सृष्टि के आरंभ से ही पराशक्ति के विविध रूपों ने इस चराचर जगत का सृजन, पालन और संहार किया है। जब-जब मानवता को संरक्षण और अभय की आवश्यकता हुई, तब-तब आदि शक्ति ने दिव्य स्वरूपों में अवतरित होकर भक्तों की रक्षा की। भारतीय मनीषा और सनातन तीर्थ-परंपरा में ‘माँ अवंतिका’ का स्वरूप न केवल रक्षा और अभय का साक्षात प्रतीक है, अपितु यह ऐश्वर्य, पोषण और परम कल्याण की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी की दिव्य चेतना से अभिन्न रूप से संयुक्त है।
नाम की व्युत्पत्ति और संरक्षण का तात्विक अर्थ
संस्कृत व्याकरण और व्युत्पत्ति शास्त्र के अनुसार ‘अवंतिका’ शब्द ‘अव्’ धातु से निष्पन्न हुआ है, जिसका मूल अर्थ होता है—रक्षा करना, तृप्त करना, पोषण देना अथवा पालन करना।
“अवति रक्षति पालयति लोकान् इति अवन्तिका।” अर्थात्, जो संपूर्ण लोकों की रक्षा करती हैं, समस्त चराचर जीवों का पालन-पोषण करती हैं और अपनी कृपा-दृष्टि से उन्हें तृप्त रखती हैं, वही परांबा माँ अवंतिका हैं।
सृष्टि के त्रिगुणमय विधान में रक्षा और संवर्धन का यह मूल स्वभाव साक्षात महालक्ष्मी का है। जहाँ महाकाली तमोगुण का संहार करती हैं और महासरस्वती सत्त्व का प्रकाश फैलाती हैं, वहीं त्रिगुणात्मिका शक्ति की मध्यवर्ती महाशक्ति महालक्ष्मी समस्त ब्रह्मांड का संभरण और पालन करती हैं। माँ अवंतिका का यह रक्षण-स्वरूप वास्तव में महालक्ष्मी की विश्वम्भरा शक्ति का ही प्रत्यक्ष प्राकट्य है।
पुराणों के आलोक में माँ अवंतिका और महालक्ष्मी का ऐक्य
पौराणिक ग्रंथों, विशेषकर स्कन्द पुराण (अवन्त्य खण्ड), मार्कण्डेय पुराण (देवी माहात्म्य) और श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में अवंतिका क्षेत्र और वहाँ अधिष्ठित शक्ति की महिमा का विशद वर्णन प्राप्त होता है।
१. स्कन्द पुराण (अवन्त्य खण्ड) का साक्ष्य
स्कन्द पुराण के अवन्त्य खण्ड में स्पष्ट रूप से उल्लेख आता है कि अवंतिका केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि साक्षात महाशक्ति का जागृत यंत्र-स्थल है। यह स्थान पृथ्वी का नाभि-देश माना गया है। नाभि सृष्टि के पोषण का केंद्र होती है—जिस प्रकार माता की नाभि से गर्भस्थ शिशु का पोषण होता है, उसी प्रकार अवंतिका रूपी नाभि-पीठ पर विराजित जगदम्बा संपूर्ण जगत का पोषण महालक्ष्मी के रूप में करती हैं।
अवन्त्य खण्ड में वर्णित है कि जब-जब देवताओं का ऐश्वर्य और श्री क्षीण हुई, तब उन्होंने इस पावन भूमि पर आकर महालक्ष्मी स्वरूपा पराशक्ति की आराधना की। देवी ने प्रसन्न होकर उन्हें अभय और खोई हुई संपदा (श्री) पुनः प्रदान की, जिसके कारण वे ‘सर्वदारिद्र्य-विनाशिनी’ और ‘ऐश्वर्य-प्रदायिनी’ अवंतिका कहलाईं।
२. देवी माहात्म्य के वैकृतिक रहस्य से संबंध
दुर्गासप्तशती के वैकृतिक रहस्य में महर्षि मेधा ने स्पष्ट किया है कि मूल प्रकृति महालक्ष्मी ही हैं, जो अपने सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणों से युक्त होकर संपूर्ण जगत को आवृत किए हुए हैं:
सर्वस्याद्या महालक्ष्मीस्त्रिगुणा परमेश्वरी। लक्ष्याअलक्ष्यस्वरूपा सा व्याप्य कृत्स्नं व्यवस्थिता॥
यह महालक्ष्मी जब भक्तों की रक्षा और लौकिक-पारलौकिक सुख की कामना पूरी करती हैं, तब वे अवंतिका के पावन धाम में शांत, वरद और अमृतमयी मुद्रा में पूजित होती हैं। पुराणों के अनुसार, अवंतिका देवी का पूजन वास्तव में अष्टलक्ष्मी के सम्मिलित स्वरूप की ही आराधना है।
सप्तपुरियों में अवंतिका: ‘मोक्ष-लक्ष्मी’ का वरदान
सनातन धर्म में सात पवित्र मोक्षदायिनी पुरियों का स्मरण किया गया है:
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची ह्यवन्तिका। पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः॥
यहाँ अवंतिका का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। सामान्यतः लक्ष्मी को केवल धन, वैभव और सांसारिक ऐश्वर्य की दात्री माना जाता है, किंतु तात्विक दृष्टि से महालक्ष्मी के तीन सर्वोच्च स्तर हैं: भोग-लक्ष्मी, राज्य-लक्ष्मी और मोक्ष-लक्ष्मी।
अवंतिका क्षेत्र में विराजित माँ अवंतिका भक्तों को न केवल भौतिक दारिद्र्य से मुक्त करती हैं, बल्कि अज्ञान रूपी दारिद्र्य का नाश कर अंततः ‘मोक्ष-लक्ष्मी’ प्रदान करती हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार, अवंतिका देवी के दर्शन और पूजन से जीव का पुनर्जन्म का चक्र समाप्त हो जाता है, क्योंकि वे रक्षा करते-करते जीव को परमात्मा के परम पद तक पहुँचा देती हैं।
महालक्ष्मी के पोषणकारी गुणों का साक्षात विग्रह
माँ अवंतिका के स्वरूप में महालक्ष्मी के समस्त लक्षण परिलक्षित होते हैं:
- अभय और वरद मुद्रा: एक हाथ से जगत के भय का निवारण (असुरों और विपत्तियों से रक्षा) और दूसरे हाथ से अभीष्ट फल (धन-धान्य, आरोग्य, शांति) की वृष्टि।
- कमल-संस्था: महालक्ष्मी की भाँति अवंतिका देवी का संबंध भी दिव्य कमल (हृदय-कमल) से है, जो निर्मलता और अनासक्ति का प्रतीक है।
- श्री-तत्व की प्रतिष्ठा: जिस घर, नगर या राष्ट्र पर माँ अवंतिका की अनुकंपा होती है, वहाँ से अकाल, महामारी, क्लेश और दारिद्र्य स्वतः पलायन कर जाते हैं और वहाँ अक्षत ‘श्री’ का वास होता है।
माँ अवंतिका अनादि काल से आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी—सभी भक्तों की शरणस्थली रही हैं। वे केवल संकटों को हरने वाली रक्षक नहीं, अपितु जीवन में आत्मिक ऐश्वर्य और परम शांति भरने वाली वात्सल्यमयी महालक्ष्मी हैं। पुराणों की यह साक्षी स्पष्ट करती है कि जो साधक अवंतिका के पावन स्वरूप का ध्यान करता है, उसके अंतःकरण में साक्षात महालक्ष्मी का वास हो जाता है और वह इस लोक में सर्व-सुख भोगकर अंत में मोक्ष प्राप्त करता है।
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