【 पितृ पक्ष विशेष 】 शिला पर शिव-चरण और त्रिवेणी की अमृत-धार: क्या पूर्वजों के तर्पण बिना अधूरा है जीवन का शृंगार?

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【 पितृ पक्ष विशेष 】

शिला पर शिव-चरण और त्रिवेणी की अमृत-धार: क्या पूर्वजों के तर्पण बिना अधूरा है जीवन का शृंगार?

संसार की आपाधापी और नश्वर वैभव के पीछे भागती मानव चेतना जब जीवन के सांझवेला में ठहरती है, तब एक मौन प्रश्न अंतस को मथने लगता है—जिस रक्त और कुल से हमें यह देह मिली, क्या उनके प्रति हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं? पितृ पक्ष केवल आश्विन की सोलह तिथियों का विधान नहीं, बल्कि यह अपनी जड़ों को कृतज्ञता का अर्घ्य देने का पावन महाउत्सव है। कूर्मपुराण के ३४वें अध्याय में महर्षि रोमहर्षण के मुख से निसृत वचन यह स्पष्ट करते हैं कि मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले साधक के लिए तीर्थराज प्रयाग और मोक्षधाम गया केवल तीर्थ नहीं, अपितु पितृ-ऋण से मुक्ति के प्रत्यक्ष दिव्य सोपान हैं।

१. प्रयाग: ब्रह्मा का पंच-योजन यज्ञ-पीठ और कुलों का पावन संगम

पुराणों के अनुसार तीर्थराज प्रयाग की महिमा अनिर्वचनीय है। यहाँ स्नान, दान और तर्पण करने से साधक के माता और पिता—दोनों कुलों की पीढ़ियाँ निष्पाप होकर दैवीय अनुग्रह प्राप्त करती हैं। दंभ और मात्सर्य (अहंकार और ईर्ष्या) से मुक्त होकर किया गया छोटा सा सत्कर्म भी यहाँ अनंत गुना फलदायी सिद्ध होता है।

पञ्चयोजनविस्तीर्णं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः। प्रयागं प्रथितं तीर्थं तस्य माहात्म्यमीरितम्॥

पाँच योजन के पावन विस्तार में फैला यह वही प्रयाग क्षेत्र है, जिसे परमेष्ठी ब्रह्मा की प्रधान वेदी कहा गया है। यहाँ त्रिवेणी के पावन जल में डुबकी लगाते ही मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के संचित पाप कपूर की भांति भस्म हो जाते हैं। पितरों के निमित्त प्रयाग में किया गया श्राद्ध पूर्वजों के लिए देवलोक के द्वार खोल देता है और वंशजों के गृह में सुख-शांति व संतति-वृद्धि का वरदान स्थापित करता है।

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२. गया धाम: जहाँ महादेव ने स्वयं रचा शिला पर मुक्ति का विधान

यदि प्रयाग को तीर्थों का राजा कहा गया है, तो ‘गया’ को पितरों का हृदयस्थल माना गया है। कूर्मपुराण उद्घोष करता है कि समस्त ब्रह्मांड में गया तीर्थ के समान पितरों को प्रिय और कोई गुप्त धाम नहीं है।

गयातीर्थं परं गुह्यं पितॄणां चातिवल्लभम्। कृत्वा पिण्डप्रदानं तु न भूयो जायते नरः॥

समस्त लोकों के कल्याण हेतु साक्षात् देवाधिदेव परमात्मा शिव ने गया के पाषाण (शिलातल) पर अपने पवित्र चरण-चिह्न स्थापित किए हैं। जो मनुष्य वहाँ जाकर पूर्ण श्रद्धा और एकाग्र चित्त से पिण्डदान करता है, उसके पितर नरक और प्रेत-योनियों के दारुण कष्टों से तत्काल मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होते हैं। इतना ही नहीं, श्रद्धापूर्वक गया-श्राद्ध करने वाला व्यक्ति भी आवागमन के बंधन को काट देता है और उसे इस नश्वर संसार में दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता।

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पुराणों में यहाँ तक चेतावनी दी गई है कि जो व्यक्ति धन और सामर्थ्य होते हुए भी गया जाकर पितरों का तर्पण नहीं करता, उसके अन्य समस्त पुण्य, तप और परिश्रम व्यर्थ हो जाते हैं और उसके पितर परलोक में भारी विषाद में डूब जाते हैं।

३. पितरों की गाथा: संतानों से क्यों बंधी रहती है पूर्वजों की आस?

पितृलोक में निवास करने वाले पूर्वज निरंतर एक ही आशा लगाए रहते हैं कि उनके वंश में कोई ऐसा धर्मात्मा उत्पन्न हो जो उनका उद्धार करे। महर्षियों के अनुसार पितर स्वयं इस गाथा का गान करते हैं:

एष्टव्या बहवः पुत्राः शीलवन्तो गुणान्विताः। तेषां तु समवेतानां यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्॥

मनुष्य को सदा शीलवान और गुणवान संतानों की कामना इसीलिए करनी चाहिए, ताकि उन पुत्रों में से यदि कोई एक भी गया तीर्थ जाकर विधिवत पिण्डदान कर दे, तो कुल की सात-सात पीढ़ियाँ एक साथ भवसागर से तर जाती हैं। चाहे वंशज किसी कारणवश साधारण आचरण का भी रहा हो, यदि उसने गया की पावन रज में पितरों को तिल और जौ से तर्पण अर्पित कर दिया, तो पितर तृप्त होकर अपने संपूर्ण वंश को समृद्धि, दीर्घायु और आरोग्य का आशीष देते हैं।

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अहंता का विसर्जन: जब महादेव ने दिया मङ्कणक मुनि को भस्म-दर्शन

कूर्मपुराण का यह पावन अध्याय केवल तीर्थ-माहात्म्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह तर्पण और उपासना की उस आंतरिक शुद्धि को भी रेखांकित करता है जिसके बिना मोक्ष असंभव है। जब सप्तसारस्वत तीर्थ पर ‘नमः शिवाय’ जपते हुए मङ्कणक मुनि अपनी तपस्या के मद में उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे, तब स्वयं भगवान् आशुतोष ने उनके समक्ष अपनी देह विदीर्ण करके रक्त की जगह धवल भस्म की धारा बहा दी।

महादेव ने विश्वरूप दिखाकर मुनि का अहंकार चूर किया और समझाया कि परमात्मा ही कालरूप, प्रकृति और पुरुष के मूल हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश उसी एक परब्रह्म के रूप हैं।

संदेश स्पष्ट है: पितृ पक्ष में प्रयाग की त्रिवेणी का स्पर्श हो या गया की पावन शिला पर पिण्डदान, यह कर्मकांड तब जीवंत होता है जब मन का अहंकार गल जाए और हृदय में पूर्वजों के प्रति सच्चा समर्पण जाग उठे। आइए, इस पितृ पक्ष में अपनी संकीर्णताओं को त्यागकर अपने पितरों के निमित्त श्रद्धा का दीप जलाएं और अपने कुलों को तरण-तारण का मार्ग प्रशस्त करें।

@ रमाकान्त पन्त @

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