शैल शक्ति ब्यूरो
शास्त्रों के आलोक में: अनुचित ब्याज के धन का हश्र और न्यायसंगत दर की मीमांसा
सनातन धर्म और भारतीय दर्शन में धन कमाने के तरीकों (अर्थोपार्जन) को धर्म से जोड़कर देखा गया है। शास्त्रों में धन की शुद्धि पर विशेष बल दिया गया है। पुरुषार्थ और परिश्रम से कमाया गया धन जहां परिवार में सुख-शांति और समृद्धि लाता है, वहीं शोषण, बेईमानी या अनुचित ब्याज (सूदखोरी) से अर्जित धन को विनाशकारी माना गया है।
प्राचीन ग्रंथों—विशेषकर मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और विभिन्न पुराणों—में ऋण (कर्ज), कुसीद (ब्याज) और वार्धुष्य (सूदखोरी) पर विस्तार से चर्चा की गई है।
अनुचित ब्याज (सूदखोरी) के धन का क्या होता है हश्र?
शास्त्रों में अत्यधिक और अनुचित ब्याज वसूलने वाले को ‘वार्धुषिक’ कहा गया है और ऐसे धन की घोर निंदा की गई है।
पुण्यों का क्षय: मनुस्मृति के अनुसार, जो व्यक्ति विपत्ति में फंसे किसी असहाय व्यक्ति से मनमाना ब्याज वसूलता है, उसके सभी सत्कर्म और पुण्य नष्ट हो जाते हैं।
धन का विनाश और अशांति: नीति शास्त्रों में स्पष्ट है कि ‘अन्यायोपार्जितं वित्तं दश वर्षाणि तिष्ठति’ (अन्याय या शोषण से कमाया धन अधिक से अधिक दस वर्ष तक टिकता है, 11वें वर्ष में वह मूल सहित नष्ट हो जाता है)। सूदखोरी का पैसा बीमारियों, पारिवारिक कलह, मुकदमों और व्यसनों के रास्ते घर से बाहर निकल जाता है।
मानसिक और आध्यात्मिक पतन: गरुड़ पुराण जैसे ग्रंथों में उल्लेख है कि दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाकर अर्जित किया गया धन व्यक्ति की मति (बुद्धि) को भ्रष्ट कर देता है, जिससे वंश की प्रगति रुक जाती है।
शास्त्र सम्मत ब्याज: कितना ब्याज लेना अनुचित नहीं है?
प्राचीन काल में भी व्यापार और सामाजिक आवश्यकताओं के लिए ऋण व्यवस्था मौजूद थी, जिसे ‘कुसीद’ कहा जाता था। शास्त्रों ने इसे पूर्णतः प्रतिबंधित नहीं किया, बल्कि इसके लिए सख्त नियम और नैतिक सीमाएँ तय की हैं।
1. मनुस्मृति द्वारा निर्धारित मानक दर:
मनुस्मृति (अध्याय 8, श्लोक 140) में महर्षि मनु ने न्यायसंगत ब्याज दर का स्पष्ट उल्लेख किया है:
”वसिष्ठविहितां वृद्धिं सृजेद् वित्तविवर्धिनीम्।
अशीतिभागं गृह्णीयान्मासाद् वार्धुषिकः शते॥“
अर्थात: धन बढ़ाने के लिए महर्षि वसिष्ठ द्वारा बताई गई ब्याज दर ही उचित है। किसी सुरक्षित ऋण पर प्रति माह मूलधन का 80वां भाग (1.25% मासिक अर्थात 15% वार्षिक) ब्याज के रूप में लेना न्यायसंगत है। इसे ही धर्मसम्मत व्यापारिक ब्याज माना गया है।
2. जोखिम के आधार पर दरें (अर्थशास्त्र और स्मृतियाँ):
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी इसी दर (1.25% मासिक) को सामान्य और सुरक्षित ऋण के लिए आदर्श माना गया है। यदि ऋण में जोखिम अधिक है (जैसे समुद्री व्यापार या दुर्गम यात्रा के लिए दिया गया कर्ज), तो शास्त्रों में आपसी सहमति से थोड़ी अधिक दर की अनुमति दी गई है, लेकिन किसी भी स्थिति में यह शोषणकारी नहीं होनी चाहिए।
3. दामदुपट का नियम (मूलधन से अधिक ब्याज नहीं):
भारतीय शास्त्र ‘चक्रवृद्धि ब्याज’ (ब्याज पर ब्याज) का कड़ा विरोध करते हैं यदि वह शोषक प्रकृति का हो। इसके लिए ‘दामदुपट’ (Damdupat) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम दिया गया है:
किसी भी परिस्थिति में, चुकाया जाने वाला कुल ब्याज कभी भी मूलधन (Principal amount) से अधिक नहीं हो सकता।
यदि किसी ने 1000 रुपये उधार लिए हैं, तो चाहे कितना भी समय बीत जाए, अधिकतम ब्याज 1000 रुपये ही हो सकता है। यानी ऋणदाता कुल 2000 रुपये से अधिक की वसूली नहीं कर सकता।
कुल मिलाकर शास्त्रों का मूल स्वर यह है कि ऋण देना एक आर्थिक सहयोग की प्रक्रिया होनी चाहिए, न कि किसी की मजबूरी का गला घोंटने का साधन। 1.25% मासिक (15% वार्षिक) की दर को धर्मशास्त्रों ने आदर्श माना है। जो धन बिना परिश्रम के, केवल दूसरे की विवशता का दोहन करके (कठोर चक्रवृद्धि ब्याज के माध्यम से) घर में आता है, वह देखने में भले ही समृद्धि लगे, लेकिन अंततः वह कुल के यश, शांति और स्वास्थ्य का भक्षण कर लेता है। धन की पवित्रता ही जीवन की सर्वोच्च पूंजी है।
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