विशेष आलेख | शैल शक्ति
नीले दर्पण के किनारे महारण्य की स्वामिनी: क्या आप जानते हैं नैनीताल की अधिष्ठात्री देवी का प्राचीन नाम?
— प्रकृति, पुराण और रहस्य की त्रिवेणी में गार्ग्याचल की वादियों का अलौकिक सफर
देवदार के कुहासे और बादलों के बीच बसा स्वर्ग
जब प्रातःकाल की पहली स्वर्णिम किरणें हिमालय के हिमाच्छादित शिखरों का स्पर्श करती हैं, तो कुमाऊं की पावन पर्वतमालाएं ऐसे चमक उठती हैं मानो प्रकृति ने स्वयं सोने का मुकुट धारण कर लिया हो। बलखाती पगडंडियां, सघन बांज (ओक), देवदार और बुरांश के गहरे हरे जंगलों से छनकर आती शीतल मलय-समीर, और वादियों में गूंजती पंछियों की मधुर तान—यहाँ का कण-कण किसी अनिर्वचनीय शांति का अनुभव कराता है।
पहाड़ों के सीने पर जब श्वेत बादलों के रेशमी टुकड़े तैरते हुए नीचे उतरते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि धरा और अंबर का मिलन हो रहा हो। हरी-भरी सात सुरम्य पहाड़ियों के बीच आंचल पसारे बैठा शांत, पन्ने के समान गहरे हरे-नीले जल वाला सरोवर किसी विशाल दर्पण की भांति आकाश और पर्वत दोनों को अपनी गोद में समेटे हुए है। सैलानी इसे ‘नैनीताल’ के नाम से जानते हैं, किंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि इस मनोहारी प्राकृतिक सौंदर्य की गोद में हज़ारों वर्षों का एक ऐसा आध्यात्मिक रहस्य छिपा है, जिसका उल्लेख स्वयं महर्षि वेदव्यास ने स्कंद पुराण में किया है।
पुराणों का ‘तृषि सरोवर’ और गार्ग्याचल पर्वत की महिमा
स्कंद पुराण के मानसखण्ड के अनुसार, यह मनोरम क्षेत्र प्राचीन काल से ही देवताओं और ऋषियों की तपोभूमि रहा है। जिस ताल को आज हम नैनीताल कहते हैं, पौराणिक ग्रंथों में उसे ‘तृषि सरोवर’ (त्रिऋषि सरोवर) के नाम से अभिहित किया गया है। मान्यता है कि अत्रि, पुलस्त्य और पुलह—इन तीन महान ऋषियों की कठोर तपस्या और मानसरोवर के पावन जल के संकल्प से यह दिव्य सरोवर प्राकट्य में आया था।
इस सरोवर के चारों ओर फैला गार्ग्याचल (गर्ग पर्वत) और द्रोणाचल का क्षेत्र केवल प्राकृतिक रूप से ही मनोरम नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी जागृत है। मानसखण्ड में वर्णित है कि गार्ग्याचल के उच्चतम शिखर पर स्वयं देवाधिदेव महादेव शंकर देव-दानवों, गंधर्वों और विद्याधरों से पूजित होकर विराजते हैं। इस पर्वत श्रृंखला की तलहटी से कौशिकी (कोसी), मेनका और शाल्मली (सुआल) जैसी पुण्यतोया नदियां कल-कल नाद करती हुई प्रवाहित होती हैं, जिनके तटों पर अनगिनत शिवलिंग और शक्ति-स्थल आज भी विद्यमान हैं।
घने अरण्य में विराजती हैं ‘महेन्द्रपरमेश्वरी’
जनमानस में इस सरोवर के तट पर स्थित मंदिर को शक्तिपीठ ‘नैना देवी’ के नाम से पूजा जाता है, जहाँ सती के नयन गिरे थे। किंतु यदि हम स्कंद पुराण के मानसखण्ड के 51वें अध्याय के मूल श्लोकों का अनुशीलन करें, तो एक अत्यंत विस्मयकारी और पावन सत्य उजागर होता है।
सरोवर के ऊपरी भाग में, सघन महा-अरण्य के भीतर विराजने वाली नैनीताल की अधिष्ठात्री देवी का सबसे प्राचीन और पौराणिक नाम ‘महेन्द्रपरमेश्वरी’ बताया गया है।
महर्षि वेदव्यास जी शौनकादि ऋषियों को उपदेश देते हुए इस देवी और धाम का महात्म्य अत्यंत मधुर वाणी में प्रकट करते हैं:
तृषिक्षह्रदोर्ध्वभागे वै महेन्द्रपरमेश्वरी। राजते मुनिशार्दूला महारण्ये महेश्वरी॥ तां सुपूज्य जनो याति महेन्द्रभवनं प्रति।
पौराणिक मर्म: ऋषिश्रेष्ठों को उद्बोधित करते हुए महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि पावन त्रिऋषि सरोवर (नैनीताल) के ऊपरी भाग में, सघन महा-अरण्य की सुरम्य छाया में साक्षात् पराशक्ति ‘महेन्द्रपरमेश्वरी’ विराजमान हैं। जो साधक व भक्तजन अनन्य श्रद्धा से इन आदि-महेश्वरी की अर्चना और वंदना करते हैं, वे समस्त संतापों से मुक्त होकर देवराज इंद्र के परम पावन धाम ‘महेन्द्रभवन’ को प्राप्त करते हैं। इसी सरोवर के वाम भाग में सिद्धों और गंधर्वों द्वारा नित्य सेवित कल्याणमयी ‘महादेवी’ भी विराजती हैं, जो भक्तों के समस्त लौकिक एवं पारलौकिक मनोरथ सिद्ध करती हैं।
प्रकृति और दिव्यता का एकाकार: जीवन का शाश्वत संदेश
शाम ढलते ही जब नैनीताल के पहाड़ों पर टिमटिमाते घरों के दीप जल उठते हैं, तो उनकी परछाईं नीले जल पर थिरकती हुई तारों भरी रात का भ्रम पैदा कर देती है। मंदिर से उठती घंटियों की गूंज, धूप-दीप की सुगंध और जल की लहरों से टकराती ठंडी हवा हर थके हुए हृदय को असीम ऊर्जा से भर देती है।
मानसखण्ड हमें स्मरण कराता है कि हिमालय की यह यात्रा केवल सैर-सपाटे या पर्यटन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतरात्मा की शुद्धि का मार्ग है। गार्ग्याचल के शिखर, कोसी-शाल्मली के संगम और त्रिऋषि सरोवर के तट पर विराजतीं माता महेन्द्रपरमेश्वरी आज भी अपने भक्तों को यही संदेश देती हैं कि प्रकृति के इस अनुपम सौंदर्य के संरक्षण और देवी की उपासना में ही मानव का सच्चा कल्याण निहित है। अगली बार जब आप नैनीताल के नीले जल को निहारें, तो याद रखिएगा कि आप केवल एक झील के किनारे नहीं, बल्कि देव-गंधर्वों द्वारा पूजित ‘महेन्द्रपरमेश्वरी’ की तपोभूमि में खड़े हैं।
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