भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी के बीच, जहाँ हर व्यक्ति समय से होड़ करता दिखाई देता है, वहीं एक स्थान ऐसा भी है जहाँ कदम रखते ही मन को ठहराव मिल जाता है। यह है श्री सिद्धिविनायक गणेश मंदिर, जो महाराष्ट्र राज्य की राजधानी मुंबई के प्रभा देवी क्षेत्र में स्थित है।
कहा जाता है कि इस मंदिर की नींव केवल पत्थरों से नहीं, बल्कि एक माँ की ममता और पुत्र की निष्कलंक भक्ति से रखी गई थी। सन् 1801 में एक निःसंतान महिला देउबाई पाटिल ने अपनी अंतिम इच्छा के रूप में इस मंदिर का निर्माण कराया था, ताकि जो भी यहाँ आए, वह संतान सुख और मनोकामनाओं की पूर्ति पाए।
मंदिर में विराजमान भगवान गणेश की प्रतिमा काले पत्थर से निर्मित है और यह दाईं सूंड वाली दुर्लभ प्रतिमा मानी जाती है। मान्यता है कि दाईं सूंड वाले गणपति शीघ्र फल देते हैं, किंतु उनकी पूजा भी पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ करनी होती है। यही कारण है कि यहाँ आने वाला हर भक्त अपने मन की गहराइयों से विघ्नहर्ता को पुकारता है।
सुबह की पहली आरती के समय शंख और घंटियों की गूंज से पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय हो उठता है। किसी की आँखों में रोजगार की आस होती है, कोई संतान सुख की कामना लेकर आता है, तो कोई जीवन की उलझनों से मुक्ति की प्रार्थना करता है।
इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ अमीर-गरीब, आम श्रद्धालु से लेकर बड़े-बड़े उद्योगपति, कलाकार और जनप्रतिनिधि तक सभी एक ही पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं। गणपति के दरबार में सभी समान हैं।
शाम की आरती के समय जब दीपों की पंक्तियाँ जगमगाती हैं और “जय देव जय देव” की स्वर लहरियाँ वातावरण में गूंजती हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं भगवान गणेश भक्तों के कष्ट हर रहे हों।
शोरगुल से भरी मुंबई के बीच स्थित यह मंदिर एक ऐसा आध्यात्मिक ठहराव है, जहाँ आकर इंसान स्वयं से मिलता है और मन को शांति मिलती है।
और तभी हृदय से आवाज़ निकलती है
“जहाँ विश्वास है, वहीं सिद्धि है… और जहाँ सिद्धिविनायक हैं, वहाँ हर विघ्न स्वयं ही दूर हो जाता है।”
लेटैस्ट न्यूज़ अपडेट पाने हेतु -
👉 वॉट्स्ऐप पर हमारे समाचार ग्रुप से जुड़ें
