गहन अरण्य की उस एक प्यास में छिपा कौन-सा आदि-रहस्य था?

ख़बर शेयर करें

 

गहन अरण्य की उस एक प्यास में छिपा कौन-सा आदि-रहस्य था?

सीतावनी के ‘सीतेश्वर महादेव’ और दो अमृत धाराओं का दिव्य आख्यान

अरण्य का मौन और आदि-पर्वत की पुकार

हिमालय की पावन उपत्यकाओं में जब मानसखण्ड के पन्ने खुलते हैं, तो वहाँ केवल भूगोल नहीं, बल्कि अध्यात्म का एक ऐसा रहस्यमय लोक उजागर होता है जहाँ प्रकृति और परमात्मा एकाकार हो जाते हैं। स्कन्द पुराण के मानस खण्ड के चालीसवें अध्याय में महर्षि व्यास शौनकादि ऋषियों को उस गुप्त तीर्थ की महिमा सुनाते हैं, जहाँ कौशिकी (कोसी) नदी के वाम भाग में ‘शेषगिरि’ नामक दिव्य पर्वत शोभायमान है।

देवताओं के समान पूजित, सिद्धों और गन्धर्वों से सेवित इस पर्वत पर ‘शेषवती’ नाम की पावन गुफा है, जहाँ स्वयं नागराज शेष विराजते हैं और दक्षिण भाग में भगवती महामाया का गुप्त सान्निध्य है। इसी पर्वत-श्रेणी के आंचल में, कौशिकी और सीता नदियों के मध्य एक ऐसी अलौकिक ‘अशोकवनिका’ विद्यमान थी, जो केवल वृक्षों का झुंड नहीं, अपितु जीवों के समस्त संतापों को हरने वाली एक आध्यात्मिक तपोभूमि थी।

तपोवन में रघुकुल का आगमन और वैशाख का संकल्प

यज्ञाचार्य महर्षि विश्वामित्र के पावन निर्देश से मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम, जनकनन्दिनी माता सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ कोशल देश की सीमाओं को लांघकर इस परम शांत अरण्य में पधारे। पक्षियों के मधुर कलरव और पुष्पों से लदी अशोकवाटिका के सुरम्य वातावरण को देखकर माता सीता का हृदय भक्ति और विरक्ति के अगाध आनंद से भर उठा।

कमलनयनी वैदेही ने प्रभु श्रीराम के चरणों में निहारते हुए अपनी अभिलाषा व्यक्त की। स्कन्द पुराण में इस मधुर संवाद का वर्णन करते हुए कहा गया है:

स्थास्याम्यत्र महाबाहो भवता सह राघव। वासन्तं पुण्यमासं वै सुपुण्ये कोशिकीजले॥ स्नानं चात्र विधास्यामि मयोक्तं यदि रोचते॥

(अर्थात्: “हे महाबाहु राघव! यदि आपको प्रिय लगे, तो मैं इस परम पवित्र वन में आपके साथ वासंतिक वैशाख मास व्यतीत करना चाहती हूँ और कौशिकी के पावन जल में नित्य स्नान करने की अभिलाषा रखती हूँ।”)

राजीवलोचन प्रभु श्रीराम ने अपनी प्रिया के इस सात्त्विक मनोरथ को सहर्ष स्वीकार किया और बोले—“हे भद्रे! इस पुण्य मण्डल में तुम्हारा निवास मुझे भी परम प्रिय है। तुम वैशाख भर नियमपूर्वक यहाँ स्नान व अनुष्ठान करो, तुम्हारे संतोष के लिए मैं यहीं वास करूँगा।”

लीलामयी तृषा और दो पावन धाराओं का प्राकट्य

पूरे वैशाख मास तक ब्राह्मणों के सान्निध्य में माता सीता और प्रभु श्रीराम ने कौशिकी के तट पर नियमपूर्वक स्नान और तपस्या की। वैशाख की पूर्णाहुति के उपरांत जब वे तराई (मालभूमि) की ओर आगे बढ़े, तभी एक अद्भुत आध्यात्मिक कौतुक घटित हुआ।

यह भी पढ़ें 👉  भारत विकास परिषद शाखा लालकुआँ द्वारा राष्ट्रीय समूह गान प्रतियोगिता 2026 का भव्य आयोजन

चन्द्रमुखी साध्वी सीता सहसा व्याकुल हो उठीं और उन्होंने प्रभु से कहा—“प्रभो! मैं अत्यंत प्यासी हूँ।”

संसार को जीवन-रस देने वाली साक्षात् जगज्जननी का इस निर्जन वन में प्यासा होना—क्या यह केवल एक भौतिक तृषा थी? अथवा इसके पीछे जगत के उद्धार का कोई गहन आध्यात्मिक रहस्य छिपा था?

माता सीता की वाणी सुनते ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अपने अन्तर्मन में भगवती भागीरथी (गंगा) का ध्यान किया और माता सीता ने पापनाशिनी कौशिकी का स्मरण किया। पुराण साक्षी है कि उन दोनों के स्मरण करते ही उस निर्जन वन में अमृत की दो धाराएं फूट पड़ीं:

तयोदितं समाकर्ण्य रामो भागीरथीं स्मरन्। सीताऽपि कौशिकीं पुण्यां सस्मार मुनिसत्तमाः॥ आविर्बभूव वै विप्रास्तस्यैव चरणोद्भवा। सीतया संस्मृता पुण्या कौशिकी चापि सुव्रताः। क्षणेनाविर्बभूवाशु धारयाऽमृतपूरया॥

प्रभु के चरणकमलों से गंगा की धारा ‘रामधारा’ बनकर प्रकट हुई और माता के संकल्प से कौशिकी ‘सीताधारा’ के रूप में अमृतमयी होकर बहने लगी।

यह भी पढ़ें 👉  कर्म, काल और प्रायश्चित्त का दिव्य दर्पण: महर्षि पराशर की वाणी में कलियुग के धर्म और मर्यादा का अलौकिक विधान

सीतेश्वर महादेव की स्थापना: शिव-शक्ति का एकाकार

उस अमृत तुल्य जल से अपनी तृषा शांत कर, व्रतपरायणा माता सीता ने उसी क्षण उस पावन भूमि पर भगवान शंकर के लिंग-स्वरूप का निर्माण किया। रुद्राभिषेक और षोडशोपचार पूजन के उपरांत उन्होंने देवाधिदेव महादेव को वहाँ प्रतिष्ठित किया।

माता जानकी द्वारा स्थापित होने के कारण वे देवाधिदेव त्रिलोकी में ‘सीतेश्वर महादेव’ के नाम से विख्यात हुए और वह संपूर्ण तपोभूमि सदा-सदा के लिए ‘सीतावनी’ कहलाने लगी।

इस पावन लिंग के दर्शन का माहात्म्य बताते हुए महर्षि व्यास कहते हैं:

तत्र सीतेश्वरं देवं स्थापितं सीतया शुभम्। ये प्रपश्यन्ति मनुजास्ते शोकाद्वितरन्ति हि॥ ये च सम्यक् पूजयन्ति देवं सीतेश्वरं हरम्। शिवेन सह ते विप्रा मोदन्ते नात्र संशयः॥

(अर्थात्: “सीताजी द्वारा स्थापित उस मंगलमय ‘सीतेश्वर’ देव का जो मनुष्य दर्शन करते हैं, वे जीवन के समस्त शोकों से पार पा जाते हैं। और जो विधिपूर्वक सीतेश्वर हर का पूजन करते हैं, वे निःसंदेह भगवान शिव के साथ परमानंद को प्राप्त होते हैं।”)

शोक-विमुक्ति का अमर वरदान

पूजन के उपरांत प्रभु श्रीराम और जानकी दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर अयोध्या लौट गए, किंतु सीतावनी की यह धरा युगों-युगों के लिए अमर हो गई।

यहाँ की ‘रामधारा’ और ‘सीताधारा’ में स्नान कर शांतस्वरूप शिव की अर्चना करने वाले को परम गति मिलती है। जो भक्त अशोक के कोमल पल्लवों से सीतेश्वर महादेव की अर्चना करते हैं, वे समस्त सांसारिक संतापों से मुक्त होकर शिव-सायुज्य प्राप्त करते हैं। साथ ही, शेष पर्वत से निकलने वाली पापनाशिनी ‘देवकी’ नदी में स्नान करने से स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।

यह भी पढ़ें 👉  'सनातनी परंपराओं पर अंगुली उठाने वाली कांग्रेस बन चुकी है तिलचट्टों का गैंग' : तरुण पंत

इस दिव्य अध्याय के समापन पर महर्षि व्यास इस सम्पूर्ण कथा का फलित प्रकट करते हुए कहते हैं:

इत्येतत्कथितं विप्राः पर्वतान्तं मयाऽधुना। श्रुणुयाद्वा पठेद्वापि स शोकाद्विप्रमुच्यते॥

सीतावनी की यह माटी आज भी साक्षी है कि जहाँ राम का स्मरण, सीता का समर्पण और शिव की भक्ति का त्रिवेणी संगम हो, वहाँ जीवन का कोई भी शोक टिक नहीं सकता।

वर्तमान में कहाँ स्थित है यह पावन स्थल?

स्कन्द पुराण में वर्णित यह अलौकिक तपोभूमि वर्तमान में उत्तराखण्ड राज्य के नैनीताल जनपद में रामनगर के समीप सघन अरण्य में स्थित है।

  • भौगोलिक अवस्थिति: यह तीर्थ रामनगर से लगभग 20 से 25 किलोमीटर की दूरी पर कॉर्बेट लैंडस्केप के अंतर्गत मैलानी और कोटाबाग के शांत वन क्षेत्र में ‘सीतावनी’ नाम से विख्यात है।
  • प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक स्वरूप: घने साल, पलाश और अशोक के वनों के मध्य स्थित इस पावन धाम में माता सीता का प्राचीन मंदिर तथा ‘सीतेश्वर महादेव’ का पवित्र शिवालय आज भी विद्यमान है। यहाँ वह दिव्य जलस्रोत (सीताधारा/अमृतधारा) सदियों बाद भी अविरल प्रवाहित हो रहा है।
  • महाभारतकालीन प्रमाण: महाभारत के वनपर्व (अध्याय 89) में भी इस ‘सीतावन’ तीर्थ का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जो काशीपुर और रामनगर के मध्य वनमार्ग पर स्थित माना गया है। इसमें वर्णित सिद्धों से सेवित ‘आपगा’ नदी की पहचान वर्तमान ‘डबका’ नदी के रूप में की जाती है।

@ रमाकान्त पन्त @

ADVERTISEMENTS Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad