शताब्दियों पुराना वो रहस्यमयी न्याय: जब देवदार की जड़ों से फूटी रक्त की धार और जाग उठे शिव के अंशावतार

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शताब्दियों पुराना वो रहस्यमयी न्याय: जब देवदार की जड़ों से फूटी रक्त की धार और जाग उठे शिव के अंशावतार
उत्तराखंड की पावन धरती पर कदम-कदम पर अध्यात्म और अलौकिक गाथाओं का एक ऐसा ताना-बाना बुना है, जहाँ विज्ञान के तर्क अक्सर मौन हो जाते हैं। हिमालय की गोद में बसे इस अंचल में कई ऐसे जाग्रत देवालय हैं, जो सदियों से मानवीय आस्था के सबसे बड़े केंद्र रहे हैं। इन्हीं में से एक सबसे गूढ़, विस्मयकारी और जागृत सत्ता है भगवान शिव के अंशावतार सैम देवता की। काल्पनिक या मनगढ़ंत कहानियों से परे, कुमाऊं के कण-कण में रची-बसी सैम देवता की गाथा इतनी प्रामाणिक है कि इसके सूत्र सीधे इतिहास, पौराणिक ग्रंथों और मानसखंड से जुड़ते हैं। अल्मोड़ा के घने देवदार के जंगलों में स्थित झांकर सैम से लेकर

पिथौरागढ़ की गंगोलीहाट तहसील के चिटगल धाम तक, सैम देवता को पहाड़ों का सर्वोच्च न्यायधीश और रक्षक माना जाता है। कल्याण करना ही जिनका एकमात्र धर्म है, उनकी वास्तविक और पौराणिक कथा आज भी पहाड़ों के जनजीवन का मुख्य आधार है।
कुमाऊं की सबसे प्रामाणिक लोकगाथाओं और जगरियों के मुख से पीढ़ी-दर-पीढ़ी बहकर आने वाले इतिहास के अनुसार, सैम देवता का संबंध डोटी और मानसखंड के क्षेत्रों से है। वे राजा निकंदर के दोहित्र और माता कालीनारा के मानस पुत्र हैं। लोक इतिहास में इन्हें तंत्र-मंत्र के महान ज्ञाता गुरु गोरखनाथ का परम शिष्य बताया गया है। सैम देवता के सगे भाई न्यायप्रिय राजा हरू हैं, यही कारण है कि कुमाऊं में हमेशा हरू-सैम की पूजा एक अटूट जोड़ी के रूप में की जाती है। इस वंशक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि सैम देवता उत्तराखंड के सबसे प्रसिद्ध और लोक-प्रिय न्याय के देवता गोल्ज्यू के सगे मामा हैं। इसी पवित्र रिश्ते के कारण संपूर्ण लोक परंपरा में सैम देवता को जगत का मामू या देवताओं का मामा कहकर पुकारा जाता है। कुमाऊँनी भाषा में सेम या सैम शब्द का वास्तविक अर्थ ही स्वयंभू होता है, यानी वह दैवीय शक्ति जो जल-स्रोतों और घने वनों के बीच खुद प्रकट होती है।
जनपद अल्मोड़ा मुख्यालय से करीब 38 किलोमीटर की दूरी पर विकास खंड धौलादेवी के अंतर्गत बांज, बुरांश और देवदार के घने जंगलों के बीच झांकर सैम का आलौकिक दरबार स्थित है। इस स्थान पर सैम के अवतरण को लेकर बेहद प्राचीन कथाएं प्रचलित हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, जब राजा दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने के बाद माता सती ने आत्मदाह किया था, तब महादेव उनके वियोग में गहरे दुःख से भर गए थे। शिव ने सती के आत्मदाह की भस्म को अपने पूरे शरीर पर मला और इसी झांकर के घनघोर जंगलों में हजारों वर्षों तक घोर तपस्या की थी। एक अन्य ऐतिहासिक लोकश्रुति आठवीं सदी के आसपास की है, जब जागेश्वर धाम में मुख्य मंदिरों के निर्माण का कार्य चल रहा था। तब वहाँ अचानक अजीबोगरीब अवरोध आने लगे और दिनभर में बने मंदिर रात को अपने आप धराशायी हो जाते थे। वर्षों तक जब यही क्रम चलता रहा, तो अंततः ब्राह्मण ज्योतिषियों और सिद्ध योगियों की एक महासभा बुलाई गई। तंत्र और ज्योतिष के उपायों से पता चला कि जागेश्वर की दक्षिण दिशा से आने वाले शिवगण यह उत्पात मचा रहे हैं, क्योंकि वे अपने आराध्य सनातन शिव को वसुंधरा में खुले आकाश के नीचे देखना चाहते थे। तब शिव की महिमा से, भक्तों की इच्छा और गणों को शांत करने के लिए, महादेव ने स्वयं यहाँ सैम के रूप में एक स्वयंभू लिंग अवतार लिया। गणों की संतुष्टि के लिए पास में ही क्षेत्रपाल ने भी डेरा डाला जहाँ बलि प्रथा शुरू हुई। परंतु, सैम देवता का यह दरबार अत्यंत पवित्र और सात्विक है, इसलिए सैम देव को कभी कोई बलि नहीं दी जाती; यहाँ का चढ़ावा केवल सात्विक होता है और बलिदान केवल क्षेत्रपाल या भगवती के गणों को अर्पित किया जाता है।
झांकर सैम के विषय में मंदिर के पुजारियों के अनुसार एक और अद्भुत कथा जनमानस में प्रचलित है। प्राचीन काल में पास के ही एक गांव में नीरा जैत नाम की एक महिला रहती थी, जो अपने जीवन के दुखों से बेहद व्याकुल थी। एक दिन इसी घने जंगल में घास-लकड़ी काटते समय वह अपनी मानसिक पीड़ा से इतनी उद्वेलित हो उठी कि उसने हाथ में पकड़ी दरांती से जमीन पर जोर से चोट मार दी। दरांती लगते ही उस स्थान से अचानक इंसानी खून की एक तेज धार फूट पड़ी। डरी-सहमी महिला जब गांव वालों को बुलाने भागी और लोग वापस आए, तो उन्होंने देखा कि वह रक्त धीरे-धीरे पवित्र दूध की धारा में बदल चुका था और वहाँ भूमि से एक स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हो रहा था। तभी आकाशवाणी हुई कि घबराओ नहीं, पास के गांव से नौनी यानी ताजा मक्खन लाकर इस लिंग पर लेपन करो, जिससे यह रक्त शांत होगा और तुम्हारा कल्याण होगा। आज भी झांकर सैम के इस प्राचीन लिंग पर दरांती की चोट का वह ऐतिहासिक निशान साफ देखा जा सकता है।
इस अद्भुत इतिहास के साथ ही सैम देवता के जागर की सबसे बड़ी और विस्मयकारी विशेषता यह है कि जब उनका डंगरिया नृत्य करता है, तो वह केवल एक पैर पर खड़ा होकर नाचता है। इसके पीछे कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि भाईचारे और वीरता का एक ऐतिहासिक सच छुपा है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में जब सैम देवता के भाई हरू और उनके भांजे गोल्ज्यू को दुश्मनों ने छिपलाकोट के दुर्गम किले में बंदी बना लिया था, तब सैम देवता ने अपनी असीम तंत्र शक्ति और युद्ध कौशल से उस अभेद्य किले को ध्वस्त कर दिया था। अपने भाइयों को मुक्त कराकर लौटते समय, छिपलाकोट की पथरीली और दुर्गम पहाड़ियों पर एक विशाल शिलाखंड से टकराकर सैम देवता के पैर में गंभीर चोट लग गई थी। अपने भक्तों और परिवार की रक्षा में लगे उस ऐतिहासिक घाव के सम्मान में, आज भी जब लोक में सैम देवता का आह्वान होता है, तो उनका डंगरिया एक पैर पर ही अलौकिक नृत्य करता है।
झांकर सैम के इसी स्वयंभू स्वरूप का विस्तार पिथौरागढ़ जिले की गंगोलीहाट तहसील के अंतर्गत आने वाले चिटगल गांव में भी दिखाई देता है। चिटगल का सैम देवता मंदिर इस पूरे क्षेत्र की सर्वोच्च न्यायपीठ माना जाता है, जहाँ वे ग्राम देवता और भूमि के रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं। चिटगल दरबार की महिमा यह है कि यहाँ आज भी नई फसल कटने पर सबसे पहला भोग सैम देवता को ही लगाया जाता है। यहा विशेष भेंट चढ़ाने की अटूट परंपरा है। इस दरबार में किसी भी प्रकार का छल, कपट या झूठ क्षण भर भी नहीं टिक पाता। जब संसार की अदालतें किसी असहाय को निराश कर देती हैं, तब पीड़ित व्यक्ति चिटगल दरबार में आकर घात यानी न्याय की अर्जी डालता है। मान्यता है कि इसके बाद सैम देवता स्वयं उस अन्याय का संहार करते हैं। सैम देवता के स्वयंभू लिंग कुमाऊं में कई स्थानों पर मौजूद हैं। धौलादेवी विकास खंड में ही तलचौना गांव से आगे 4 किलोमीटर घने बियाबान जंगल में भी सैम देवता का एक फुट लिंग स्थापित है, जिसके दर्शन मात्र से मनौतियां पूरी होती हैं। सैम देवता की यह पूरी गाथा स्पष्ट करती है कि वे पहाड़ों की विषम परिस्थितियों में केवल एक पूजनीय प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे सत्य, सदाचार और अचूक न्याय की वो जीवित विरासत हैं जो सदियों से देवभूमि की अस्मिता को संभाले हुए है।
रिपोर्ट : रमाकान्त पन्त