दक्षिण भारत के हरे-भरे खेतों और कावेरी नदी की नहरों के बीच बसा एक छोटा सा गाँव है ,अलंगुडी। यहाँ एक ऐसा भव्य मंदिर है जहाँ गुरुवार के दिन भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। यह स्थान भगवान शिव का है, लेकिन इसे ‘गुरु स्थलम’ के रूप में जाना जाता है, यानी वह स्थान जहाँ देवगुरु बृहस्पति साक्षात विराजमान माने जाते हैं।
पौराणिक कथा: जब शिव ने पिया विष
इस मंदिर की कहानी समुद्र मंथन से जुड़ी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तो उससे ‘हालाहल’ विष निकला। इस विष की ज्वाला इतनी तीव्र थी कि सृष्टि जलने लगी। तब भयभीत देवता भगवान शिव की शरण में आए।
कहा जाता है कि इसी स्थान (अलंगुडी) पर भगवान शिव ने वह विष पिया था और सृष्टि को ‘आपात’ (मुसीबत) से बचाया था। इसीलिए यहाँ शिवजी को ‘आपातसहायेश्वरर’ (मुसीबत में मदद करने वाले ईश्वर) कहा जाता है।
बृहस्पति का आगमन:
लेकिन यह स्थान गुरु बृहस्पति के लिए प्रसिद्ध क्यों है? कथा के अनुसार, देवगुरु बृहस्पति ने अपने ज्ञान और तपोबल को बढ़ाने के लिए इसी स्थान पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें नवग्रहों में सबसे पूजनीय और शुभ फल देने वाले ‘गुरु’ का दर्जा दिया। तब से यह मान्यता है कि जिसकी कुंडली में गुरु कमजोर हो, वह यहाँ आकर दर्शन करे तो उसके सारे दोष मिट जाते हैं।
मंदिर की भव्यता और माहौल
मंदिर का वास्तुशिल्प द्रविड़ शैली का है, जिसमें ऊँचे गोपुरम (प्रवेश द्वार) और बारीक नक्काशी की गई है। जैसे ही आप मंदिर में प्रवेश करते हैं, एक दिव्य शांति का अनुभव होता है।
हालाँकि मुख्य मंदिर भगवान शिव का है, लेकिन यहाँ देवगुरु बृहस्पति का एक अलग और विशेष दक्षिणमुखी मंदिर है। यहाँ बृहस्पति की मूर्ति भव्य और शांत मुद्रा में है। गुरुवार के दिन यहाँ का नजारा देखने लायक होता है।
पीले रंग का महत्व और पूजा विधि
चूंकि बृहस्पति का प्रिय रंग पीला है, इसलिए भक्त यहाँ पीले वस्त्र पहनकर आते हैं। मंदिर के आसपास की दुकानें पीले फूलों (गेंदा), पीले वस्त्रों और चने की दाल (जो गुरु को प्रिय है) से सजी होती हैं।
चने की दाल का दीप: यहाँ भक्त केले के पत्ते पर चने की दाल रखकर उसके ऊपर मिट्टी का दीपक जलाते हैं।
परिक्रमा: भक्त अपनी मन्नत पूरी करने के लिए मंदिर की 24 बार परिक्रमा करते हैं।
जब गुरु ग्रह एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तो यहाँ एक विशाल उत्सव होता है, जिसमें लाखों लोग भाग लेते हैं।
श्रद्धालुओं का विश्वास
कहा जाता है कि जिन लोगों के विवाह में देरी हो रही हो, जिन्हें संतान सुख न मिल रहा हो, या जो शिक्षा के क्षेत्र में सफलता पाना चाहते हों, वे यहाँ आकर देवगुरु के चरणों में शीश झुकाते हैं और खाली हाथ नहीं लौटते।
यात्रा से जुड़ी जानकारी
स्थान: अलंगुडी, तंजावुर जिला, तमिलनाडु।
नजदीकी शहर: कुंभकोणम (लगभग 17 किमी दूर)।
नजदीकी हवाई अड्डा: तिरुचिरापल्ली लगभग 90 किमी।
जाने का सही समय: गुरुवार का दिन सबसे विशेष होता है। वैसे साल भर यहाँ जाया जा सकता है।
अलंगुडी का यह मंदिर सिर्फ पत्थरों की संरचना नहीं है, बल्कि लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है जो यह विश्वास करते हैं कि ‘गुरु कृपा’ से ही जीवन का अंधकार मिटता है और ज्ञान का प्रकाश फैलता है।
कुल मिलाकर तमिलनाडु के तिरुवल्लुर जिले से 38 किमी दूर स्थित अलंगुड़ी गांव में स्थित देवगुरु बृहस्पति का प्रसिद्ध मंदिर है, जिसे आपत्सहायेश्वर महादेव का धाम भी कहा जाता है। आस्था व भक्ति का अलौकिक संगम है
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