जैसे-जैसे चैत्र पूर्णिमा का पावन पर्व, हनुमान जयंती निकट आता है, वैसे-वैसे सोशल मीडिया और समाज में तथाकथित ‘कलियुगी महाज्ञानियों’ की एक नई फसल भी दिखाई देने लगती है। ये वे लोग हैं, जो बिना किसी शास्त्र या पुराण का गंभीर अध्ययन किए बड़े आत्मविश्वास से यह दावा करते हैं कि—
“हनुमान जयंती मत कहिए, हनुमान जन्मोत्सव कहिए, क्योंकि जयंती तो केवल दिवंगत व्यक्तियों की मनाई जाती है।”
वास्तव में यह तर्क न केवल संस्कृत भाषा की समृद्ध परंपरा के विपरीत है, बल्कि सनातन धर्म के शास्त्रों और पुराणों के प्रति गहरे अज्ञान का भी प्रमाण है। आइए, शास्त्रों के प्रमाणों के आधार पर समझते हैं कि ‘जयंती’ का वास्तविक अर्थ क्या है और क्यों हनुमान जयंती कहना ही पूर्णतः शास्त्रसम्मत है।
‘जयन्ती मङ्गला काली…’ — क्या देवी भी मृत हैं?
मार्कण्डेय पुराण में वर्णित दुर्गा सप्तशती का प्रसिद्ध मंत्र है—
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
इस मंत्र में आदिशक्ति का पहला नाम ही ‘जयन्ती’ है।
‘जयंती’ का अर्थ है— जो समस्त सृष्टि पर विजय प्राप्त करने वाली हो, जो सर्वश्रेष्ठ और शाश्वत हो।
यदि ‘जयंती’ का अर्थ केवल दिवंगत व्यक्तियों से जुड़ा होता, तो क्या माँ दुर्गा के लिए यह नाम प्रयुक्त किया जाता? स्पष्ट है— ‘जयंती’ शब्द का अर्थ मृत्यु नहीं, बल्कि विजय और शाश्वतता है।
पुराणों में ‘जयंती’ का अर्थ: एक पवित्र योग
स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में ‘जयंती’ को एक अत्यंत शुभ खगोलीय एवं आध्यात्मिक योग बताया गया है।
शास्त्रों में कहा गया है—
“श्रावणे बहुले पक्षे कृष्णजन्माष्टमी व्रतम्।
रोहिणी सहिता चेयं जयन्तीति निगद्यते॥”
अर्थात जब कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त होती है, तो उस दिव्य योग को जयंती कहा जाता है। इसी शुभ योग में भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था।
क्या भगवान श्रीकृष्ण कभी मृत्यु को प्राप्त होते हैं? नहीं। वे तो अजन्मा और शाश्वत हैं। फिर भी उनके प्राकट्य दिवस को जन्माष्टमी जयंती कहा जाता है।
चिरंजीवियों और शाश्वत सत्ताओं की भी होती है जयंती
यदि ‘जयंती’ केवल दिवंगत व्यक्तियों के लिए होती, तो सनातन परंपरा में निम्न जयंतियों का क्या अर्थ रह जाता?
🔸 हनुमान जयंती – हनुमान जी अष्ट चिरंजीवियों में से एक हैं
(अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः…)
वे कलियुग में सदेह जाग्रत देव माने जाते हैं।
🔸 परशुराम जयंती – भगवान परशुराम भी चिरंजीवी हैं।
🔸 गीता जयंती – श्रीमद्भगवद्गीता शाश्वत ज्ञान का स्रोत है।
🔸 गंगा जयंती और नर्मदा जयंती – नदियाँ आज भी निरंतर प्रवाहित हैं।
स्पष्ट है कि जयंती का संबंध मृत्यु से नहीं, बल्कि प्राकट्य और दिव्यता से है।
यह भ्रम फैला कैसे?
स्वतंत्रता के बाद आधुनिक भारत में सरकारी कैलेंडरों और सार्वजनिक आयोजनों में
गांधी जयंती, अंबेडकर जयंती, महावीर जयंती जैसे शब्दों का व्यापक प्रयोग होने लगा।
चूँकि ये महापुरुष भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं थे, इसलिए आम जनमानस में यह भ्रम बैठ गया कि ‘जयंती’ केवल दिवंगत व्यक्तियों की ही होती है, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न है।
स्मरण रहे ‘जयंती’ का अर्थ है विजय, प्राकट्य और शाश्वतता
‘जयंती’ शब्द का संबंध मृत्यु से नहीं, बल्कि—
✔ उत्कर्ष
✔ अजेयता
✔ दिव्य प्राकट्य
✔ शाश्वत सत्ता
से है।
जो समय और मृत्यु की सीमाओं से परे हो जाए, जिसके प्रकट होने से अंधकार पर प्रकाश की विजय हो उसी के प्राकट्य दिवस को जयंती कहा जाता है।
इसलिए निस्संदेह ‘हनुमान जयंती’ ही शास्त्रसम्मत है
इस बार यदि कोई आपको ‘हनुमान जयंती’ के स्थान पर ‘जन्मोत्सव’ कहने की सलाह दे, तो उसे विनम्रता से बताइए—
साधारण मनुष्यों का जन्मदिन होता है,
लेकिन अजर-अमर, कालजयी और चिरंजीवी महावीरों की जयंती ही मनाई जाती है।
लेटैस्ट न्यूज़ अपडेट पाने हेतु -
👉 वॉट्स्ऐप पर हमारे समाचार ग्रुप से जुड़ें
