सदियों की सीमा लांघने वाला वो त्रिकालदर्शी योगी, जिसके चमत्कारों के आगे विज्ञान ने भी टेक दिए घुटने

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सदियों की सीमा लांघने वाला वो त्रिकालदर्शी योगी, जिसके चमत्कारों के आगे विज्ञान ने भी टेक दिए घुटने
देवरिया।भारत भूमि सनातन काल से ही सिद्ध संतों, ऋषियों और योगियों की तपोभूमि रही है। इस पावन धरा पर समय-समय पर ऐसी दिव्य आत्माओं ने अवतार लिया है, जिनकी साधना और शक्तियों ने प्रकृति के स्थापित नियमों को भी विस्मित कर दिया। आध्यात्मिक वैभव से परिपूर्ण इस देश में जब-जब सत्य, धर्म और मानवीय मूल्यों की रक्षा करने वाले युगपुरुषों की चर्चा होगी, तब-तब परम पूज्य देवराहा बाबा का नाम पूरे आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाएगा। वे केवल एक संत नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जगत के एक ऐसे अलौकिक महापुरुष थे, जिनका जीवन आज के आधुनिक विज्ञान और बुद्धिजीवियों के लिए एक अनसुलझी और अबूझ पहेली बना हुआ है।
देवराहा बाबा के जीवन का सबसे बड़ा और विस्मयकारी रहस्य उनकी आयु थी, जिसने चिकित्सा विज्ञान के सारे सिद्धांतों को चुनौती दे दी थी। उनके समकालीन समाज में कोई उनकी उम्र ढाई सौ वर्ष बताता था, तो कोई उन्हें पांच सौ या उससे भी अधिक वर्षों का जीवंत इतिहास मानता था। इतिहास के पन्नों और जनश्रुतियों को टटोलें तो पता चलता है कि बाबा ने कई सदियों को बदलते देखा था। उन्होंने बड़े-बड़े साम्राज्यों को बनते, बदलते और मिटते देखा, लेकिन उनका अपना दिव्य स्वरूप हमेशा एक समान, निश्छल और असीम ऊर्जा से भरा रहा। पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन बाबा की काया पर समय का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। विज्ञान जहां इंसानी उम्र की एक निश्चित सीमा तय करता है, वहीं बाबा ने इस सीमा को लांघकर यह साबित कर दिया कि योग साधना से शरीर को कालजयी बनाया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के मइल गांव में सरयू और यमुना के पावन तटों पर चार खंभों पर टिका एक साधारण लकड़ी का मचान ही उनका दिव्य भवन था। इसी ऊंचे काठ के मचान पर रहकर इस महान त्रिकालदर्शी योगी ने पूरी मानवता को अध्यात्म का अनूठा पाठ पढ़ाया। वे संसार से कुछ लेते नहीं थे, बल्कि समाज को अपना निस्वार्थ प्रेम और करुणा बांटते थे। इस साधारण से मचान की महिमा ऐसी थी कि आम नागरिकों से लेकर देश-विदेश के राजा-महाराजा, राजनेता और बड़ी-बड़ी हस्तियां बाबा के चरणों में शीश झुकाने आती थीं। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, महामना मदन मोहन मालवीय, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मुलायम सिंह यादव जैसी तमाम विभूतियां बाबा का आशीर्वाद लेने के लिए व्याकुल रहती थीं। भारत की पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी भी उनकी अनन्य भक्त थीं। माना जाता है कि राजनीति की महान ऊंचाइयों पर उन्होंने जो प्रतिष्ठा प्राप्त की, उसके पीछे देवराहा बाबा का ही दिव्य वरदान था।
बाबा का आशीर्वाद देने का ढंग भी अत्यंत निराला और अलौकिक था। वे मचान पर बैठे-बैठे ही अपना पैर नीचे कर देते थे और भक्त उसी पावन चरण का स्पर्श कर धन्य हो जाते थे। उनके दरबार में आने वाले भक्तों के साथ कई ऐसी चमत्कारिक घटनाएं जुड़ी हैं, जो आज भी जनमानस में कौतूहल पैदा करती हैं। ऐसा ही एक सबसे बड़ा रहस्य था बाबा का ‘प्रसाद वितरण’। उनके दर्शन के लिए रोज हजारों की भीड़ उमड़ती थी। सूने मचान पर बिना किसी भंडारण या रसोई के, बाबा मचान के नीचे हाथ फैलाते ही पल भर में ताजे फल और शुद्ध मिष्ठान्न का प्रसाद प्रकट कर देते थे। वह प्रसाद कहाँ से आता था, इसका उत्तर आज तक कोई नहीं ढूंढ पाया।
इसके अलावा, बाबा को शब्दों और प्रकृति का अद्भुत ज्ञान था। वे इंसानों ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों और हिंसक जानवरों की भाषा भी पूरी तरह समझते थे और उनकी पीड़ा का निदान करते थे। उनके मचान के आसपास गायें और अन्य जीव अत्यंत शांत भाव से विचरते थे। पुराने लोग बताते हैं कि बाबा में ‘परकाया प्रवेश’ और ‘जल गमन’ जैसी सिद्धियां थीं। कई बार उन्हें एक ही समय पर अलग-अलग नदियों के तट पर स्नान करते हुए देखा गया, जिसे विज्ञान की भाषा में ‘बाइलोकेशन’ यानी एक समय में दो जगहों पर मौजूद होना कहा जाता है। वे सामने खड़े किसी भी व्यक्ति को देखकर उसके भूत, भविष्य और उसके मन में चल रही हलचल को सहज ही भांप लेते थे और बिना बताए ही उसकी समस्या का समाधान कर देते थे।
शारीरिक रूप से मर्यादा के रक्षक, परम गौ-भक्त और निष्काम कर्मयोगी देवराहा बाबा ने आजीवन प्रभु श्री रामचंद्र जी की आराधना की। वे वेदों, उपनिषदों, पुराणों, गीता और दर्शन शास्त्र के तत्वमय रहस्यों के ज्ञाता थे। उन्होंने दुनिया को ‘नाम सिमरन’ का सार बतलाया और हमेशा पर्यावरण के संरक्षण पर बल दिया। उनके हृदय में प्रकृति और वृक्षों के प्रति अगाध श्रद्धा थी। बाबा हमेशा कहते थे कि प्रेम ही ईश्वर है और हर जीव पर दया करना ही सबसे बड़ा मानव धर्म है।
जून 1990 में इस महान योगी ने अपने नश्वर शरीर का परित्याग कर परम सत्ता में विलीन होने का निर्णय लिया। आज भले ही बाबा सशरीर हमारे बीच मौजूद न हों, लेकिन उनकी दिव्य चेतना, उनका वह पावन मचान और लहरों में गूंजता उनका दिव्य आशीर्वाद आज भी हर श्रद्धालु के हृदय में पूरी तरह जीवंत है। माँ बगलामुखी के परम उपासक और सत्य साधक श्री विजेंद्र पांडे गुरु जी ने भी इस पावन स्थल के दर्शन कर इसकी महिमा को अद्भुत बताया है। उनका मानना है कि ऐसे संत युगों-युगों में धरती पर अवतरित होते हैं और यदि इस पवित्र स्थान को पूरी निष्ठा के साथ एक प्रमुख तीर्थ स्थल के रूप में विकसित किया जाए, तो यह पावन स्थली पूरी दुनिया में भारत के आध्यात्मिक गौरव की ख्याति फैलाएगी। इस पुण्यतिथि पर उस महान त्रिकालदर्शी, लोक-कल्याणकारी महायोगी के चरणों में कोटि-कोटि नमन।

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