“संगम की पवित्र धरा बागेश्वर: अनदेखे चमत्कार और अमर कथाओं का तीर्थ”

ख़बर शेयर करें

हिमालय का काशी बागेश्वर: संगम, शिव और अदृश्य शक्तियों का तीर्थ”
“बागनाथ की नगरी: सरयू :गोमती के संगम पर छिपा मोक्ष का रहस्य”
“बागेश्वर धाम: जहाँ हर धड़कन में शिव का रहस्यमय आशीष बसता है”
“बागेश्वर : शिवभूमि का वह रहस्य, जो जन्मों के पाप हर लेता है”
“संगम की पवित्र धरा बागेश्वर: अनदेखे चमत्कार और अमर कथाओं का तीर्थ”
“बागेश्वर की रहस्यमयी घाटी: जहाँ देवाधिदेव महादेव अदृश्य होकर वास करते हैं”

“हिमालय का काशी बागेश्वर: जहाँ शिव की अनुगूँज, सरयू-गोमती का संगम और मोक्ष का शाश्वत रहस्य बसता है”

हिमालय की गोद में विराजमान पावन तीर्थ बागेश्वर को यूँ ही “हिमालय का काशी” नहीं कहा जाता। पर्यटन और तीर्थाटन की दृष्टि से बागेश्वर धाम का महत्व अद्वितीय है। पुराणों में इस क्षेत्र की महिमा का जो वर्णन मिलता है, वह इसे साधारण नगर से उठाकर दिव्य और मोक्षदायिनी तीर्थ के रूप में स्थापित करता है। बागेश्वर मंडल में आयोजित होने वाले मेलों का वास्तविक अर्थ तभी पूर्ण होता है जब उनके साथ बागेश्वर महात्म्य की दिव्य कथा का स्मरण भी किया जाए।
स्कंद पुराण के मानसखण्ड में ऋषि दुर्वासा द्वारा वर्णित बागीश्वर महिमा के अनुसार बागेश्वर में कथा श्रवण और दर्शन मनुष्य जीवन को महान फल प्रदान करते हैं। सरयू और गोमती के पवित्र संगम पर स्थित बाबा बागनाथ के दर्शन को कैलाश और काशी से भी बढ़कर फलदायी बताया गया है, क्योंकि यह भू-खंड स्वयं भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। सरयू को गंगा का और गोमती को यमुना का स्वरूप माना गया है। नील पर्वत, विंध्य तथा संगम क्षेत्र को तीर्थराज प्रयाग के समान पूज्य स्थान का गौरव प्राप्त है। यही कारण है कि बागेश्वर को “उत्तर क्षेत्र का वाराणसी” और भगवान शिव को “विश्वेश्वर” कहा गया है।
मान्यता है कि यहाँ शिवपूजा करने वाले साधक को तीन सौ वर्षों तक किए गए विश्वेश्वर-पूजन के समान फल की प्राप्ति होती है। बागेश्वर में शिवभक्ति शिवलोक की ओर जाने वाला सबसे सरल और सुनिश्चित मार्ग मानी गई है। यहाँ शिवनाम का जप करने वाला भक्त शिवलोक का अधिकारी बन जाता है। स्कंदपुराण में वर्णित निधि और पुण्डरीक की कथा इसके दिव्य प्रमाण के रूप में आती है, जिसमें बागेश्वर के महात्म्य के श्रवण मात्र से नरकवासी भी मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।
मकर संक्रांति के पर्व पर सरयू और गोमती के तट पर स्नान, शिवपूजन, कथा-श्रवण और पितृ-तर्पण के विशेष महत्व का वर्णन पुराणों में मिलता है। इसी भू-भाग से जुड़ी पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन, जयंत द्वारा अमृत-कुंभ की रक्षा, दानवपुर की उत्पत्ति, सूरजकुंड और अग्निकुंड जैसे रहस्यमय स्थलों का उल्लेख भी आता है, जो इस क्षेत्र को और भी अलौकिक बनाता है।
ऐतिहासिक दृष्टि से भी बागनाथ मंदिर अत्यंत गौरवशाली है। पांडवों के पड़ाव से लेकर कत्यूरी और चंद राजवंशों की भक्ति, मंदिर निर्माण और भव्य पुनर्निर्माण की घटनाएँ इस भूमि की दिव्यता को इतिहास के पन्नों में अमर कर देती हैं। राजा लक्ष्मीचंद द्वारा बागनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण, विशाल भूमि दान और मंदिर की व्यवस्था के लिए वंशानुगत पुजारियों की नियुक्ति धार्मिक परंपरा के अटूट प्रवाह का प्रमाण हैं। मध्यकालीन मूर्तिकला और स्थापत्य शैली आज भी बागनाथ मंदिर में अपने उत्कर्ष के साथ जीवित दिखाई देती है।
लोकधारा में भी बागनाथ की महिमा गूंजती है। राजूला–मालूशाही की अमर प्रेम गाथा में बागनाथ के करुणा और श्राप का प्रसंग इस तीर्थ की रहस्यमयता को और गहरा कर देता है। ऐसा विश्वास है कि यहाँ की हर शिला, हर लहर और हर धूप की किरण में भोलेनाथ की अनुगूँज सुनाई देती है।
नदियों का पावन संगम, शिवभक्ति का साक्षात आँगन और मोक्षदायिनी कथाओं का अमृत—इन सबके बीच बागेश्वर आज भी साधकों, श्रद्धालुओं और यात्रियों को अपने दिव्य रहस्यों की ओर निर्जन हिमालयी हवाओं के साथ पुकारता रहता है।

यह भी पढ़ें 👉  नागेश्वर महादेव मंदिर में जब गूंजी नैमिषारण्य की दिव्य वाणी: अयोध्या के महंत भी खिंचे चले आए, जानिए तीसरे दिन का वह आध्यात्मिक रहस्य जिसने भक्तों को भावविभोर कर दिया
Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad