​हिमालय की गोद में दिव्य धाम: जहाँ गगनचुंबी शिखर पर विराजती हैं ‘माँ जयंती’

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हिमालय की गोद में दिव्य धाम

​पिथौरागढ़। देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में देवी-देवताओं का वास है। इसी कड़ी में सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के ऊंचे पर्वत शिखर पर स्थित ‘ध्वज मंदिर’ आस्था और प्रकृति का एक अद्भुत संगम है। यह पवित्र स्थल न केवल आदि शक्ति माँ जयंती को समर्पित है, बल्कि भगवान शिव के ‘ध्वजेश’ स्वरूप का भी सिद्ध केंद्र है।

​’जयंती’ नाम का रहस्य और महामंत्र

माँ दुर्गा की स्तुति में गूंजने वाले सुप्रसिद्ध अर्गलास्तोत्र का पहला श्लोक ही माँ जयंती के नाम से आरम्भ होता है:

“जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।

  दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु‍ते॥”

​इस मंत्र में माँ के 11 प्रमुख नामों का स्मरण किया गया है, जिसमें सर्वप्रथम नाम ‘जयंती’ है। ‘जयंती’ का अर्थ है—सर्वोत्कर्षेण वर्तते, अर्थात जो सबसे प्रमुख, विजयशालिनी और सर्व सौभाग्य दायिनी हैं। इन्हीं माँ जयंती का भव्य दरबार पिथौरागढ़ की ऊंची पहाड़ियों पर सुशोभित है।

​दुर्गम चढ़ाई और भव्य नज़ारा

समुद्र तल से लगभग 2100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर ‘ध्वज मंदिर’ के नाम से विख्यात है। यहाँ पहुँचने के लिए पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी वाहन द्वारा और तत्पश्चात 5 किलोमीटर की खड़ी और दुर्गम पैदल चढ़ाई तय करनी पड़ती है।
पर्वत की चोटी पर पहुँचते ही थकान विलीन हो जाती है। यहाँ से चारों ओर हिमालय की पर्वत मालाओं का जो भव्य नज़ारा दिखता है, वह अलौकिक है। इस शिखर के सामने अन्य पर्वत बौने प्रतीत होते हैं।

शिव-शक्ति का अनूठा मिलन

ध्वज पर्वत केवल माँ जयंती का ही नहीं, बल्कि शिव-शक्ति के मिलन का साक्षी है। मुख्य मंदिर से कुछ पहले एक अद्भुत प्राकृतिक गुफा है, जहाँ भगवान शंकर ‘पिंडी’ रूप में विराजमान हैं। इन्हें यहाँ ‘खण्डे नाथ’ के नाम से पूजा जाता है।

स्कंद पुराण में ध्वज पर्वत की महिमा

इस पावन तीर्थ का वर्णन ‘स्कंद पुराण’ के मानस खंड में विस्तार से मिलता है। महर्षि व्यास ने ऋषियों को बताया है कि रामगंगा के बाईं ओर ‘पावन पर्वत’ के दक्षिण में ‘ध्वज पर्वत’ स्थित है।
​औषधियों का भंडार: यह पर्वत दिव्य औषधियों और धातुओं से परिपूर्ण है। यहाँ की हवाओं में ही रोगनाशक शक्ति मानी जाती है।
​सिद्धों का निवास: यह स्थान सिद्धों, विद्याधरों और गंधर्वों द्वारा सेवित है।
​नदियों का उद्गम: यहाँ से नन्दा, चर्मण्वती और सत्यवती नामक तीन पवित्र नदियाँ निकलती हैं, जो अंततः काली (श्यामा) नदी में मिलती हैं। इनका जल गोदान के फल के समान पुण्यदायी माना गया है।
​मनोकामना पूर्ति का विधान
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहाँ गणनायक ‘विकुम्भ’ ने भगवान शंकर की ध्वजा धारण की थी, इसी कारण यहाँ शिव ‘ध्वजेश’ रूप में पूजे जाते हैं।
​विशेष तिथियाँ: चतुर्दशी के दिन यहाँ चढ़ाई करने और पूजन करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। पूर्णिमा की रात्रि जागरण करने से अष्ट-सिद्धियों की प्राप्ति होती है। ‘शनिप्रदोष’ के दिन यहाँ दर्शन करना अत्यंत फलदायी बताया गया है।
​पूजन विधि: कनेल के फूलों से ध्वजेश का पूजन करने पर विशेष सिद्धि प्राप्त होती है।

व्यापारी प्रसन्न और सत्यधर्मा की कथा

इस धाम से जुड़ी एक प्राचीन कथा के अनुसार, ‘प्रसन्न’ नामक एक धार्मिक वैश्य और उसका पुत्र ‘सत्यधर्मा’ जब दरिद्रता के चक्र में फंस गए थे, तब एक शिवयोगी की प्रेरणा से उन्होंने ध्वज पर्वत पर तप किया। शिव-शक्ति की कृपा से उन्हें न केवल खोया हुआ वैभव मिला, बल्कि अलौकिक सिद्धियाँ भी प्राप्त हुईं।

ध्वज पर्वत के दाहिनी ओर ‘ध्वजगुहा’ और पूर्व में ‘सिद्धगुहा’ (जहाँ पूजन से गूंगापन दूर होने की मान्यता है) जैसी अलौकिक जगहों से घिरा यह क्षेत्र वास्तव में रहस्य और रोमांच से भरा है। माँ जयंती और ध्वजेश महादेव का यह धाम युगों-युगों से भक्तों की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
​(मूल आलेख व शोध: रमाकान्त पन्त)

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