एक प्रचंड प्रकाश उठा, जिसने उस आदिकालीन अंधकार को चीर दिया और अगले ही क्षण मधु और कैटभ के मस्तक धड़ से अलग होकर उस अनंत जल में गिर पड़े।

यह भी पढ़ें 👉  अयोध्या से लालकुआँ पहुंची एक दिव्य अनुभूति, अवंतिका शक्तिपीठ में सदियों पुरानी धूनी के पुनरुद्धार के पीछे छिपा है कौन सा आध्यात्मिक रहस्य?

दैत्यों के ‘मेद’ से बनी यह पृथ्वी

मेदिनी यहीं से प्रारंभ होता है उस महान रहस्य का सबसे अद्भुत अध्याय। जब मधु और कैटभ का अंत हुआ, तब उनके विशाल शरीरों का ‘मेद’ अर्थात चर्बी उस अनंत जल में फैलने लगी। धीरे-धीरे वही मेद जमकर स्थिर होने लगा और उससे पर्वतों, द्वीपों और धरती का निर्माण हुआ। इसी कारण इस पृथ्वी को “मेदिनी” कहा गया अर्थात वह भूमि जो ‘मेद’ से उत्पन्न हुई।
लेकिन नवजात पृथ्वी अभी अस्थिर थी। तब भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार धारण किया और अपनी विशाल पीठ पर इस पृथ्वी को धारण कर उसे स्थिरता प्रदान की। उसी क्षण सृष्टि ने अपना पहला संतुलन पाया।

मानसखण्ड का प्राकट्य और जीवन का प्रथम स्पंदन

पृथ्वी की रचना के बाद भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने सृष्टि विस्तार का कार्य आरंभ किया। उन्होंने स्वर्ग, अंतरिक्ष और पृथ्वी सहित नौ दिव्य खण्डों की रचना की। मन, वाणी, काल, काम, क्रोध और समस्त भावों का जन्म हुआ।
ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीचि उत्पन्न हुए और उनसे महर्षि कश्यप। आगे चलकर कश्यप से देवता, दानव, यक्ष, गंधर्व, नाग, अप्सराएं, पशु, पक्षी, वृक्ष और मनुष्यों की उत्पत्ति हुई।
समय बीतता गया और इसी सृष्टि में आगे चलकर प्रकट हुए महान राजा पृथु। जब पृथ्वी पर अकाल और संकट आया, तब उन्होंने पृथ्वी रूपी गौ का दोहन कर प्रजा के लिए अन्न, औषधि और जीवन का मार्ग प्रशस्त किया।
कहा जाता है कि पृथ्वी का सबसे पवित्र भाग वही था, जहाँ देवताओं की चेतना सबसे पहले अवतरित हुई और वही आगे चलकर “मानसखण्ड” कहलाया।

यह भी पढ़ें 👉  अयोध्या से लालकुआँ पहुंची एक दिव्य अनुभूति, अवंतिका शक्तिपीठ में सदियों पुरानी धूनी के पुनरुद्धार के पीछे छिपा है कौन सा आध्यात्मिक रहस्य?

कुमाऊँ की निस्तब्ध घाटियों में आज भी जीवित है वह आदि-रहस्य

आज जब कोई यात्री कुमाऊँ की रहस्यमयी वादियों, जागेश्वर के देवदारों, पाताल भुवनेश्वर की गुफाओं या आदि कैलाश की ओर बढ़ता है, तो वह केवल पर्वतों और नदियों के बीच नहीं चलता— वह उस मेदिनी के भीतर प्रवेश करता है, जिसने सृष्टि का पहला स्पर्श देखा था।

मान्यता है कि देवताओं ने मानसखण्ड को अपना निवास इसलिए चुना, क्योंकि यह भूमि उस प्रथम ब्रह्मांडीय युद्ध और सृष्टि की पहली सांस की साक्षी रही।

शायद यही कारण है कि हिमालय की इन निस्तब्ध वादियों में आज भी एक अदृश्य ध्वनि सुनाई देती है मानो शून्य स्वयं अब भी उस आदि-सृष्टि की कथा दोहरा रहा हो।

Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad