नैनीताल / जनपद की हसीन वादियों में बसा चोसला वन क्षेत्र हाल ही में एक ऐसी हलचल का गवाह बना, जिसने पूरे इलाके में कौतूहल और उत्साह का माहौल पैदा कर दिया। दूर-दूर से पहुंचे लोग और हाथों में कुदाल-फावड़े थामे दिग्गजों का जमावड़ा किसी बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहा था। दरअसल, यह अनोखा जमावड़ा प्रकृति को एक नया जीवन देने और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली की मजबूत नींव रखने के मकसद से हुआ था। कुमाऊं की सुप्रसिद्ध और जन-जन में लोकप्रिय सांस्कृतिक टीम ‘घुघूति जागर’ और प्रसिद्ध ‘टाटा परिवार’ ने हाथ मिलाकर इस वन क्षेत्र में एक अभूतपूर्व और वृहद् वृक्षारोपण अभियान को अंजाम दिया।
इस खास मौके पर देवभूमि की लोक संस्कृति को अपनी सुरीली आवाज और अभिनय से जीवंत करने वाले कलाकार अचानक जमीन पर उतरकर गड्ढे खोदते नजर आए। ‘घुघूति जागर’ टीम के प्रमुख स्तंभों में शामिल राजू भाई, राजेंद्र सिंह ढेला और नवीन जोशी ने टाटा परिवार के प्रतिनिधियों, अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ कदम से कदम मिलाकर इस पूरे अभियान की कमान संभाली। जंगल के विभिन्न हिस्सों में सैकड़ों छायादार और फलदार पौधों का रोपण किया गया। यह सिर्फ पौधे लगाने तक सीमित आयोजन नहीं था, बल्कि सभी सदस्यों ने सामूहिक रूप से यह संकल्प भी लिया कि वे इन पौधों की नियमित देखरेख करेंगे और इन्हें विशाल वृक्ष बनने तक पूरा संरक्षण प्रदान करेंगे।
जब स्थानीय ग्रामीणों ने अपने चहेते लोक कलाकारों और देश के एक प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट समूह के प्रतिनिधियों को एक साथ मिट्टी में हाथ मिलाते देखा, तो उनका उत्साह दोगुना हो गया। अपनी संस्कृति से जुड़े दिग्गजों को इस तरह पर्यावरण की रक्षा के लिए पसीना बहाते देख गांव के युवाओं और महिलाओं में भी प्रकृति के प्रति एक नई चेतना और जिम्मेदारी का अहसास जगा।
कार्यक्रम के दौरान अपने विचार साझा करते हुए राजू भाई और राजेंद्र सिंह ढेला ने कहा कि प्रकृति ही हमारा मूल आधार और जीवन का सच्चा स्रोत है। उत्तराखंड की इस पवित्र माटी को हरा-भरा रखना हममें से हर एक नागरिक का पहला और नैतिक कर्तव्य है। उन्होंने बताया कि टाटा परिवार के साथ मिलकर शुरू किया गया यह प्रयास प्रकृति को संवारने और भावी पीढ़ी को एक शुद्ध, प्रदूषण मुक्त और सुरक्षित वातावरण सौंपने की दिशा में एक सार्थक पहल है।
इसी क्रम में नवीन जोशी और टाटा परिवार के प्रतिनिधियों ने विशेष रूप से युवाओं का आह्वान किया। उन्होंने एक भावुक संदेश देते हुए कहा कि हर इंसान को अपने जीवनकाल में कम से कम एक पौधा जरूर लगाना चाहिए और उसकी देखभाल ठीक उसी आत्मीयता से करनी चाहिए जैसे एक माता-पिता अपनी संतान की परवरिश करते हैं।
पूरे आयोजन के दौरान बेहद उत्साहजनक और सौहार्दपूर्ण वातावरण देखने को मिला। हर किसी के चेहरे पर प्रकृति की सेवा करने का संतोष साफ झलक रहा था। हाथों में हरी-भरी पौध थामे लोगों का यह समूह इस बात का जीवंत प्रमाण बन गया कि जब लोक संस्कृति की जड़ें और आधुनिक कॉर्पोरेट जगत की सोच आपस में मिलती हैं, तो पर्यावरण संरक्षण का एक नया और अटूट अध्याय लिखा जाता है।
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