क्या सचमुच आज भी महर्षि वेदव्यास की अमर तपोभूमि पर अदृश्य रूप में विचरती हैं अलौकिक शक्तियां
देवभूमि उत्तराखंड की गोद में बसी व्यास घाटी का हृदय स्थल गूंजी, केवल कैलाश मानसरोवर और आदि कैलाश यात्रा का एक मुख्य पड़ाव नहीं है, बल्कि यह वह अलौकिक द्वार है जहां पहुंचकर मनुष्य भौतिक संसार को पीछे छोड़ अध्यात्म के परम शिखर की ओर कदम बढ़ाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस पावन भूमि को देवताओं की क्रीड़ास्थली और ऋषियों की तपोभूमि कहा गया है। यह वही क्षेत्र है जहां महर्षि वेदव्यास ने वर्षों तक कठोर तपस्या की थी और वेदों को चार भागों में विभक्त कर महाभारत जैसे महान महाकाव्य की रचना का सूत्रपात किया था। स्कंद पुराण के मानस खंड में इस पूरे क्षेत्र की महिमा गाई गई है, जहां कुटी यांकती और काली नदी का निर्मल जल प्रवाहित होता है, मानो साक्षात प्रकृति देवी महादेव के चरणों को पखारने के लिए व्याकुल हों।
भौगोलिक दृष्टि और यात्रा मार्ग की बात करें तो सीमांत मुख्यालय धारचूला से गूंजी की दूरी लगभग 70 किलोमीटर है। सीमा सड़क संगठन द्वारा निर्मित नई सड़क के जुड़ने से अब यह सफर पहले की तुलना में कहीं अधिक सुगम और समय की बचत करने वाला हो चुका है। समुद्र तल से लगभग 10,500 फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यहाँ का मौसम हमेशा अत्यंत ठंडा, शुद्ध और स्फूर्तिदायक रहता है। उच्च हिमालयी क्षेत्र और भारत, चीन व नेपाल के त्रिकोणीय संगम के समीप होने की वजह से सामरिक और कूटनीतिक रूप से भी गूंजी का विशेष महत्व है। संवेदनशील और सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए धारचूला प्रशासन से इनर लाइन परमिट यानी आंतरिक सुरक्षा अनुमति पत्र लेना अनिवार्य होता है, जो सुरक्षा जांच के बाद आसानी से मिल जाता है।
दुर्गम पहाड़ियों और हाड़ कंपाने वाली ठंड के बीच बसे इस खूबसूरत पड़ाव पर यात्रियों के ठहरने और बुनियादी सुविधाओं की मुकम्मल व्यवस्था की गई है। कुमाऊं मंडल विकास निगम (केएमवीएन) का विशाल पर्यटक आवास गृह यहाँ आने वाले यात्रियों को मुख्य रूप से सुरक्षित आवास और गर्म भोजन की बेहतर सुविधाएं प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, स्थानीय ‘रंग’ समुदाय के लोगों द्वारा संचालित पारंपरिक होमस्टे यहाँ आने वाले सैलानियों के लिए मुख्य आकर्षण हैं। इन होमस्टे में यात्रियों को न केवल ठहरने के लिए आरामदायक और पारंपरिक व्यवस्था मिलती है, बल्कि उन्हें स्थानीय उच्च हिमालयी संस्कृति, अनूठे खान-पान और यहाँ के निवासियों के सहज एकात्म जीवन को बेहद करीब से महसूस करने का मौका मिलता है। मुख्य यात्रा सीजन के दौरान यहाँ आधुनिक सुविधाओं से लैस अस्थाई टेंट कॉलोनियां भी स्थापित की जाती हैं। इसके साथ ही, देश की सीमाओं की रक्षा में तैनात आईटीबीपी और भारतीय सेना के जवानों की मौजूदगी, संचार के लिए सैटेलाइट फोन व स्थानीय प्रशासन द्वारा संचालित विशेष चिकित्सा शिविर चौबीसों घंटे तीर्थयात्रियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं के लिए तत्पर रहते हैं।
गूंजी से चारों ओर दृष्टि दौड़ाने पर जो हिम शिखर दिखाई देते हैं, उनका सौंदर्य किसी भी साधक या यात्री को सम्मोहन में बांधने के लिए पर्याप्त है। सूर्य की पहली किरण जब इन उत्तुंग श्वेत चोटियों पर पड़ती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो देवताओं ने सुवर्ण कलश उड़ेलकर पूरे पर्वतराज को कनक आभा से नहला दिया हो। बर्फ से ढकी ये चोटियाँ ऐसी लगती हैं मानो स्वयं सदाशिव अपनी समाधि में लीन हों और उनके पूरे विग्रह पर कर्पूर जैसी धवल भस्म लिपटी हुई हो। पास ही स्थित आदि कैलाश की भव्यता और ओम पर्वत का चमत्कारिक रूप, जहां प्रकृति स्वयं हिमखंडों से ॐ की आकृति रचती है, इस स्थान के सौंदर्य को अकल्पनीय बना देता है। यहाँ की बर्फीली हवाएँ जब देवदार और भोजपत्र के जंगलों से होकर गुजरती हैं, तो एक अद्भुत सरस संगीत पैदा होता है। पुराणों के अनुसार, जब भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश की ओर प्रस्थान करते थे, तो इस घाटी में उनके गण, यक्ष, गंधर्व और अप्सराएं उनका स्वागत करने के लिए एकत्रित होते थे। यहाँ आकर मानव स्वयं को देवताओं के अत्यंत निकट पाता है, जहाँ उसके सांसारिक संशय मिट जाते हैं और हृदय में केवल असीम श्रद्धा और आत्मिक शांति का ही साम्राज्य रह जाता है।
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