कहाँ जलते हैं अदृश्य दीप और कौन है मणियों वाला वह रक्षक नाग? स्कंद पुराण के पन्नों से खुला माँ शाकम्भरी पीठ का गूढ़ रहस्य

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महादेव जी  ने माता पार्वती को बताया था ब्रह्मांड का सबसे गोपनीय ” क्षेत्र; अकाल और संहार के बीच कैसे जागी थी संजीवनी शक्ति?
सहारनपुर / 
उत्तर भारत की सुरम्य शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी में छिपा एक ऐसा दिव्य स्थान, जिसके रहस्य को स्वयं देवाधिदेव महादेव ने युगों पहले माँ पार्वती के समक्ष प्रकट किया था। क्या आप जानते हैं कि एक ऐसा भी शक्तिपीठ है जहाँ की बालुका (रेत) में तांबे और सोने के कण चमकते हैं, जहाँ कार्तिक की काली रात में देव-अप्सराएं दीपमालाएं सजाती हैं, और जहाँ एक महाविषधर नाग स्वयं अपनी मणि की चमक से मरकत (पन्ने) के शिवलिंग की रक्षा करता है?
यह कोई काल्पनिक कथा नहीं, बल्कि सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथ स्कंद पुराण (केदारखंड, अध्याय 46) में दर्ज माँ शाकम्भरी पीठ का वह विस्मयकारी सत्य है, जो आज भी तंत्र, योग और आस्था की दुनिया में सबसे बड़ा कौतूहल बना हुआ है।
रहस्य का पहला द्वार: जब मुनियों की रक्षा के लिए प्रकट हुईं ‘शाकम्भरी’
सनातन परंपरा में माँ दुर्गा के संहारक रूपों की गाथाएं सर्वविदित हैं, किंतु माँ शाकम्भरी का प्राकट्य संहार के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण चराचर जगत को नवजीवन देने के लिए हुआ था। जब पृथ्वी पर सौ वर्षों का महाअकाल पड़ा, नदियां सूख गईं और मुनि-ऋषि त्राहि-त्राहि करने लगे, तब आदिशक्ति ने अपने श्रीविग्रह से फल, कंद-मूल, शाक और औषधियां प्रकट कर सृष्टि को भूख के कालमुख से बचाया।
स्कंद पुराण में महादेव स्वयं इस पीठ का महात्म्य बताते हुए कहते हैं:
> अन्यदस्ति देवेशि पीठं प्रत्ययकारकम्।
> शाकम्भरी यत्र जाता मुनीनां त्राणकारणात्॥
> तत्पीठं परमं प्रोक्तं सर्वपापप्रणाशनम्।
> गत्वा शाकम्भरीपीठे नत्वा शाकम्भरीं तथा।
> दशाश्वमेधयज्ञीयफलं प्राप्नोति मानवः॥
> (स्कंद पुराण, केदारखंड, ४६.१-३)
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भावार्थ: हे देवेश्वरि! मुनियों की प्राण-रक्षा के निमित्त जहाँ माँ शाकम्भरी प्रकट हुईं, वह पीठ परम विश्वासप्रद और समस्त पापों का नाश करने वाला है। इस पावन पीठ में जाकर शाकम्भरी देवी को केवल प्रणाम कर लेने से मनुष्य को दस अश्वमेध यज्ञों का महापुण्य प्राप्त होता है।
अलौकिक संकेत: मणियुक्त ‘एलापर्ण’ नाग और पर्वत पर झंकृत होती नुपूरों की ध्वनि
स्कंद पुराण के अनुसार, यह कोई साधारण भौगोलिक स्थान नहीं है। यहाँ आज भी सूक्ष्म जगत की अलौकिक घटनाएं घटित होती हैं। महादेव ने इस पीठ की पहचान बताते हुए एक विशाल शाक (सागौन) के वृक्ष का उल्लेख किया है, जहाँ साक्षात् सिंह देवी की प्रीति के कारण विचरण करता है।
इसी क्षेत्र में ‘एलापर्ण’ नामक एक विशाल कृष्णवर्ण नाग निवास करता है, जिसके फण पर दिव्य मणि प्रकाशित रहती है। इससे भी अधिक विस्मयकारी है कार्तिक मास की वह रात्रि, जिसका वर्णन महादेव ने इन शब्दों में किया है:
> कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां कार्त्तिके मासि सुव्रते।
> शङ्करे पर्वते तत्र दीपानां ततिरुज्ज्वला॥
> सुरनार्यो नृत्यमाना दीपान् संगृह्य पार्वति।
> आयान्ति देवि ते पार्श्वे किंकिणीक्वणितैर्युताः॥
> (स्कंद पुराण, केदारखंड, ४६.६, ८)
>
भावार्थ: कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शंकर पर्वत पर दीपकों की उज्ज्वल पंक्तियां जगमगा उठती हैं। हे पार्वती! देवलोक की अप्सराएं हाथों में जलते दीप लेकर, अपने घुंघरुओं की मधुर झंकार के साथ देवी के समीप नृत्य करती हुई आती हैं।
महादेव आगे बताते हैं कि देवी के दक्षिण भाग में उनका अत्यंत पुण्यदायी ‘मरकत (पन्ने) का शिवलिंग’ स्थित है, जिसे नागराज अपने फण से आच्छादित कर सदा वास करते हैं।
वाम भाग में पापनाशिनी नंदिनी नदी और ‘सौ घंटों’ वाले रुरु भैरव
इस दिव्य क्षेत्र की सीमाएं केवल देवी मंदिर तक सीमित नहीं हैं। पीठ के वाम (बाएं) भाग में अमृतमयी नंदिनी नदी बहती है, जिसमें केवल एक बार स्नान करने मात्र से साधक को परम गति (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
मंदिर में प्रवेश से पूर्व की व्यवस्था का विधान बताते हुए शास्त्र कहते हैं:
> तस्य वै वामभागे तु नदी वै नन्दिनी मता।
> तस्यां नद्यां सकृत्स्नात्वा लभते वै परां गतिम्॥
> भैरवस्तत्प्रदेशे वै रुरुनाम्नेति विश्रुतः।
> घण्टाशतसमायुक्तो नत्वा तं संविशेत्ततः॥
> (स्कंद पुराण, केदारखंड, ४६.१०-११)
>
भावार्थ: नंदिनी नदी में एक बार स्नान करने वाला परम गति पाता है। वहीं ‘रुरु’ नामक विख्यात भैरव विराजमान हैं, जिनके पास सौ दिव्य घंटियां सुशोभित हैं। साधक को पहले रुरु भैरव को नमन करके ही इस शक्ति क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए।
५ रात्रियों का रहस्य: जब जाग उठती हैं असीम सिद्धियां
स्कंद पुराण के अनुसार यह क्षेत्र दो योजन चौड़ा और तीन योजन लंबा है, जहाँ शुक्राचार्य का तपोवन और तांबे-सोने के रंग की चमत्कारी बालुका विद्यमान है। महादेव ने इसे ब्रह्मांड का सबसे गोपनीय क्षेत्र घोषित करते हुए मंत्र-सिद्धि का अचूक मार्ग बताया है:
> गुह्याद्गुह्यतरं क्षेत्रं दर्शनात् पापनाशकम्।
> यत्र स्थित्वा पञ्चरात्रं नियतो नियताशनः।
> प्राप्नोति विपुलां सिद्धिं जपन्वै जगदम्बिकाम्॥
> (स्कंद पुराण, केदारखंड, ४६.१६-१७)
>
भावार्थ: यह क्षेत्र ‘गुह्य से भी अति गुह्य’ (परम गोपनीय) है, जिसके मात्र दर्शन से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। जो साधक यहाँ संयमित रहकर पांच रात्रियों तक अल्पाहार/युक्ताहार करते हुए जगदम्बा के मूल मंत्र का जप करता है, उसे विपुल और दुर्लभ सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
देवी भागवत से लेकर महाभारत तक: माँ के विराट वैभव का विस्तार
माँ शाकम्भरी की महिमा केवल स्कंद पुराण तक सीमित नहीं है, अपितु सनातन वांग्मय के प्रत्येक शीर्ष ग्रंथ में उनका जयघोष अंकित है:
* देवी भागवत पुराण: जब दानव दुर्गमासुर ने वेदों को चुरा लिया और त्रैलोक्य में सूखा पड़ गया, तब माँ ने अपने अश्रुओं से जल की धाराएं और शरीर से शाक-वनस्पतियां उत्पन्न कर ‘शाकम्भरी’ नाम सार्थक किया।
* मार्कण्डेय पुराण (देवी माहात्म्य): देवी स्पष्ट उद्घोष करती हैं कि जब-जब संसार में पोषण संकट आएगा, वे शाकम्भरी रूप में वनस्पतियों द्वारा प्राणियों का भरण-पोषण करेंगी।
* महाभारत (अनुशासन पर्व) व ब्रह्मांड/लिंग पुराण: इन ग्रंथों में माँ को जगत की ‘अन्नदात्री’, ‘जीवनदायिनी’ और ‘सर्वोषधि स्वरूपा’ शक्ति के रूप में वंदित किया गया है।
भारतभर में फैले सिद्ध केंद्र: राजस्थान से लेकर मालवा तक गूँजती आस्था
सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) स्थित शाकम्भरी पीठ जहाँ इस परंपरा का मुख्य धुरी-केंद्र है, वहीं देश के विभिन्न कोनों में माँ के जाग्रत धाम विद्यमान हैं:
* शाकम्भरी माता मंदिर, सीकर (राजस्थान) – शेखावाटी की कुलदेवी के रूप में विख्यात अरावली की घाटी में स्थित प्राचीन धाम।
* शाकम्भरी देवी, सिरोही व चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) – शौर्य और साधना का संगम स्थल।
* मालवा व गुजरात के शक्तिपीठ – जहाँ माँ ‘अन्नपूर्णा’, ‘वनदेवी’ और ‘फलदा’ स्वरूप में पूजी जाती हैं।
आध्यात्मिक संदेश: आज के युग में शाकम्भरी उपासना का वास्तविक अर्थ
आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण असंतुलन, जल संकट और प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रही है, माँ शाकम्भरी का संदेश केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहकर ‘प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व’ का महामंत्र बन जाता है।
माँ शाकम्भरी की सच्ची भक्ति वही है जो:
* भूखों को अन्न और तृषितों को जल प्रदान करे।
* वन, वृक्ष और औषधियों का संरक्षण करे।
* समस्त जीव-जगत के प्रति करुणा और संवेदनशीलता का भाव रखे।
नवरात्रि और पर्व-त्योहारों पर जुटने वाली लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ केवल एक प्रतिमा के आगे शीश नहीं झुकाती, बल्कि उस शाश्वत अन्नपूर्णा शक्ति का वंदन करती है जो हर पत्ते, हर दाने और हर सांस में जीवन बनकर बह रही है।
जय माँ शाकम्भरी! जय अन्नपूर्णा माता!

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