पितृ पक्ष विशेष आलेख: @ रमाकान्त पन्त
एक रहस्यमयी व्याकुलता, आकाश में उभरा तेजोपुंज और नदी के जल से निकला वह अनूठा वरदान…
विशेष आध्यात्मिक वृत्तांत: सृष्टि के आरंभिक काल का एक ऐसा प्रसंग सामने आया है, जहाँ एक निष्ठावान तपस्वी जीवन के सबसे बड़े धर्मसंकट में फँस गया। वंश-परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए एक सुयोग्य संगिनी की खोज में पृथ्वी के कोने-कोने में भटकने के बाद भी जब ब्रह्मर्षि रुचि को निराशा ही हाथ लगी, तो उनके अंतर्मन में गहरी चिंता की ज्वाला भड़क उठी। लेकिन कोई नहीं जानता था कि इस असमंजस के पीछे ब्रह्मांड का एक बहुत बड़ा रहस्य और एक नए मन्वन्तर के जन्म की योजना छिपी हुई थी।
जब दिशाहीन भटकाव ने लिया सौ वर्षों की घोर तपस्या का रूप
विवश और संतप्त होकर ऋषि रुचि ने पितामह ब्रह्मा को प्रसन्न करने का संकल्प लिया। निर्जन वन में एक ही आसन पर बैठकर उन्होंने पूरे सौ दिव्य वर्षों तक अत्यंत कठोर तप किया। तपस्या से संतुष्ट होकर जब जगत्पिता ब्रह्मा प्रकट हुए, तो समाधान अत्यंत अप्रत्याशित निकला।
ब्रह्मा जी ने रहस्य का पर्दा उठाते हुए कहा कि उनकी कामना की सिद्धि का मार्ग किसी साधारण प्रयास से नहीं, बल्कि उनके पितरों की कृपा से ही संभव है। ब्रह्मा जी के निर्देश पर ऋषि रुचि सीधे एक पावन नदी के एकांत तट पर पहुँचे और वहाँ एकाग्रचित्त होकर पितरों का तर्पण व स्तवन करने लगे।
नदी तट पर गूँजी वह अलौकिक स्तुति
नदी के शांत तट पर ऋषि रुचि के मुख से पितरों के कल्याणकारी स्वरूप की वंदना करते हुए भक्तिमय श्लोक फूट पड़े:
नमस्येऽहं पितॄन् भक्त्या ये वसन्त्यधिदैवतम्। देवैरपि हि तर्प्यन्ते ये श्राद्धेषु स्वधोत्तरैः॥
(अर्थात: जो पितृगण अधिदेवता के रूप में विद्यमान हैं और श्राद्ध के अवसरों पर स्वयं देवता भी स्वधा-मंत्र के साथ जिन्हें तृप्त करते हैं, उन समस्त पितरों को मैं भक्तिपूर्वक नमन करता हूँ।)
ऋषि ने देवलोक, अंतरिक्ष, पाताल और पृथ्वी पर पूजित सभी इकतीस पितृ-गणों को भावभीनी पुष्पांजलि अर्पित की।
आकाश में कौंधा महातेज और हुआ अभयदान
जैसे ही स्तुति पूर्ण हुई, अचानक संपूर्ण आकाशमंडल एक दिव्य तेजोराशि से जगमगा उठा। दसों दिशाओं को आलोकित करते हुए पितृगण प्रत्यक्ष रूप में प्रकट हो गए। नतमस्तक ऋषि रुचि ने जब संतानोत्पत्ति के निमित्त श्रेष्ठ पत्नी की याचना की, तो पितरों ने मुस्कुराते हुए एक ऐसा रहस्योद्घाटन किया जिसने सबको चकित कर दिया। उन्होंने वरदान दिया कि इसी नदी तट पर उन्हें एक अलौकिक पत्नी प्राप्त होगी और उससे उत्पन्न पुत्र आगे चलकर ‘रौच्य मनु’ के नाम से तीनों लोकों में विख्यात होगा।
पितृगणों ने इस स्तोत्र के पाठ का दुर्लभ माहात्म्य बताते हुए कहा:
स्तोत्रेणानेन च नरो योऽस्मांस्तोष्यति भक्तितः। तस्य तुष्टा वयं भोगानात्मजं ध्यानमुत्तमम्॥
(अर्थात: जो भी मनुष्य भक्तिभाव से इस स्तोत्र द्वारा हमें संतुष्ट करेगा, हम प्रसन्न होकर उसे उत्तम भोग, सुयोग्य संतान, आत्म-ज्ञान, दीर्घायु और आरोग्य प्रदान करेंगे।)
जल की अगाध गहराइयों से सुलझा वह अंतिम सस्पेंस
वरदान मिलते ही नदी के निर्मल जल में एक अनोखी हलचल हुई। जल के मध्य से अप्सरा प्रम्लोचा प्रकट हुईं। उन्होंने ऋषि रुचि को सादर प्रणाम कर बताया कि उनकी ही पुत्री ‘मानिनी’ वरुण-पुत्र पुष्कर के अंश से उत्पन्न हुई है।
क्षण भर में नदी के जल से दिव्य रूपवती मानिनी साक्षात बाहर निकल आई। महर्षियों की उपस्थिति में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ ऋषि रुचि और मानिनी का पाणिग्रहण संस्कार संपन्न हुआ। इस प्रकार, जिस चिंता से ऋषि व्याकुल थे, पितरों की असीम अनुकंपा से उसी नदी के तट पर न केवल उनकी गृहस्थी बसी, बल्कि भावी मन्वन्तर के अधिपति रौच्य मनु के अवतरण का मार्ग भी प्रशस्त हुआ।
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