मातृ-हृदय और मसीहा का स्पर्श: वात्सल्य की पावन प्रतिमूर्ति डॉ. ऋतु रखोलिया

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रुद्रपुर /कहते हैं कि जब ईश्वर हर जगह सशरीर उपस्थित नहीं रह पाता, तब वह धरती पर माँ को रचता है; और जब किसी मासूम की साँसें उखड़ने लगती हैं तथा बेबस माँ की गोद सूनी होने के कगार पर होती है, तब ईश्वर किसी देवदूत के हाथों में संजीवनी सौंपकर उसे धरती पर भेज देता है। चिकित्सा जगत में ऐसे ही निश्छल वात्सल्य, असीम करुणा और निःस्वार्थ सेवा की साक्षात मूरत हैं—डॉ. ऋतु रखोलिया।

संस्कारों की पावन त्रिवेणी में खिला फूल

नैनीताल की शांत, सुरम्य वादियों और बादलों के साए में जन्मी ऋतु के मन में सेवा का बीज बचपन में ही पड़ गया था। उन्हें यह दिव्य दृष्टि और मानवीय मूल्य अपने सुसंस्कृत परिवार से विरासत में मिले। पिता डॉ. जे.सी. तिवारी (डी.एस.बी. कॉलेज, नैनीताल के वाणिज्य विभागाध्यक्ष) की विद्वता व अनुशासन और माता मुन्नी तिवारी (शिक्षिका) की सौम्यता व संस्कारों ने उनके बाल-मन को ऐसा गढ़ा कि उनके लिए ज्ञान का अर्थ केवल उपाधियाँ पाना नहीं, बल्कि दीन-दुखियों के आँसू पोंछना बन गया।
सेंट मैरी कॉन्वेंट और जी.जी.आई.सी. नैनीताल में अध्ययन के दौरान उनकी मेधा इस कदर चमकी कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की मेरिट सूची में 20वां स्थान प्राप्त किया। प्रथम प्रयास में ही मेडिकल प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण कर उन्होंने अपनी साधना का मार्ग चुन लिया।

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सेवाग्राम की मिट्टी और नन्हें फूलों की वेदना

डॉ. ऋतु ने महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (सेवाग्राम) से एमबीबीएस और एम.डी. (बाल रोग) की उपाधि प्राप्त की। सेवाग्राम की पावन माटी, जहाँ पूज्य बापू के दरिद्र-नारायण सेवा के विचार गूंजते हैं, वहाँ से उनके अंतस में यह संकल्प और गहरा हो गया कि वे जीवन भर उन मासूमों की आवाज़ बनेंगी जो अपनी पीड़ा शब्दों में बयां नहीं कर सकते। एक अबोध शिशु जब दर्द से तड़पता है, तो वह केवल रो सकता है; उस अनकहे रुदन को केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में एक संवेदनशील माँ का धड़कता हुआ दिल हो।

राजकीय मेडिकल कालेज रुद्रपुर : जहाँ हर दिन लिखी जाती है संवेदना की इबारत

वर्तमान में राजकीय मेडिकल कॉलेज, रुद्रपुर के बाल रोग विभाग में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष के पद पर आसीन डॉ. ऋतु केवल एक कुशल चिकित्सक नहीं, बल्कि हजारों बेसहारा और निर्धन परिवारों के लिए आशा की किरण हैं।
जब सुदूर पर्वतीय अंचलों, बीहड़ गाँवों से कोई लाचार पिता या फटे आँचल वाली माँ अपने दम तोड़ते, कुपोषित या गंभीर नवजात को सीने से चिपकाए अस्पताल की चौखट पर पहुँचती है, तो उनकी पथराई आँखें सिर्फ एक ही चेहरे में जीवन तलाशती हैं। ऐसे पलों में डॉ. ऋतु बिना घड़ी देखे, बिना थके, दिन हो या आधी रात, उस नन्ही जान को बचाने के लिए जूझ पड़ती हैं। कई बार जब किसी गरीब के पास दवा के पैसे नहीं होते, तो वे चुपचाप अपने हाथों से व्यवस्था कर देती हैं और उस लाचार माँ के सिर पर हाथ फेरकर कहती हैं—”धीरज रखो, तुम्हारे बच्चे को कुछ नहीं होगा, यह अब मेरी जिम्मेदारी है।”
जब वेंटिलेटर पर झूलती नन्ही साँसें फिर से लय पकड़ती हैं और बच्चा पहली बार अपनी माँ की उंगली थामकर मुस्कुराता है, तब उस माँ की आँखों से बहते कृतज्ञता के आँसू डॉ. ऋतु के चरणों को छू लेते हैं। देखने वालों का कंठ भर आता है और हर जुबां से यही दुआ निकलती है—”ईश्वर ऐसे मसीहा को युगों-युगों तक सलामत रखे।”

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विपदा में ढाल: ‘अपराजिता’ और ‘कोरोना वॉरियर’

जब पूरी दुनिया वैश्विक महामारी कोरोना के खौफ से कांप रही थी और लोग अपनों को भी छूने से कतरा रहे थे, तब डॉ. ऋतु ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना पीपीई किट में घंटों पसीना बहाया। संक्रमित माताओं के नवजात शिशुओं की देखरेख करते हुए वे ममता की अजेय ढाल बनकर खड़ी रहीं।
उनकी इस निस्वार्थ साधना को समाज ने नमन किया। उन्हें ‘कोरोना वॉरियर सम्मान’, ‘अपराजिता सम्मान’, ‘हल्द्वानी रत्न सम्मान’, ‘उत्तराखंड नारीशक्ति अवार्ड’ और ‘टीचर ऑफ द ईयर’ जैसे अनगिनत सम्मानों से नवाजा गया। किंतु उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार किसी राजमहल का तमगा नहीं, बल्कि उस मासूम की किलकारी है जिसे उन्होंने मौत के मुंह से खींचकर जिंदगी दी है।

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ज्ञान की ज्योति और मातृत्व का पर्याय

डॉ. ऋतु रखोलिया ने न केवल चिकित्सा के क्षेत्र में 38 से अधिक राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय शोध-पत्र लिखकर विज्ञान को समृद्ध किया है, बल्कि मास्टर ट्रेनर और स्टेट एकेडेमिक कोऑर्डिनेटर के रूप में सैकड़ों नए चिकित्सकों में भी सेवा के मानवीय संस्कार रोपे हैं।
चिकित्सा की दुनिया में जहाँ संवेदनहीनता की शिकायतें आम होने लगी हैं, वहाँ डॉ. ऋतु रखोलिया का व्यक्तित्व यह विश्वास दिलाता है कि मानवता अभी जीवित है। वे उन सभी के लिए एक साक्षात प्रेरणा हैं जो यह मानते हैं कि सबसे बड़ा धर्म किसी की गिरती हुई साँसों को सहारा देना और टूटते हुए दिल को ढांढस बंधाना है।
समर्पण:
“दवा तो हाथ देते हैं, शिफा दिल से निकलती है,
जहाँ ममता उमड़ आए, वहीं कुदरत पिघलती है।”
— @ रमाकान्त पन्त @

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