हिमालय की बर्फीली कन्दराओं में छिपा वह अलौकिक धाम, जहाँ मृत्यु के देवता भी थरराते हैं और जल की एक बूँद से कट जाते हैं तीन जन्मों के पाप!

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देवभूमि हिमालय की धवल, गगनचुंबी बर्फीली चोटियों के उस पार एक ऐसा गुप्त लोक विद्यमान है, जहाँ सृष्टि के महानतम रहस्य आज भी साँस ले रहे हैं। स्कन्द पुराण के मानसखण्ड (अध्याय २३ एवं २४) के पन्नों में वर्णित यह वृत्तांत केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, अपितु प्रकृति, अध्यात्म और मोक्ष के उस परम सत्य की गाथा है, जिसे सुनकर आधुनिक संसार विस्मय से भर उठता है। महर्षि व्यास जब ऋषियों के सम्मुख इस पावन भूमि के गुप्त आवरण को हटाते हैं, तो एक ऐसा दृश्य प्रकट होता है जो मानव मस्तिष्क की कल्पना से परे है।
नन्द पर्वत का गुप्त मण्डल और नन्दा सरोवर का अलौकिक प्रभाव
नन्द पर्वत के दो अति-विशाल बर्फीले शिखरों के ठीक मध्य में स्थित है अति-पुण्यमयी ‘नन्दा सरोवर’। इस सरोवर की नीलमणि-सी नीली तरंगों में वह सामर्थ्य है जो जीव को तत्क्षण जन्मांतर के भीषण पापों से मुक्त कर देती है। महर्षि व्यास इस प्रभाव का वर्णन करते हुए कहते हैं:
गिरेः शिखरयोर्मध्ये पुण्यो ‘नन्दासरः’ स्मृतः।
तत्र वै स्नानमात्रेण पातकात्प्रविमुच्यते॥
भावार्थ: नन्द पर्वत के दो शिखरों के बीच दिव्य नन्दा सरोवर बसा है। इसमें केवल एक बार डुबकी लगाने मात्र से प्राणी के समस्त पातक और महापाप तत्क्षण विलीन हो जाते हैं।
इसी नन्द पर्वत की बायीं दिशा में ब्रह्मर्षि वशिष्ठ का ओजस्वी आश्रम सुशोभित है, जहाँ वशिष्ठजी का पूजन समस्त पापों का शमन करता है। पर्वत पर स्थित ‘नन्दिकेश’ शिव की पूजा से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है। पर्वत के सर्वोच्च शिखर पर स्वयं भगवान विष्णु पर्वत रूप धारण कर शंख, चक्र, गदा और पद्म हाथ में लिए शाश्वत मुद्रा में विराजमान हैं।
वही पास की एक रहस्यमयी गुफा में भगवती महाकाली का वास है, जिनकी आराधना से प्राणी यमराज के भय से सदैव के लिए मुक्त हो जाता है। बर्फ के शीतल कणों के बीच निवास करने वाले चक्रपाणि विष्णु का पूजन करने से मनुष्य के तीन जन्मों में अर्जित पाप क्षणभर में भस्म हो जाते हैं।
शिव की जटाओं से फूटी नवरत्न नदियाँ: प्रकृति का सबसे सुन्दर रूप
मानसखण्ड के २४वें अध्याय में वर्णित नन्द पर्वत से निकलने वाली पावन नदियों का दृश्य अत्यंत मनोहारी है। जब हिमाद्रि के उत्तर भाग में सिद्धों और किन्नरों की तपोभूमि से ‘पिण्डारका’ (पिण्डर) नदी का जन्म होता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं भगवान शिव अपनी जटाओं को खोलकर करुणा की धारा बहा रहे हों।
बभूव सा सरिच्छ्रेष्ठा शंकरस्य जटोद्भूता। भित्त्वा पर्वतमुख्यान् वै संगता सरसोद्भवा॥
संगमे विष्णुगङ्गायाः संगता सरितां वरा।
भावार्थ: नदियों में श्रेष्ठ पिण्डर नदी भगवान शंकर की जटाओं से उत्पन्न होकर पर्वत शिखरों को चीरती हुई आगे बढ़ती है और अलकनन्दा (विष्णुगंगा) में समाहित हो जाती है।
पिण्डर नदी के तटों पर भांति-भांति की दुर्लभ धातुओं की आभा छिटकी है, जहाँ हंस, बत्तख और चक्रवाक पक्षियों का कलरव गूंजता रहता है। कश्यप मुनि जैसे महान ऋषियों के आश्रम इसके किनारों की शोभा बढ़ाते हैं। नन्द पर्वत के इस आंचल में ९ दिव्य नदियों का अद्भुत संजाल बुना गया है:
१. पिण्डारका (पिण्डर) नदी: भगवान शिव की जटाओं से निकली यह मुख्य धारा सिद्धों और मुनियों की शरण्य है। इसके मूल में विराजमान ‘जटीश महादेव’ का जो भक्त रुद्राभिषेक की सौ आवृत्तियाँ करता है, उसकी २१ पीढ़ियाँ सीधे शिवलोक को प्राप्त होती हैं।
२. विष्णुगङ्गा (अलकनन्दा): भगवान विष्णु के श्रीचरणों से निकली फेनयुक्त तरंगों वाली अलकनन्दा, जब पिण्डर से मिलती है तो कर्णप्रयाग जैसे महान मोक्ष-स्थल का जन्म होता है।
३. काली नदी एवं कालीह्रद: जब पिण्डर नदी काली नदी से मिलती है, तो वहाँ ‘कालीह्रद’ नामक एक अगाध, विशाल जलकुण्ड बनता है, जिसके स्पर्श मात्र से दुराचार का नाश होता है।
४. सरस्वती नदी: पिण्डर और सरस्वती के पावन संगम में डुबकी लगाने से मनुष्य स्त्री-हत्या जैसे घोर प्रायश्चित-योग्य पापों से भी छूट जाता है।
५. कमठी (कमला) नदी: इसके दक्षिण भाग स्थित संगम में स्नान करने वाला जीव पुनः इस पृथ्वी पर उत्तम और सर्वगुण संपन्न मानव देह प्राप्त करता है।
६. वैष्या नदी व वैष्य सरोवर: वैष्य पर्वत से बहकर पिण्डर में मिलने वाली वैष्या नदी जहाँ मिलती है, वहाँ वैष्य सरोवर बनता है, जो देह को निर्मल कर देता है।
७. बोधिनी नदी: बोधिनी पर्वत से निकली यह धारा बोधनाग और बोधरूप विष्णु की साधना का केंद्र है।
८. वृश्चिकी नदी तथा ९. कुकलासी नदी: नन्द पर्वत से प्रस्फुटित होने वाली ये दोनों लघु नदियाँ पिण्डर में मिलकर वर्षभर के समस्त पापों को बहा ले जाती हैं।
दानवीर कर्ण की अलौकिक साधना और कर्णप्रयाग का महान उदय
पिण्डर और विष्णुगंगा के संगम स्थल पर वह ऐतिहासिक और दिव्य घटना घटित हुई, जिसने कर्णप्रयाग को अमर बना दिया। सूर्यपुत्र महाबली कर्ण ने इसी तट पर तपस्या की ज्वाला जलाई थी। प्रसन्न होकर सूर्यदेव (सविता) ने प्रत्यक्ष दर्शन दिए और कर्ण को मनोवांछित वरदान, दिव्यास्त्र तथा अजय बाण प्रदान किए।
गङ्गायमुनयोः सङ्गे माघस्नानेन यत् फलम्।
तत्फलं स्नानमात्रेण प्रयागे कर्णसंज्ञके॥
भावार्थ: गंगा और यमुना के संगम (प्रयागराज) में माघ महीने में स्नान से जो अनंत पुण्य मिलता है, वह कर्णप्रयाग में मात्र एक बार आचमन या स्नान से प्राप्त हो जाता है।
वरदान पाकर महादानी कर्ण ने यहाँ रत्नों की राशि, सुवर्ण, तिल, गोदान, भूमि और गुड़ का ऐसा अपार दान दिया जिसकी उपमा तीनों लोकों में नहीं है। कर्ण ने स्वयं इस स्थान का नाम ‘कर्णप्रयाग’ रखा और यहाँ ‘कर्णेश्वर’ महादेव शिवलिंग की स्थापना की। जल में स्थित कमलाकान्त भगवान विष्णु की पूजा करके वे हस्तिनापुर लौटे थे।
कर्णप्रयाग में प्रातःकाल सूर्योदय के समय हिम कणों के पिघलने की भांति मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप गल जाते हैं। जो यहाँ कर्णेश्वर शिव और जलस्थ कमलाकान्त का ध्यान करता है, वह अपनी २१ कुलों के साथ परम पद को प्राप्त करता है।
लेखक@ रमाकान्त पन्त

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