पाताल की अथांग गहराइयों में छुपा वो अलौकिक धाम, जहां इंसान नहीं बल्कि प्रकृति स्वयं करती है ‘त्रिभुवन के गुरु’ का पहला जलाभिषेक.

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पृथ्वी के भीतर छुपा वो रहस्यमयी पाताल धाम, जहां इंसान नहीं बल्कि स्वयं प्रकृति करती है देवों के गुरु का पहला जलाभिषेक…
गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व संपूर्ण राष्ट्र में अपार श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। गुरु और शिष्य की इस अनुपम परंपरा के मध्य एक ऐसा दिव्य धाम भी है, जहां गुरु पूजन का विधान कोई मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं प्रकृति रचती है। उत्तराखंड की पावन पर्वत शृंखलाओं के बीच स्थित यह रहस्यमयी स्थल न केवल आस्था का शिखर है, बल्कि सनातन दर्शन के गूढ़ रहस्यों और त्रिदेवों की उपस्थिति को अपने आंचल में समेटे हुए है।
देवभूमि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में प्रसिद्ध गंगोलीहाट स्थित महाकाली दरबार से लगभग 11 किलोमीटर दूर भूगर्भ की अचूक गहराइयों में बसी पाताल भुवनेश्वर गुफा विद्यमान है। यह केवल एक प्राकृतिक गुफा मात्र नहीं, बल्कि एक ऐसा अलौकिक गुरुधाम है जिसे पुराणों में पाताल लोक का प्रवेश द्वार माना गया है। इस गुफा के भीतर प्रवेश करते ही एक अतीन्द्रिय संसार की अनुभूति होती है, जहां सदियों का प्राचीन इतिहास और सनातन चेतना की अविरल धारा प्रत्यक्ष जीवंत हो उठती है।
मान्यता है कि तीनों लोकों के स्वामी भगवान भुवनेश्वर नाथ जी ही त्रिभुवन के आदि गुरु हैं। पाताल लोक की इस गुफा में स्थित पिंडी रूप में स्वयं त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—विराजमान हैं। इस पावन स्थल की सबसे अद्भुत और चमत्कारिक विशेषता यह है कि यहां किसी मनुष्य द्वारा पूजन-अर्चन से पूर्व ही प्रकृति निरंतर जलधारा के रूप में प्रभु का जलाभिषेक करती रहती है। गुफा की शिलाओं से निरंतर टपकती जल की बूंदें सीधा पिंडी का अभिषेक करती हैं, मानो प्रकृति स्वयं गुरुदेव के चरणों में नतमस्तक होकर अपना अर्घ्य समर्पित कर रही हो।
सनातन संस्कृति में गूंजने वाला परम पावन मंत्र ‘गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु, गुरु ही देवो महेश्वरः’ इसी पवित्र स्थल पर साक्षात चरितार्थ होता दिखाई देता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस रहस्यमयी गुफा में गुरुदेव भुवनेश्वर के केवल दर्शन मात्र से ही साधक को सहस्रों अश्वमेघ यज्ञों का पुण्य फल प्राप्त हो जाता है। वहीं जो भक्त गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर यहां विधिवत गुरु पूजन संपन्न करता है, उसे दस हजार गुना अधिक दिव्य फल की प्राप्ति होती है।
पाताल भुवनेश्वर की इस अगाध महिमा का वर्णन स्कंद पुराण के मानस खंड में भी विस्तार से मिलता है। गुरु पूर्णिमा के शुभ दिन अवतरित हुए महर्षि वेदव्यास जी ने इस पवित्र स्थल का बखान करते हुए कहा है कि जो मनुष्य निष्काम भाव से भगवान भुवनेश्वर का नामोच्चार, स्मरण या स्पर्श करता है, उसके जन्मांतर के पाप विनष्ट हो जाते हैं। प्रभु की कृपा से अनजाने में ही साधक के इक्कीस कुलों का उद्धार हो जाता है और वह अपने पूर्वजों सहित शिवलोक की परम गति को प्राप्त करता है। इसी अलौकिक सामर्थ्य के कारण तैंतीस कोटि देवी-देवता भगवान भुवनेश्वर की अखंड साधना हेतु यहां अदृश्य रूप से निवास करते हैं। यक्ष, गंधर्व, सिद्ध ऋषि-मुनि, अप्सराएं, दानव और नाग-नागिनें सभी इस पाताल धाम में सतत आराधना में लीन रहकर प्रभु की अनुकंपा प्राप्त करते हैं।
धाम की पवित्रता और व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए मंदिर कमेटी के अध्यक्ष नीलम भण्डारी ने कहा कि पाताल भुवनेश्वर मात्र एक तीर्थ नहीं, बल्कि सनातन चेतना और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का जाग्रत केंद्र है। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर यहां प्रकृति द्वारा स्वयं भगवान का जलाभिषेक किया जाना इस धाम की आलौकिकता का साक्षात प्रमाण है। उन्होंने बताया कि इस पावन पर्व पर दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर समिति की ओर से सुगम दर्शन, सुरक्षा और विशेष व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं, ताकि हर भक्त भूगर्भ के इस अलौकिक वातावरण में गुरु कृपा और शांति का अनुभव कर सके।
प्रकृति और गुरु के इस अद्भुत समागम का स्मरण मात्र ही मनुष्य को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर परम शांति की ओर ले जाता है।