अविनाशी काशी के अधिष्ठाता गणेश

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काशी अविनाशी, अनादि और अनन्त केवल भगवान शिव की नगरी ही नहीं, अपितु यह वह दिव्य क्षेत्र है जहाँ समस्त देवतत्त्व एकाकार होकर सृष्टि को मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं। स्कंद पुराण के काशी खण्ड में काशी की महिमा के साथ-साथ भगवान गणेश की ऐसी अद्भुत प्रतिष्ठा का वर्णन मिलता है, जो उन्हें इस नगरी का अनिवार्य द्वारपाल सिद्ध करती है।
पुराण वर्णन करता है कि भगवान गणेश स्वयं काशी में प्रतिष्ठित होकर वहाँ आने वाले देवताओं, ऋषियों और मानवों के कार्यों का निरीक्षण करते हैं। काशी में प्रवेश बिना गणपति की कृपा के असंभव माना गया है। यही कारण है कि उन्हें , “काशी-विनायक” और “सिद्धि-विनायक” के नाम से स्मरण किया गया।
स्कंद पुराण के अनुसार,  काशी के राजा दिवोदास के प्रसंग में गणेश जी के सुन्दर चरित्र का वर्णन मिलता है  भगवान शिव की आज्ञा से गणेश जी ने अनेक रूप धारण कर काशी क्षेत्र को पुनः सुशोभित किया। उन्होंने ब्राह्मण रूप में काशी में प्रवेश किया और अपनी दिव्य दृष्टि से नगर को आलोकित किया। इससे यह सिद्ध होता है कि गणपति केवल विघ्नहर्ता ही नहीं, बल्कि धर्म, नीति और विवेक के अधिष्ठाता भी हैं।
पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि जो भक्त सदा गणेश जी के चरणकमलों की सेवा करता है, वह पुत्र, पौत्र, धन, धान्य और समृद्धि का अधिकारी बनता है। दास-दासी तक उनके चरणों की सेवा में लगे रहते हैं और राजाओं को भी उनके अनुग्रह से निष्कलंक लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। यह महिमा सांसारिक नहीं, अपितु आध्यात्मिक उन्नति का भी संकेत है।
काशी खण्ड में भगवान गणेश को वेदों द्वारा अनुसंधेय, अविनाशी और अनिर्वचनीय तत्त्व कहा गया है। समस्त चराचर जगत को उनके दिव्य स्वरूप का अंश बताया गया है। वे वाणी के अधिष्ठाता हैं अर्थात् ज्ञान, मंत्र और बुद्धि का स्रोत। इसी कारण उन्हें “बुद्धिराज विनायक” कहा गया है, क्योंकि समस्त पुरुषार्थों को वे भली-भाँति जानते और दिशा देते हैं।
पुराण का यह वाक्य अत्यंत मार्मिक है—
“आपको संतुष्ट किए बिना कौन देहधारी प्राणी इस काशी में प्रवेश पा सकता है?”
यह वाक्य गणेश जी की अनिवार्यता को स्पष्ट करता है। काशी में मोक्ष का द्वार भी गणपति की कृपा से ही खुलता है।
इस प्रकार स्कंद पुराण में वर्णित काशी और गणेश का संबंध केवल स्थानिक नहीं, बल्कि तात्त्विक और आध्यात्मिक है। काशी जहाँ शिव का साक्षात स्वरूप है, वहीं गणेश उस स्वरूप तक पहुँचने की प्रथम सीढ़ी हैं। बिना गणपति पूजन के न काशी की यात्रा पूर्ण होती है, न ही साधना।
 काशी में गणेश जी केवल पूज्य देव नहीं, बल्कि मार्गदर्शक, संरक्षक और मोक्ष-पथ के द्वारपाल हैं। स्कंद पुराण का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है विघ्नों से मुक्त होकर यदि काशी में शिव को पाना है, तो पहले गणपति की शरण अनिवार्य है।

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