शैल शक्ति ब्यूरो
देवभूमि उत्तराखंड अपने कण-कण में देवी-देवताओं के अनगिनत रहस्य और पौराणिक गाथाओं को समेटे हुए है। प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश के जन्म और उनके ‘गजानन’ बनने की कथा से तो पूरा विश्व परिचित है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्तराखंड में दो ऐसे अद्भुत और रहस्यमयी स्थान मौजूद हैं, जो इस आदि घटना के सीधे साक्षी हैं? हैरान करने वाली बात यह है कि राज्य में एक स्थान पर भगवान गणेश के कटे हुए धड़ की पूजा होती है, तो सैकड़ों किलोमीटर दूर एक अन्य रहस्यमयी गुफा में उनके असली (मानव) मस्तक की।
आइए जानते हैं आस्था और भूगर्भीय आश्चर्यों से भरे इन दोनों पवित्र धामों के बारे में:
रुद्रप्रयाग का मुण्ड कटिया मंदिर: जहाँ होती है केवल धड़ की पूजा
केदारनाथ घाटी में गौरीकुंड से कुछ ही दूरी पर स्थित है श्री मुण्ड कटिया गणेश मन्दिर। शिव पुराण के अनुसार, यह वही सटीक स्थान है जहाँ माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से बालक गणेश की रचना की थी।
कथा: जब माता पार्वती स्नान कर रही थीं, तब बाल गणेश द्वार पर पहरा दे रहे थे। अनजान भगवान शिव जब वहाँ पहुँचे, तो बालक ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। इस हठ को देखकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और अपने त्रिशूल से बालक गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया।
अनोखी प्रतिमा: मान्यता है कि यहीं पर गणेश जी का कटा हुआ सिर (मुण्ड) गिरा था। माता पार्वती के विलाप के बाद शिव जी ने उन्हें हाथी का सिर लगाकर ‘गजानन’ बनाया। आज यह विश्व का एकमात्र ऐसा गणेश मंदिर है, जहाँ भगवान गणेश की बिना सिर (केवल धड़) वाली अत्यंत प्राचीन और दुर्लभ मूर्ति स्थापित है।
पिथौरागढ़ की पाताल भुवनेश्वर गुफा: जहाँ सुरक्षित है ‘आदि गणेश’ का मस्तक
- अब सवाल यह उठता है कि भगवान शिव द्वारा काटा गया वह असली मानव सिर कहाँ गया? इस रहस्य का उत्तर कुमाऊं मंडल के पिथौरागढ़ जिले में स्थित पाताल भुवनेश्वर गुफा में मिलता है। स्कंद पुराण के मानस खंड में भी इस विशाल और रहस्यमयी गुफा का विस्तृत वर्णन है।
आदि गणेश: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने गणेश जी के उस असली मस्तक को इसी गुफा में सुरक्षित रख दिया था। ज़मीन से लगभग 90 फीट गहरी इस गुफा के भीतर मौजूद शिलारूपी मस्तक को ‘आदि गणेश’ के रूप में पूजा जाता है।
ब्रह्मकमल से प्राकृतिक अभिषेक: सबसे बड़ा चमत्कार इस गुफा के भीतर देखने को मिलता है। आदि गणेश के शिलारूपी सिर के ठीक ऊपर एक प्राकृतिक चट्टान है, जो 108 पंखुड़ियों वाले ‘ब्रह्मकमल’ के आकार की है। इस कमल से दिन-रात पानी की दिव्य बूंदें सीधे आदि गणेश के मुख पर टपकती रहती हैं, जिसे भगवान गणेश का निरंतर होने वाला प्राकृतिक अभिषेक माना जाता है।
- आस्था और भूगर्भ विज्ञान का अद्भुत संगम
- ये दोनों ही स्थान केवल पौराणिक कथाओं के केंद्र नहीं हैं, बल्कि देवभूमि की उस समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं, जो सदियों से श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचते आए हैं। एक ओर गौरीकुंड का मुण्डकटिया मंदिर मातृभक्ति और गजानन के प्राकट्य का प्रतीक है, तो दूसरी ओर पाताल भुवनेश्वर की गहराई में स्थित आदि गणेश का मस्तक देवभूमि के रहस्यों को और भी गहरा कर देता है।
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