पिथौरागढ़ का रहस्यमयी पाताल भुवनेश्वर: धरती के गर्भ में छिपा देवताओं का दिव्य लोक
देवभूमि उत्तराखण्ड के जनपद पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट क्षेत्र में स्थित पाताल भुवनेश्वर भारतवर्ष के पवित्रतम और रहस्यमयी तीर्थों में एक माना जाता है। भगवान श्री भुवनेश्वर की यह अलौकिक गुफा अपने भीतर न केवल सदियों का इतिहास समेटे हुए है, बल्कि अनगिनत दिव्य रहस्यों और आध्यात्मिक शक्तियों का अद्भुत संसार भी संजोए हुए है। गंगोलीहाट स्थित श्री महाकाली दरबार से लगभग 11 किलोमीटर दूर स्थित यह पवित्र स्थल श्रद्धालुओं के लिए आस्था, रहस्य और मोक्ष का संगम माना जाता है।
मान्यता है कि यह गुफा स्वयं पाताल लोक का मार्ग है, जहाँ तैंतीस कोटि देवी-देवता भगवान भुवनेश्वर की अखण्ड उपासना में लीन रहते हैं। कहा जाता है कि यक्ष, गंधर्व, ऋषि-मुनि, अप्सराएँ, नाग और दानव तक इस दिव्य गुफा में भगवान शिव की आराधना करते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन और श्रद्धा से पाताल भुवनेश्वर के दर्शन करने मात्र से हजारों यज्ञों तथा अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है, जबकि विधिवत पूजा करने पर उसका फल दस हजार गुना अधिक बताया गया है।
स्कन्द पुराण के मानस खण्ड में महर्षि वेदव्यास ने इस गुफा की महिमा का विस्तार से वर्णन किया है। कहा गया है कि “भुवनेश्वर” नाम का उच्चारण मात्र करने से मनुष्य अपने समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और अपने इक्कीस कुलों का उद्धार कर लेता है। इतना ही नहीं, वह अपने तीन कुलों सहित शिवलोक को प्राप्त करता है।
पाताल भुवनेश्वर की गुफा के भीतर प्राकृतिक रूप से बनी अद्भुत शिलाकृतियाँ आज भी लोगों को आश्चर्यचकित कर देती हैं। माना जाता है कि इन शिलाओं में भगवान गणेश का कटा हुआ मस्तक, शेषनाग, चारों युगों के प्रतीक, कैलाश पर्वत तथा स्वर्ग जाने का मार्ग जैसी दिव्य आकृतियाँ विद्यमान हैं। यही कारण है कि इस गुफा को ब्रह्माण्ड की रहस्यमयी संरचना का जीवंत स्वरूप भी कहा जाता है।
स्थानीय लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस गुफा के रहस्यों को पूर्ण रूप से समझ पाना आज भी असंभव माना जाता है। ऋषि-मुनि और तपस्वी ही नहीं, बल्कि देवता भी इसकी सम्पूर्ण महिमा का वर्णन करने में स्वयं को असमर्थ बताते हैं।
आस्था, अध्यात्म और रहस्य का अद्भुत संगम पाताल भुवनेश्वर आज भी श्रद्धालुओं, शोधकर्ताओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। हिमालय की गोद में स्थित यह दिव्य गुफा सनातन संस्कृति की उस अलौकिक विरासत का प्रतीक है, जहाँ हर पत्थर में देवत्व और हर शिला में एक अनकहा रहस्य छिपा हुआ प्रतीत होता है।
महारहस्य: पाताल के गर्भ में छिपा एक अद्भुत लोक
पाताल भुवनेश्वर का रहस्य और राजा ऋतुपर्ण की अद्भुत यात्रा
प्राचीन काल की बात है, जब मुनियों ने महर्षि व्यास से पृथ्वी के सबसे पुण्यदायी और पाप-नाशक तीर्थ के बारे में जिज्ञासा प्रकट की। तब व्यास जी ने एक अत्यंत गुप्त और पवित्र स्थान का वर्णन किया, जिसे ‘पाताल भुवनेश्वर’ कहा जाता है। सरयू और रामगंगा नदियों के मध्य स्थित यह पवित्र गुफा देवताओं, गंधर्वों, और अप्सराओं द्वारा सेवित है। इस स्थान का माहात्म्य इतना अधिक है कि यहाँ के दर्शन मात्र से काशी, रामेश्वरम (सेतुबंध) और केदारनाथ से भी कई हजार गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है। यहाँ जाने वाले और ‘भुवनेश’ (शिव) का स्मरण करने वाले मनुष्य के कई कुलों का उद्धार हो जाता है।
यह गुफा बाहर से अंधकारमय प्रतीत होती है, लेकिन इसके भीतर पाताल लोक में नागों के सहस्रों फनों की मणियों से दिव्य प्रकाश फैला रहता है। मुनियों ने पूछा कि आखिर कोई मनुष्य उस अगम्य पाताल लोक तक कैसे पहुँच सकता है? तब व्यास जी ने अयोध्या के सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण के वहाँ पहुँचने की एक अद्भुत कथा सुनाई।
एक बार प्रतापी राजा ऋतुपर्ण हिमालय के वनों में आखेट (शिकार) के लिए गए। शिकार के दौरान उन्होंने एक विशाल जंगली सूअर को देखा और अपने घोड़े पर सवार होकर उसका पीछा करने लगे। वह सूअर राजा को भटकाते हुए बहुत दूर घने जंगलों में ले गया और अंततः एक पर्वत के पास जाकर अदृश्य हो गया। थकान, प्यास और धूप से व्याकुल राजा ‘दारुक पर्वत’ के उस एकांत वन में एक वृक्ष की छाया में विश्राम करने लगे। तभी उनका सामना शिवजी के गण और उस क्षेत्र के रक्षक ‘क्षेत्रपाल’ से हुआ। राजा ने जब उनसे अपनी व्यथा कही, तो क्षेत्रपाल ने बताया कि पास ही एक गुफा है जिसके भीतर जाते ही उनकी सारी थकान मिट जाएगी और उन्हें अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होंगे।
क्षेत्रपाल के निर्देशानुसार राजा ऋतुपर्ण ने उस गुफा में प्रवेश किया। गुफा के भीतर का दृश्य देखकर राजा आश्चर्यचकित रह गए। वहाँ कोई अंधकार नहीं था; बल्कि नागराज शेषनाग, वासुकि और अन्य नागों के फनों पर सजी मणियों की दिव्य चमक से पूरा पाताल लोक जगमगा रहा था। राजा ने अत्यंत भक्तिभाव से उन नाग-देवताओं और भगवान शिव की स्तुति की।
प्रसन्न होकर शेषनाग ने राजा से उनका परिचय पूछा। राजा ने हाथ जोड़कर कहा, “हे नागराज! मैं सूर्यवंश में उत्पन्न अयोध्या का राजा ऋतुपर्ण हूँ। मैं शिकार करते हुए रास्ता भटक कर यहाँ आ पहुँचा हूँ, लेकिन आपके और इस पवित्र स्थान के दर्शन पाकर मेरे कोटि जन्मों के पाप नष्ट हो गए हैं और मेरा जीवन सफल हो गया है”।
राजा की नम्रता देखकर शेषनाग ने उन्हें अभयदान दिया और पृथ्वी लोक के धर्म-कर्म के बारे में चर्चा की। नागराज ने पूछा कि पृथ्वी पर ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्ण किसकी पूजा करते हैं?। तब राजा ऋतुपर्ण ने उत्तर दिया कि इस सृष्टि के परम आराध्य भगवान शिव ही हैं, और सभी वर्णों के लोग सदा उन्हीं भगवान शंकर की निरंतर उपासना करते हैं।
इस प्रकार, एक साधारण शिकार की यात्रा ने राजा ऋतुपर्ण को पाताल भुवनेश्वर के उन दुर्लभ रहस्यों और शिव महिमा का साक्षी बना दिया, जो बड़े-बड़े देवताओं के लिए भी सुलभ नहीं थे।
पाताल भुवनेश्वर: राजा ऋतुपर्ण की अलौकिक यात्रा
महर्षि व्यास जी मुनियों को पाताल भुवनेश्वर के अद्भुत रहस्यों की कथा सुनाते हुए कहते हैं कि जब अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण पाताल पहुँचे, तो उन्होंने नागराज शेषनाग से भगवान शंकर (विरूपाक्ष) और अन्य देवताओं के क्षेत्रों के दर्शन करने की तीव्र इच्छा प्रकट की। शेषनाग ने राजा को बताया कि इन देवताओं को सामान्य चर्मचक्षुओं (आँखों) से नहीं देखा जा सकता, इसलिए नागराज ने राजा ऋतुपर्ण को ‘दिव्य दृष्टि’ (दिव्य चक्षु) प्रदान की। दिव्य दृष्टि प्राप्त करते ही राजा को वासुकि, तक्षक, धृतराष्ट्र और कर्कोटक जैसे महान नागों के गुप्त निवास स्थानों के दर्शन हुए।
अपनी इस अद्भुत और रहस्यमयी यात्रा में शेषनाग के मार्गदर्शन से राजा ने पाताल लोक के कई अलौकिक दृश्य देखे:
राजा ने नागमाला धारी ‘विश्वेश्वर’ महादेव और इन्द्र के ‘ऐरावत’ हाथी के दर्शन किए। उन्होंने स्वर्ग के समान ‘पारिजात’ वृक्ष, ‘कल्पवृक्ष’, और इन्द्र की ‘अमरावती’ पुरी को पाताल में ही देखा।
राजा ने ‘महा-योनि’ धारण किए हुए भगवान गणेश और पृथ्वी को अपने सिर पर धारण किए हुए ‘गोविन्द’ का विधिपूर्वक पूजन किया।उन्होंने शुभ लक्षणों से युक्त ‘पातालभुवनेश्वरी’, ‘वागीश्वर’, ‘वैद्यनाथ’ और दैत्यों द्वारा पूजित ‘कपिलेश्वर’ शिव के दर्शन कर महान पुण्य प्राप्त किया।
आगे के रहस्यमयी मार्ग पर बढ़ने पर राजा को एक ‘स्थूल’ द्वार वाली गुफा से निकलती जलधाराओं के पार ‘कदलीवन’ दिखाई दिया, जहाँ महान ध्यानमग्न मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय तपस्या कर रहे थे। उसी मार्ग में उन्होंने पन्ना (मरकत मणि) के समान चमकती ‘महागुहा’ में ‘मणीश’ शिव के दर्शन किए और पाताल-स्थित ‘गोदावरी’ व ‘सेतुबंध’ (रामेश्वर) के दर्शन किए।
भक्तिभाव से राजा ने रामेश्वर संगम में स्नान किया। आगे के दुर्गम मार्ग पर राजा को नागों द्वारा पूजित ‘पंचकेदार’ के दर्शन हुए, जिनका स्वयं भगवान ब्रह्मा कमल-जल से अभिषेक करते हैं। शेषनाग ने राजा को पातालगंगा से अभिषिक्त ‘गङ्गेश्वर’ और दैत्यराज बलि की सुवर्णमयी नगरी ‘विराट’ के भी दर्शन कराए, जो सर्पों द्वारा सुरक्षित थी।
यात्रा के अंतिम और सबसे पवित्र चरण में, राजा ने यक्षों-गुह्यकों से सेवित कुबेर, ‘ब्रह्मद्वार’ और यमराज के दर्शन किए। अंत में, शेषनाग ने उन्हें ‘कपालमोचन’ तीर्थ दिखाया और एक परम रहस्य बताया कि यहाँ ‘ब्रह्मलोक’ में पितरों का तर्पण और पिण्डदान करने से पितृगण पूर्ण रूप से तृप्त हो जाते हैं, और जो लोग अज्ञानवश इसे छोड़कर केवल ‘गया’ में पिण्डदान करते हैं, उनके पितरों को वह सद्गति नहीं मिलती जो पाताल भुवनेश्वर के इस क्षेत्र से मिलती है।
इस प्रकार, राजा ऋतुपर्ण की यह पाताल यात्रा उन्हें कोटि जन्मों के पापों से मुक्त कर अलौकिक ज्ञान और शिव-सायुज्य की ओर ले गई।
पाताल भुवनेश्वर: परब्रह्म के दर्शन और सृष्टि का रहस्य
महर्षि व्यास जी कथा सुनाते हुए कहते हैं कि पाताल भुवनेश्वर की रहस्यमयी गुफाओं में शेषनाग के निर्देशानुसार अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण ने अपने पितरों के उद्धार के लिए पिण्डदान किया। वहाँ राजा ने एक अद्भुत दृश्य देखा जहाँ ‘कामधेनु’ निरंतर ‘वृषभेश’ (भगवान शिव) के मस्तक पर अपने स्तनों से दुग्ध की धारा प्रवाहित कर रही थीं। इसके पश्चात् शेषनाग ने राजा को ‘पातालोदक’ नामक एक दिव्य जल का कुण्ड दिखाया। शेषनाग ने राजा को बताया कि इस सर्वपाप-नाशक जल की सृष्टि ब्रह्मा जी ने की है, इसे विष्णु ने भरा है, भगवान शंकर ने इसका पान किया है और माता पार्वती ने इसे धारण कर रखा है। भगवान शिव की आज्ञा लेकर इस जल का आचमन करने से मनुष्य के असंख्य कुलों का उद्धार हो जाता है और उसे शिव-सायुज्य प्राप्त होता है, परंतु शिव की आज्ञा के बिना इसे ग्रहण करने वाले पर भगवान शिव अपने त्रिशूल से प्रहार करते हैं। राजा ऋतुपर्ण ने विधिपूर्वक शिव की आज्ञा प्राप्त कर शांतिपूर्वक उस शुभ जल का पान किया।
जब राजा ने इस तीर्थ के माहात्म्य और यहाँ पूजा करने वाले देवताओं के बारे में पूछा, तो शेषनाग ने बताया कि पाताल की इन पवित्र गुफाओं में ब्रह्मा से लेकर सभी देव, दानव, गंधर्व, यक्ष और ऋषि-मुनि आकर ‘महेश’ (भुवनेश्वर) की पूजा करते हैं। शेषनाग ने विभिन्न तिथियों पर यहाँ पूजा करने के विशेष फलों का विस्तृत वर्णन किया:
‘प्रतिपदा’ को देवताओं द्वारा और ‘द्वितीया’ को बाणासुर आदि दैत्यों द्वारा पूजा की जाती है।
‘चतुर्थी’ को ‘वरुण’ की और ‘पंचमी’ को वासुकि आदि ‘नागों’ की पूजा से विशेष फल प्राप्त होता है।
‘नवमी’ तिथि को यक्षों और गुह्यकों के साथ ‘कुबेर’ का पूजन करने से अपार धन-संपत्ति की प्राप्ति होती है।
‘एकादशी’ को विद्याधरों की, ‘द्वादशी’ को आदित्यों की और ‘त्रयोदशी’ को वसुगणों की पूजा करने से पितरों को मोक्ष मिलता है।
शेषनाग ने राजा को स्पष्ट किया कि यहाँ भगवान भुवनेश्वर की आराधना के साथ-साथ देव, दानव, गंधर्व, यक्ष और पितरों को भी उनका भाग (हव्य-कव्य) देना अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा शिव प्रसन्न नहीं होते और पूजा निष्फल हो जाती है।
देवताओं के रहस्य जानने के बाद, शेषनाग राजा ऋतुपर्ण को ‘स्मेर’ नामक एक अत्यंत रमणीय गुफा के भीतर ले गए। वहाँ राजा ने देखा कि पंचमुखी, त्रिनेत्र और दस भुजाओं वाले भगवान शिव अपनी अर्धांगिनी उमा (पार्वती) के साथ क्रीड़ा कर रहे हैं और उनके वाहन नंदी भी वहीं उपस्थित हैं। उसी मार्ग पर आगे बढ़ते हुए राजा ने ‘वृद्धभुवनेश्वर’ के दर्शन किए तथा पाताल में ही स्थित ‘कैलास’ और ‘मानसरोवर’ का अलौकिक दृश्य देखा। आगे गुफाओं में राजा ने गजचर्म धारण किए हुए शयन करते भगवान शंकर और कमल-पुष्पों से पूजित भगवान विष्णु व देवी लक्ष्मी के भी दर्शन किए।
गुफा के सबसे रहस्यमयी और गहरे भाग में पहुँचकर राजा ने एक प्रकाशमय ‘महायोनि’ देखी, जिसके मध्य में एक ‘महाकाय पुरुष’ विद्यमान था। राजा यह देखकर पूरी तरह से स्तब्ध रह गए कि उस महापुरुष से ही ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, देव, दानव, गंधर्व और संपूर्ण चराचर जगत उत्पन्न हो रहा था और प्रलय काल में उसी में विलीन हो रहा था। यहाँ तक कि राजा ने अपनी आँखों से स्वयं को और शेषनाग को भी उसी ज्योति से उत्पन्न होकर उसी में समाते हुए देखा।
इस परम विस्मयकारी और अकल्पनीय दृश्य को देखकर राजा ऋतुपर्ण ने जब शेषनाग से इस ‘महाज्योति’ के रहस्य के बारे में पूछा, तो शेषनाग ने अत्यंत गंभीर वाणी में उत्तर दिया कि हे राजन्! यह त्रिपुटी (त्रिदेव) की सनातन ज्योति है, जो इस सृष्टि के जन्म, पालन और संहार का एकमात्र मूल कारण है। यही वह परब्रह्म शिव और ‘श्वेतद्वीप’ निवासी पुराणपुरुष विष्णु का सम्मिलित तेज है जो तीनों लोकों को प्रकाशित करता है और यह परम रूप बड़े-बड़े देवताओं और योगियों के लिए भी अगम्य है। अंत में, शेषनाग ने राजा को उस उत्पत्तिरूप महापुरुष को प्रणाम करने का निर्देश दिया और तत्पश्चात उन्हें ‘केदार’ मण्डल की ओर जाने वाले कल्याणकारी मार्ग के दर्शन कराए।
पाताल भुवनेश्वर का रहस्य और राजा ऋतुपर्ण की अद्भुत यात्रा
प्राचीन काल की बात है, जब ऋषियों की महान जिज्ञासा को शांत करते हुए महर्षि व्यास ने पृथ्वी के सबसे परम पवित्र तीर्थ का वर्णन किया। महर्षि ने बताया कि सरयू और रामगंगा नदियों के मध्य एक अत्यंत गुह्य स्थान है जिसे ‘पाताल भुवनेश्वर’ या ‘दारुगिरि’ कहा जाता है। यह कोई साधारण तीर्थ नहीं था; इसका पुण्य काशी, केदारनाथ और सेतुबंध की तुलना में करोड़ों गुना अधिक है, और यहाँ सम्पूर्ण देवगण, नाग और स्वयं भगवान महेश्वर निवास करते हैं। इस महातीर्थ में ‘भुवनेश’ शिव का नामोच्चार करने मात्र से ही मनुष्य के इक्कीस कुलों का उद्धार हो जाता है, और यहाँ कामधेनु ‘सुरभी’ के स्तनों से निकली दुग्धधारा भगवान शंकर का निरंतर अभिषेक करती है।
इसी अकल्पनीय पाताल लोक की यात्रा पर अयोध्या (कोशल) के प्रतापी राजा ऋतुपर्ण निकले। पाताल की गहराइयों में भ्रमण करते हुए राजा ने केदार मण्डल और देवों से सुसज्जित एक ‘महापथ’ देखा। यह दृश्य इतना अलौकिक था कि राजा को लगा मानो वह कोई ‘स्वप्न’ देख रहे हों या यह उनका ‘मतिविभ्रम’ हो। वहाँ उन्होंने ज्योति के मध्य स्थित पुराण-पुरुष विष्णु, पञ्चवक्त्र शिव और ब्रह्मा के दिव्य दर्शन प्राप्त किए।
दक्षिण दिशा की ओर अपनी यात्रा बढ़ाते हुए राजा ऋतुपर्ण एक ऐसी अद्भुत गुफा में पहुँचे जो सीधे देवताओं से सेवित पवित्र ‘काशी’ की ओर जाती थी, और वहीं उन्होंने ‘पातालगङ्गा’ के दर्शन कर उसमें स्नान किया। आगे के दुर्गम मार्ग पर चलते हुए राजा ने पाताल-स्थित ‘गोमती’ नदी में स्नान किया और ‘रैवतक’ पर्वत पर ‘गोकर्णेश्वर’ शिव की आराधना की। जैसे-जैसे वे गहराई में उतरे, उन्हें ‘महागुहा’ में देवी ‘काली’, ‘कपाली’ तथा ‘त्रिपुरसुन्दरी’ के रौद्र और मनमोहक रूप दिखाई दिए। ‘नीलपर्वत’ से होते हुए वे ‘गौरीमहेश्वर-क्षेत्र’ पहुँचे, जहाँ उन्होंने परमपिता भगवान शंकर को ‘अक्ष-क्रीड़ा’ (पांसे का खेल) करते हुए देखा।
राजा की इस लम्बी और कष्टदायक यात्रा से प्रसन्न होकर नागराज शेषनाग ने उन्हें अपने निवास स्थान में आमंत्रित किया। विदाई के समय शेषनाग ने राजा को एक तीव्र वेगशाली घोड़ा और अपार ‘रत्नराशि’ (हीरे-जवाहरात) उपहार में दी। किन्तु, साथ ही नागराज ने उन्हें एक अत्यंत कठोर चेतावनी भी दी: राजा को ‘पाताल भुवनेश्वर’ और इस दिव्य गुफा की पूरी तरह से गोपनीयता बनाए रखनी होगी; यदि वे इसके रहस्य को किसी के भी सामने प्रकट नहीं करेंगे, तो ही उनकी राज्य-व्यवस्था और यह अकूत सम्पत्ति सुरक्षित रहेगी।
राजा ने ‘तथास्तु’ कहकर शेषनाग को प्रणाम किया और उस वेगशाली घोड़े पर सवार होकर पुनः भूतल पर लौट आए। जब वे अपने राज्य ‘कोशल’ (अयोध्या) पहुँचे, तो उन्होंने मंत्रियों और प्रजा के सामने पाताल का कोई जिक्र नहीं किया और केवल शिकार का बहाना बनाया।

परन्तु, राजमहल के भीतर राजा का यह रहस्य अधिक दिनों तक छिप न सका। जब राजा ने वह अलौकिक ‘रत्नराशि’ अन्तःपुर में अपने पुत्रों को बाँटी, तो उन अमूल्य रत्नों को देखकर राजकुमारों ने आश्चर्य से पूछा, “पिताजी! पृथ्वी पर ऐसे रत्न कहाँ सुलभ हैं? ये तो साक्षात् ‘स्यमन्तक मणि’ के समान प्रतीत होते हैं!”। अपार ऐश्वर्य और सम्पत्ति के मद में राजा ऋतुपर्ण अपना वचन भूल गए। प्रतिज्ञा भंग करते हुए उन्होंने सत्य उगल दिया कि ये रत्न उन्हें सरयू और रामगंगा के मध्य स्थित ‘पाताल भुवनेश्वर’ में नागराज शेषनाग ने दिए हैं।
यद्यपि ऐश्वर्य के अहंकार में राजा ऋतुपर्ण अपनी प्रतिज्ञा से चूक गए, फिर भी महर्षि व्यास ऋषियों से कहते हैं कि पाताल गुहा, नागराज शेषनाग और राजा ऋतुपर्ण की इस विस्मयकारी कथा को सुनने और सुनाने मात्र से ही मनुष्य के सम्पूर्ण पापों और कलि-कल्मषों का समूल नाश हो जाता है।
पाताल भुवनेश्वर का रहस्य और राजा ऋतुपर्ण की दिव्य यात्रा
प्राचीन काल की बात है, जब ऋषियों ने महर्षि व्यास से पाताल की एक रहस्यमय और अंधकारपूर्ण गुफा के बारे में जिज्ञासा प्रकट की। महर्षि व्यास ने उन्हें बताया कि यह भूमिगत क्षेत्र पृथ्वी के ही समान विशाल है। यहाँ तक्षक और शेष जैसे महान नागों का निवास है, जिनके फनों पर स्थित मणियों की दिव्य चमक से इस पाताल लोक में कोई अंधकार नहीं रहता, और न ही यहाँ भूख, प्यास, शोक या मृत्यु का कोई भय है। यह वह परम पवित्र स्थान है जहाँ साक्षात् भगवान शिव माता पार्वती के साथ निवास करते हैं, और देवता, गंधर्व तथा अप्सराएं निरंतर उनकी सेवा में रत रहते हैं।
इस अगम्य लोक में किसी मनुष्य के पहुँचने की कथा सुनाते हुए महर्षि व्यास ने सूर्यवंश के प्रतापी राजा ऋतुपर्ण का आख्यान सुनाया। एक बार राजा ऋतुपर्ण हिमालय के ‘दारुपर्वत’ के घने जंगलों में शिकार खेलने गए। एक जंगली सूअर का पीछा करते हुए राजा अपने सैनिकों से बिछड़ गए और भयंकर धूप व प्यास से व्याकुल हो उठे। तब विश्राम करते समय उनकी भेंट उस क्षेत्र के रक्षक ‘क्षेत्रपाल’ से हुई, जिसके निर्देश पर राजा ने एक विशाल गुफा में प्रवेश किया।
गुफा के भीतर पहुँचकर राजा का आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा। उन्होंने देखा कि रत्नों से जड़े एक विशाल पलंग पर सहस्र फनों वाले नागराज ‘शेषनाग’ (अनन्त) विराजमान हैं, जिन्हें हजारों नागकन्याएं और वासुकि आदि नाग घेरे हुए हैं। राजा ने भक्तिपूर्वक नागराज को प्रणाम किया और कहा कि उनके दर्शन मात्र से उनके कोटि जन्मों के पाप नष्ट हो गए हैं। राजा ने अपना परिचय दिया और उस गुप्त क्षेत्र के रहस्य जानने की इच्छा प्रकट की।
नागराज शेषनाग ने राजा को बताया कि इस गुफा में भगवान शंकर के गुप्त स्थान हैं, जिन्हें सामान्य मानव अपनी चर्मचक्षुओं (साधारण आँखों) से नहीं देख सकते। राजा की नम्रता से प्रसन्न होकर, शेषनाग ने उन्हें ‘दिव्य दृष्टि’ (दिव्य चक्षु) प्रदान की। दिव्य दृष्टि प्राप्त करते ही राजा को पाताल लोक के ऐसे अलौकिक दर्शन हुए जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ हैं:
राजा ने सबसे पहले तेतीस करोड़ देवताओं द्वारा सेवित ‘पातालभुवनेश्वर’ (भगवान शिव) के दर्शन किए।
उन्होंने नागों की माला धारण किए ‘विश्वेश्वर’ महादेव और देवराज इन्द्र के ‘ऐरावत’ हाथी को देखा।
राजा ने पाताल में ही स्वर्ग के समान ‘पारिजात’ वृक्ष, ‘कल्पवृक्ष’, ‘अमरावती’ पुरी और इन्द्र के ‘उच्चैःश्रवा’ घोड़े के दर्शन किए।
आगे बढ़ने पर उन्हें ‘भृगुतुङ्ग’ नामक मार्ग पर ‘हाटकेश्वर’ शिव के दर्शन हुए, जिनकी पूजा से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
राजा ने ‘महायोनि’ को धारण किए हुए ‘गणेश’ और पृथ्वी को गाय (गो-रूप) के रूप में धारण किए हुए ‘गोविन्द’ का पूजन किया।
उन्होंने शुभ लक्षणों से युक्त ‘पातालभुवनेश्वरी’, अंगूठे के आकार के ‘वागीश्वर’, और एक शिला से ढके हुए ‘वैद्यनाथ’ महादेव के दर्शन किए।
अपनी इस अद्भुत यात्रा में राजा ने पन्ना (मरकत मणि) की तरह चमकती ‘कपिला’ गुफा, ‘पाताल-सरस्वती’ नदी, ‘महाकाल’, और ‘कपिलेश्वर’ के भी दिव्य दर्शन प्राप्त किए।
इस प्रकार, एक साधारण आखेट (शिकार) की घटना ने राजा ऋतुपर्ण को शेषनाग की कृपा का पात्र बना दिया, जिससे उन्होंने पाताल भुवनेश्वर के उन अनंत और चमत्कारी रहस्यों को अपनी आँखों से देखा, जो सृष्टि के सबसे गूढ़ रहस्यों में से एक हैं।
पाताल भुवनेश्वर: राजा ऋतुपर्ण की अलौकिक यात्रा और ब्रह्माण्ड के दर्शन
पाताल लोक के गहन रहस्यों को जानने के लिए राजा ऋतुपर्ण नागराज शेषनाग के साथ एक दिव्य यात्रा पर निकले। उस अंधकारहीन मार्ग में चलते हुए राजा ने सबसे पहले ‘कदलीवन’ की ओर जाते हुए ध्यानमग्न मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय को तपस्या करते हुए देखा। आगे बढ़ने पर वे सेतुबन्ध की ओर गए, जहाँ उन्होंने विद्याधरों द्वारा सेवित ‘पुष्पदन्त’ और मणियों की तरह चमकती हुई महागुहा में ‘मणीश’ शिव के दर्शन किए। इसी मार्ग में आगे संगम पर स्नान करने के बाद, राजा को भगवान शिव के पारिषद ‘चण्डीश’, ‘भृङ्गी’ और ‘रिटि’ के दर्शन हुए, जिसके पश्चात् वे ‘मार्कण्डेयाश्रम’ जा पहुँचे। वहां से ‘अवमुक्तेश्वर’, ‘चन्द्रेश्वर’ और ‘विन्ध्येश्वर’ शिवलिङ्गों का दर्शन करते हुए राजा ने ‘पाँच केदारों’ (पंचकेदार) को देखा, जिनका साक्षात् ब्रह्मा जी कमल के जल से अभिषेक करते हैं।
अपनी यात्रा को आगे बढ़ाते हुए शेषनाग ने राजा को ‘वैद्यनाथ’ और दैत्यराज बलि द्वारा रक्षित सुवर्ण की तरह चमकने वाली ‘विराट’ नगरी के दर्शन कराए। राजा ने ‘किरातेश’ और ‘नीलकण्ठ’ का भी दर्शन किया। वहां से यक्षों और गुह्यकों द्वारा सेवित ‘कुबेर’, ‘वागीश्वर’ और ‘दिननायक’ (सूर्य) को देखते हुए राजा ‘ब्रह्मद्वार’ पहुंचे। धर्मद्वार से होते हुए राजा ने ‘ब्रह्मकण्ठी’ में यमराज के दर्शन किए, जिनकी दीक्षा से मनुष्य नरक मार्ग से बच जाता है। इसी क्षेत्र में ‘ब्रह्मकपाल’ स्थित था, जहाँ ब्रह्मा जी का कपाल गिरा था। शेषनाग ने राजा को एक महान रहस्य बताते हुए कहा कि जो मनुष्य ‘गया’ के स्थान पर इस अज्ञान-निवारक ‘ब्रह्मकपाल’ (पाताललोक) में अपने पितरों का पिण्डदान और तर्पण करता है, उसके पितरों को परम सद्गति प्राप्त होती है।
इसके उपरान्त, राजा ऋतुपर्ण ने एक अत्यंत अद्भुत दृश्य देखा—वहां ‘कामधेनु’ अपने स्तनों से ‘वृषभेश’ शिव के मस्तक पर निरंतर दुग्ध की धारा बरसा रही थीं। वहीं ‘पातालोदक’ नामक एक दिव्य जल का कुण्ड था; यह वह सर्वपाप-नाशक जल था जिसकी सृष्टि ब्रह्मा ने की थी, जिसे विष्णु ने भरा, शंकर ने पिया और पार्वती ने धारण किया था। शेषनाग ने राजा को सावधान किया कि बिना शिव की आज्ञा के इस जल को पीने वाले पर भगवान शिव अपने त्रिशूल से वैसे ही प्रहार करते हैं, जैसे उन्होंने ब्रह्मा के हंस को घायल किया था। शेषनाग की यह बात सुनकर राजा ने शिव की आज्ञा प्राप्त की और शान्त भाव से उस ‘उदकेश’ शिव के कुण्ड का जलपान किया।
जलपान करते ही राजा को एक अभूतपूर्व दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई। शेषनाग ने उन्हें पाताल में ही तेंतीस करोड़ देवताओं का दर्शन कराया। राजा ने बाईं ओर ‘चन्द्र’ सहित ‘तारागणों’ को और दाईं ओर ‘गन्धर्वों’ को देखा, तथा सामने ‘नन्दीश’, ‘वैद्यनाथ’ और स्वयं ‘पातालभुवनेश्वर’ के दर्शन किए। उन्होंने देखा कि ‘पातालभुवनेश्वर’ के वाम भाग में ‘ब्रह्मा’ और दाहिने भाग में ‘विष्णु’ विराजमान थे।

अंत में, शेषनाग ने राजा को इस दिव्य तीर्थ में विभिन्न तिथियों पर होने वाली रहस्यमयी उपासनाओं का ज्ञान दिया। शेषनाग ने बताया कि यहाँ ‘प्रतिपदा’ को देवताओं द्वारा, ‘द्वितीया’ को बाणासुर आदि दैत्यों व दानवों द्वारा, और ‘तृतीया’ को यक्षों व गुह्यकों द्वारा भगवान महेश्वर की पूजा की जाती है। ‘चतुर्थी’ को ‘वरुण’, ‘पंचमी’ को नाग, ‘षष्ठी’ को उर्वशी आदि देवनायिकाएं व गन्धर्व, ‘सप्तमी’ को प्रजापति, ‘अष्टमी’ को यमराज, ‘नवमी’ को कुबेर, और ‘दशमी’ को कपिल तथा मार्कण्डेय शिव की आराधना करते हैं। इसी प्रकार, ‘एकादशी’ को विद्याधर, ‘द्वादशी’ को बारह आदित्य व ग्यारह रुद्र, ‘त्रयोदशी’ को वसु व अश्विनीकुमार, और ‘चतुर्दशी’ को चन्द्रमा व तारागण यहाँ पूजा करते हैं। जो भी मानव इस ‘पातालभुवनेश्वर’ क्षेत्र के दर्शन करता है, वह जन्म-मरण और दारिद्र्य के भय से सर्वदा के लिए मुक्त हो जाता है।
पाताल भुवनेश्वर: परम ज्योति का रहस्य और राजा ऋतुपर्ण की वापसी
अयोध्या के प्रतापी राजा ऋतुपर्ण नागराज शेषनाग के साथ पाताल भुवनेश्वर की अनंत गहराइयों में विचर रहे थे। शेषनाग ने उन्हें बताया कि इस पाताल लोक में भगवान ‘भुवनेश्वर’ की आराधना करना अत्यंत फलदायी है, और विशेषकर यदि ‘शनिवार’ से युक्त ‘त्रयोदशी’ (मन्दवार त्रयोदशी) की एक कला (क्षण) मात्र भी यहाँ पूजा के लिए मिल जाए, तो पापियों का भी उद्धार हो जाता है।
अपनी इस गुह्य यात्रा में राजा ने एक के बाद एक अद्भुत दृश्य देखे। उन्होंने एक गुफा में पञ्चमुखी, त्रिनेत्र, दस भुजाओं और मुण्डमाला से सुशोभित भगवान शिव के दर्शन किए, और साथ ही पाताल में स्थित ‘कैलास’ और ‘मानसरोवर’ को भी देखा। मानसरोवर के पास राजा ने दस योजन चौड़ी ‘स्मेर’ नामक गुफा में प्रवेश किया, जहाँ उन्होंने ‘उग्र तारा’ के साथ-साथ भगवान विष्णु, लक्ष्मी, कमल पर आसीन ब्रह्मा, सावित्री और सरस्वती के अलौकिक रूपों के दर्शन किए।
यात्रा का सबसे विस्मयकारी क्षण तब आया जब राजा ऋतुपर्ण ने ‘स्वधामा’ गुफा के मध्य में एक ‘महायोनि’ (विशाल प्रकाशपुंज) को देखा। उस महायोनि के मध्य एक ‘महाकाय पुरुष’ विद्यमान था, और राजा ने देखा कि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, देव, दानव और संपूर्ण चराचर सृष्टि उसी महापुरुष से उत्पन्न हो रही थी और उसी में विलीन हो रही थी। स्तब्ध राजा ने जब शेषनाग से इस ‘महाज्योति’ का रहस्य पूछा, तो नागराज ने गंभीर वाणी में बताया कि यह देवों के लिए भी दुर्लभ ‘त्रिदेव’ (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) की सनातन ज्योति है, जो इस सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार का मूल कारण है। यही वह ‘पुराणपुरुष’ है जो श्वेतद्वीप में निवास करता है और जिसने मधु-कैटभ की मेदा से इस पृथ्वी (मेदिनी) का निर्माण किया था।
उस परम ज्योति को प्रणाम कर राजा ‘केदार’ मण्डल के मार्ग पर आगे बढ़े। बीच में ‘शिवलोक’ जाने वाले महापथ को देखकर और वहां का जल पीकर राजा को एक पल के लिए लगा कि कहीं यह सब उनका ‘स्वप्न’ या ‘मतिविभ्रम’ (भ्रम) तो नहीं है। किंतु यात्रा वास्तविक थी। उन्होंने मूँगे (प्रवाल) की पगड़ी पहने देवगुरु ‘बृहस्पति’ को देखा। आगे बढ़ते हुए राजा ने ‘पातालगङ्गा’ में स्नान किया और ‘जाह्नवी’ (गंगा) के दर्शन किए। फिर ‘गोमती’ में स्नान कर वे ‘रैवतक’ पर्वत पर ‘गोकर्णेश’ की आराधना करने पहुँचे। दक्षिण की गुहाओं में उन्होंने ‘काली’, ‘कपाली’ और ‘त्रिपुरसुन्दरी’ के दर्शन किए और अंततः ‘गौरीमहेश्वर-क्षेत्र’ में भगवान शंकर को ‘अक्ष-क्रीड़ा’ (पांसे का खेल) करते हुए देखा। वहां शिव की पूजा करने से मानव के मातृ-पितृ दोनों कुलों का उद्धार हो जाता है।
यहाँ राजा की पाताल यात्रा संपन्न हुई। शेषनाग उन्हें अपने निवास पर ले गए और राजा के सत्कार स्वरूप उन्हें एक वेगशाली घोड़ा और अपार ‘रत्नराशि’ (हीरे-जवाहरात) भेंट की। विदा करने से पूर्व शेषनाग ने राजा को एक अत्यंत कठोर गुरुमंत्र दिया: “हे राजन्! इस गुहा की गोपनीयता को हर हाल में बनाए रखना। किसी गुरु या अपने पुत्रों को भी इसका रहस्य मत बताना। जब तक तुम इस रहस्य को गुप्त रखोगे, संसार में तुम्हारी कीर्ति, संपत्ति और राज्य बढ़ता रहेगा।”। शेषनाग ने यह भी भविष्यवाणी की कि भविष्य में ‘वल्कल’ नामक व्यक्ति जब मनुष्यों को यहाँ लाएगा, तब से इस पाताल में मानवों की गति (प्रवेश) निषिद्ध हो जाएगी।
राजा ऋतुपर्ण ने ‘तथास्तु’ कहकर शेषनाग को प्रणाम किया और उस वेगशाली घोड़े पर सवार होकर उसी मार्ग से वापस चल पड़े। सातवें दिन वे भूतल पर पहुँचे और ‘सरयू’ के तट पर अपने मंत्रियों और सेना से मिले, जो राजा के अचानक प्राण-संचार को देखकर आनंदित हो उठे। अपने वचन का पालन करते हुए राजा ने पाताल का कोई रहस्य उजागर नहीं किया और केवल ‘सूअर के शिकार’ का बहाना बनाकर अपनी राजधानी ‘कोशल’ (अयोध्या) वापस लौट गए।
पाताल भुवनेश्वर: राजा का रहस्य-भंग और सदेह शिवलोक गमन
पाताल लोक के उन अगम्य और चमत्कारी रहस्यों को अपनी आँखों में समेटे, राजा ऋतुपर्ण अयोध्या (कोशल देश) लौट आए थे। उनके पास नागराज शेषनाग द्वारा दी गई अपार ‘रत्नराशि’ और मनचाही गति से उड़ने वाला एक जादुई घोड़ा था। लेकिन इन अनमोल उपहारों के साथ शेषनाग की एक अत्यंत कठोर शर्त भी जुड़ी थी—पाताल भुवनेश्वर का यह रहस्य जीवन भर गुप्त रहना चाहिए।
महल के अंतःपुर में पहुँचकर राजा ने वह अलौकिक और बहुमूल्य रत्नराशि अपने पुत्रों (राजकुमारों) में बांट दी। उन हीरों और मणियों की चमक इतनी तेज थी कि राजकुमारों की आँखें फटी की फटी रह गईं। विस्मय से भरकर उन्होंने अपने पिता से पूछा, “पिताजी! ये अकल्पनीय रत्न इस पृथ्वी पर कहाँ सुलभ हो सकते हैं? ये तो साक्षात् श्रीकृष्ण की ‘स्यामन्तक मणि’ के समान प्रतीत हो रहे हैं। इस भूतल पर ऐसी रत्नों की खान कहाँ स्थित है?”
महर्षि व्यास कहते हैं कि अपार धन और ऐश्वर्य के मद में बड़े-बड़े ज्ञानी भी अपना विवेक खो बैठते हैं। अपनी इस अलौकिक यात्रा के उत्साह और रत्नों के अहंकार में डूबकर, प्रतापी राजा ऋतुपर्ण शेषनाग को दिया गया वह गंभीर वचन भूल गए।
राजा ने अपने पुत्रों से सत्य उगल दिया— “पुत्रों! सरयू और रामगंगा नदी के मध्य एक अत्यंत गुह्य स्थान है जिसे ‘पाताल भुवनेश्वर’ कहा जाता है। यह कोई साधारण खान नहीं है, बल्कि वह पाताल लोक है जहाँ साक्षात् नागराज ‘शेषनाग’ का वास है। उन्हीं नागराज ने मुझे यह यथेच्छगामी (इच्छानुसार चलने वाला) घोड़ा और यह अपार रत्नराशि भेंट की है।”
राजा ऋतुपर्ण अभी अपने परिवार को पाताल की उन रहस्यमयी गुफाओं और शिव-महिमा का वृत्तांत सुना ही रहे थे कि अचानक राजमहल में एक अद्भुत और अकल्पनीय घटना घटी। रहस्य उजागर होते ही, साक्षात् भगवान शंकर के दूत ‘शिवगण’ वहां प्रकट हो गए। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, शिवगणों ने राजा ऋतुपर्ण को उनके राजसिंहासन से सदेह (शरीर सहित) उठा लिया। पल भर में ही वे राजा को अपने साथ उड़ाकर ‘सत्यलोक’ ले गए। यद्यपि राजा ने गोपनीयता का अपना वचन तोड़ा था, परन्तु ‘पाताल भुवनेश्वर’ के दर्शन और भगवान शिव की आराधना के प्रताप से उन्हें मृत्यु का मुख नहीं देखना पड़ा, बल्कि वे सीधे शिव के पार्षदों द्वारा परम धाम को प्राप्त हुए।
कथा का माहात्म्य (फलश्रुति)
कथा का समापन करते हुए महर्षि व्यास ऋषियों से कहते हैं कि हे मुनिवरों! यह कोई साधारण कथा नहीं है। ‘पाताल भुवनेश्वर’ की यह रमणीय कथा, नागराज ‘शेषनाग’ का संकीर्तन और राजा ‘ऋतुपर्ण’ का यह कीर्तिशाली चरित्र कलियुग के सभी पापों और दोषों (कलि-कल्मषों) को भस्म करने वाला है। जो भी विमल हृदय वाला व्यक्ति इस अलौकिक महात्म्य को पढ़ता या सुनता है, वह संसार के सर्वविध पापों से मुक्त होकर अंततः परम पावन ‘शिवलोक’ को प्राप्त करता है।
(यहाँ स्कंद पुराण के मानसखंड के अंतर्गत ‘भुवनेश्वर-माहात्म्य’ का यह अद्भुत अध्याय पूर्ण होता है।)
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