रहस्यमयी 101वां: कौरव : कुरुक्षेत्र का अदृश्य बागी: धृतराष्ट्र का वो इकलौता खून, जिसे मौत भी नहीं छू पाई

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रहस्यमयी 101वां: कौरव : कुरुक्षेत्र का अदृश्य बागी: धृतराष्ट्र का वो इकलौता खून, जिसे मौत भी नहीं छू पाई

​कुरुक्षेत्र के मैदान में मौत की बिसात बिछ चुकी थी। शंखनाद हो चुका था और दोनों सेनाएं एक-दूसरे के खून की प्यासी खड़ी थीं। दुर्योधन को अपनी नारायणी सेना और अपने 99 भाइयों पर पूरा भरोसा था। उसे लगता था कि कौरव वंश का खून पूरी तरह से उसके साथ है।
​लेकिन दुर्योधन यह भूल गया था कि कौरव 100 नहीं, बल्कि 101 थे।
​कौरव शिविर में एक ऐसा योद्धा भी मौजूद था, जिसकी रगों में धृतराष्ट्र का खून तो था, लेकिन उसकी निष्ठा किसी और के लिए धड़क रही थी। वह एक ऐसा ‘अदृश्य’ भाई था, जो इतिहास का सबसे बड़ा दांव चलने वाला था।

​कौन था युयुत्सु? एक दबा हुआ सच
इस रहस्यमयी योद्धा का नाम था— युयुत्सु।
​वह महाराजा धृतराष्ट्र का पुत्र था, लेकिन गांधारी का नहीं। जब गांधारी गर्भवती थीं और लंबे समय तक उन्हें कोई संतान नहीं हो रही थी, तब धृतराष्ट्र ने गांधारी की मुख्य दासी (सौवली/सुगधा) के साथ संबंध बनाए थे। युयुत्सु का जन्म उसी दासी के गर्भ से हुआ था।
​रोचक तथ्य: युयुत्सु का जन्म ठीक उसी दिन हुआ था, जिस दिन दुर्योधन और अन्य कौरवों का जन्म हुआ था। वह उम्र में दुर्योधन के बराबर था।
​राजमहल में हैसियत: दासी पुत्र होने के कारण युयुत्सु को राजमहल में कभी वह सम्मान नहीं मिला, जो बाकी 100 कौरवों को मिला।
​विचारधारा: अपमान और उपेक्षा के बावजूद, युयुत्सु की सोच दुर्योधन और दुशासन जैसी क्रूर नहीं थी। वह धर्म और न्याय का पैरोकार था। उसने चीरहरण के समय भी कौरवों के कृत्य का मौन विरोध किया था।

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​विद्रोह का वो रोंगटे खड़े कर देने वाला पल
​युद्ध शुरू होने से ठीक पहले, एक ऐसा सस्पेंस पैदा हुआ जिसने कौरव खेमे में खलबली मचा दी।
​धर्मराज युधिष्ठिर अचानक अपने रथ से उतरे। उन्होंने अपने हथियार नीचे रखे और निहत्थे ही कौरव सेना की तरफ बढ़ने लगे। दोनों सेनाओं की सांसें अटक गईं। क्या युधिष्ठिर आत्मसमर्पण करने जा रहे हैं?
​कौरव सेना के ठीक सामने खड़े होकर युधिष्ठिर ने एक गर्जना की—
“युद्ध शुरू होने से पहले, मेरा द्वार हर उस व्यक्ति के लिए खुला है जो धर्म का साथ देना चाहता है! कौरव सेना का कोई भी योद्धा अगर मेरी तरफ आना चाहे, तो मैं खुले दिल से उसका स्वागत करूंगा!”
​मैदान में सन्नाटा छा गया। दुर्योधन के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान थी; उसे लगा कोई भी उसके खिलाफ जाने की जुर्रत नहीं करेगा।
​लेकिन तभी… कौरव सेना के पिछले हिस्से से एक भारी रथ आगे बढ़ा। रथ के पहियों की आवाज़ ने कुरुक्षेत्र के सन्नाटे को चीर दिया।
​वह कोई सामान्य सैनिक नहीं था। वह धृतराष्ट्र का अपना खून था। वह युयुत्सु था।
​दुर्योधन की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसका अपना भाई, उसके सामने, भरी सभा में बागी हो चुका था। युयुत्सु ने अपना रथ सीधे पांडवों के खेमे में ले जाकर खड़ा कर दिया। यह केवल एक दल-बदल नहीं था, यह कौरवों के विनाश की पहली आधिकारिक घोषणा थी।

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​नियति का क्रूर परिहास: अंत में कौन बचा?
​महाभारत का युद्ध 18 दिनों तक चला। खून की नदियां बहीं और गांधारी के 100 के 100 पुत्र कुरुक्षेत्र की मिट्टी में दफन हो गए। दुर्योधन का अहंकार मिट्टी में मिल गया।
​लेकिन नियति का खेल देखिए:
​धृतराष्ट्र का एकमात्र पुत्र जो इस महाविनाश से जीवित लौटा, वह गांधारी का नहीं, बल्कि उसी दासी का पुत्र युयुत्सु था।
​जिस बेटे को कौरवों ने हमेशा दुत्कारा, अंत में उसी ने धृतराष्ट्र और गांधारी को मुखाग्नि दी और उनके अंतिम संस्कार के कर्मकांड पूरे किए।
​जब पांडवों ने स्वर्गारोहण के लिए हिमालय की ओर प्रस्थान किया, तो उन्होंने परीक्षित (अर्जुन के पोते) को हस्तिनापुर का राजा बनाया और युयुत्सु को ही उनका मुख्य संरक्षक और राज्य का निगराँ नियुक्त किया।
​वह जो हमेशा छाया में रहा, वही कौरव वंश का अंतिम सत्य बनकर उभरा। सत्य की राह चुनने वाला युयुत्सु, महाभारत के सबसे गहरे और गुमनाम रहस्यों में से एक है।

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