बहुत पुरानी बात है, कुमाऊं के घने बांज-बुरांश के वनों से घिरे देवीधुरा में आतंक का साया गहराया हुआ था। आस-पास के पर्वतीय क्षेत्रों में राक्षसों का ऐसा उपद्रव फैला कि प्रजा त्राहि-त्राहि कर उठी। तब संपूर्ण क्षेत्र की रक्षा के लिए भगवती मां वाराही की आराधना की गई। देवी ने क्षेत्र को दुष्ट शक्तियों से मुक्ति दिलाने का वचन तो दिया, किंतु उसके बदले प्रतिवर्ष श्रावण पूर्णिमा पर एक नरबलि की व्यवस्था तय हुई।
गांव की व्यवस्था के अनुसार चारों प्रमुख खामों—चम्याल, गहड़वाल, लमगड़िया और वालिक—से बारी-बारी हर वर्ष एक युवक को मां के चरणों में अर्पित किया जाने लगा। कालचक्र घूमता रहा और एक वर्ष बलि की बारी चम्याल खाम की एक वृद्ध महिला के परिवार पर आ पहुंची। उस वृद्धा के संसार में उसके इकलौते पौत्र के अतिरिक्त कोई न था। वह बालक ही उसके जीने का सहारा और कुल का अंतिम दीपक था।
बलि का दिन जैसे-जैसे निकट आने लगा, दादी की ममता व्याकुल हो उठी। अपने अबोध पौत्र को खोने की कल्पना मात्र से उसका हृदय विदीर्ण हो गया। उसने बालक को आंचल में छुपाया और मां वाराही के पाषाण स्वरूप के सम्मुख बैठकर अखंड तपस्या आरंभ कर दी। उसने अन्न-जल त्याग दिया और अश्रुपूरित नेत्रों से देवी से प्रार्थना करने लगी, “हे जगदंबा! तू तो जगत की माता है, फिर एक असहाय वृद्धा की गोद कैसे सूनी कर सकती है? मेरे इस एकमात्र सहारे की रक्षा कर मां!”
वृद्धा की करुण पुकार और निष्कपट भक्ति ने देवी के सिंहासन को हिला दिया। श्रावण पूर्णिमा की भोर में मां वाराही ने ममतामयी रूप में प्रकट होकर उस वृद्धा को दर्शन दिए। देवी ने कहा, “तेरी भक्ति और वात्सल्य ने मुझे परास्त कर दिया। अब से मेरे धाम में किसी निर्दोष की बलि नहीं दी जाएगी। किंतु इस तपोभूमि की मर्यादा बनाए रखने के लिए चारों खामों के वीर आपस में पाषाण-युद्ध (बग्वाल) लड़ेंगे। इस युद्ध में जो सामूहिक रक्त बहेगा, मैं उसे ही एक नरबलि के समतुल्य स्वीकार करूंगी।”
देवी की आज्ञा पाकर चारों खामों के वीरों ने हाथों में रिंगाल की छत्रियां थामीं और पत्थरों से शौर्य प्रदर्शन आरंभ किया। एक मनुष्य के रक्त के बराबर आहुति मिलते ही युद्ध रोक दिया गया और मां का आशीर्वाद सब पर बरस पड़ा। तभी से हर वर्ष रक्षाबंधन के दिन ममता की इस विजय और देवी के वचन को निभाने के लिए देवीधुरा में यह पावन कथा जीवंत हो उठती है।
हालांकि कालचक्र बदला और रक्त के उस प्राचीन विधान ने अब प्रेम और सौहार्द का नया रूप ले लिया है। आस्था की मर्यादा को अक्षुण्ण रखते हुए अब इस पाषाण-रण में नुकीले पत्थरों का स्थान पहाड़ी नाशपाती, सेब और अखरोट जैसे फलों तथा पुष्पों ने ले लिया है। युद्ध की गूंज, ढोल-दमाऊं की थाप और योद्धाओं का शौर्य आज भी वही है, किंतु अब यह प्रहार किसी को घायल करने के लिए नहीं, बल्कि मां वाराही के चरणों में श्रद्धा और प्रकृति की भेंट अर्पित करने के लिए होता है। फिर भी पत्थर चल ही जाते है पुजारी के चंवर झुलाते ही यह अद्भुत युद्ध थम जाता है, और रणभूमि में आमने-सामने डटे योद्धा एक-दूसरे को गले लगाकर उस अनदेखी शक्ति का आशीर्वाद ग्रहण करते हैं।
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