कैलाश काशी और हिम शिखरों के महापुण्य का अलौकिक रहस्य

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कैलाश काशी और हिम शिखरों के महापुण्य का अलौकिक रहस्य
पिथौरागढ़/सनातन वांग्मय में ज्ञान और वैराग्य की चर्चा जब भी होती है, तब गुरु और शिष्य का संवाद एक अद्भुत प्रकाश स्तंभ बनकर सामने आता है। स्कन्दपुराण के मानसखंड के अंतर्गत आने वाले आठवें अध्याय में एक ऐसा ही परम पावन और रहस्यों से भरा संवाद वर्णित है, जो साक्षात् विष्णु के अवतार स्वरूप महामना दत्तात्रेय और देव-ब्राह्मणों के पूजक काशीराज धन्वन्तरि के बीच घटित होता है। इस अलौकिक प्रसंग की शुरुआत में व्यास जी बताते हैं कि जब योगीश्रेष्ठ दत्तात्रेय विभिन्न तीर्थों का दर्शन करके लौटते हैं, तो पराक्रमी राजा धन्वन्तरि उनका भव्य स्वागत करते हैं। राजा उन्हें शुभ आसन पर बिठाकर भोजन कराते हैं और आदरपूर्वक कहते हैं कि आपकी कृपा से मेरा कल्याण हुआ है, क्योंकि आप जैसे योगेश्वर के ध्यानस्थ होने से कुलीन राजाओं की संपत्ति देवाधीन हो जाती है, सुखपूर्वक भोगी जाती है और विपत्तियां कभी नहीं आतीं। यहाँ धन्वन्तरि अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हुए दत्तात्रेय से कहते हैं कि आपने वाराणसी सहित अनेक पुण्यस्थलों, नदियों और सरोवरों को देखा है, इसलिए मैं आपसे कुछ अत्यंत गोपनीय बातें पूछना चाहता हूँ। इस पर दत्तात्रेय जी सहज भाव से कहते हैं कि हे राजसिंह, तुम अवश्य पूछो, क्योंकि स्नेही शिष्य से गुरुजन अपने हृदय की परम रहस्यात्मक बातें भी कह देते हैं।
इस दिव्य संवाद का विस्तार आगे देखने को मिलता है, जहाँ राजा धन्वन्तरि उस तीर्थ के बारे में पूछते हैं जिससे दैवीय संपत्ति सहज ही सुलभ हो जाए। इसके उत्तर में भगवान दत्तात्रेय राजा की नीतिपूर्ण शासन व्यवस्था की प्रशंसा करते हुए काशी नगरी की महिमा का गान करते हैं। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि काशी की समता करने वाला इस भूमण्डल पर कोई दूसरा तीर्थ नहीं है और इसके सामने सैकड़ों-करोड़ों तीर्थ भी कुछ नहीं हैं। दत्तात्रेय जी रहस्योद्घाटन करते हैं कि अन्य तीर्थ तो केवल शरीर को कष्ट देने वाले मात्र हैं, जबकि काशी वह परम प्रिय नगरी है जहाँ साक्षात् भगवान विश्वनाथ सदा जाग्रत रहते हैंयहाँ तक कि यदि यहाँ कोई कीड़ा-मकोड़ा भी मरता है, तो वह इंद्रलोक का परित्याग कर सीधे शिवलोक को प्राप्त होता है। भगवान विष्णु के चरणों से उत्पन्न त्रिपथगा गंगा तीनों कालों में यहीं व्याप्त रहती हैं, इसलिए वे राजा को काशी में ही निश्चल होकर रहने का उपदेश देते हैं।
परंतु, जिज्ञासा की सीमा यहीं समाप्त नहीं होती और राजा धन्वन्तरि पुनः एक गहरा और गूढ़ प्रश्न पूछते हैं कि यद्यपि काशी के समान कोई दूसरा तीर्थ नहीं है, फिर भी क्या इस संसार में कोई ऐसा श्रेष्ठ या उससे भी अधिक महत्वपूर्ण स्थान है, जिसके केवल दर्शन मात्र से ही मनुष्य देह त्यागे बिना अक्षय स्वर्ग या दुर्लभ विष्णुलोक को प्राप्त कर सके और जहाँ से पुनरागमन न हो? राजा जानना चाहते हैं कि पूर्वकाल के राजाओं ने किस मार्ग से सदेह स्वर्ग प्राप्त किया था। राजा के इस अत्यंत कल्याणकारी प्रश्न को सुनकर दत्तात्रेय जी उत्तर देते हैं कि जो मुक्ति ऋषियों और देवताओं को भी कठिनाई से मिलती है, उसका एक महारहस्य हिमाचल पर्वत में छिपा है। वे बताते हैं कि हिम कणों से सिंचित, गिरजा के पिता और हिम से परिपूर्ण हिमाचल को बिना देखे भी, यदि कोई व्यक्ति दस हजार योजन की दूरी से केवल उसका स्मरण मात्र कर लेता है, तो उसे साक्षात् काशीवास के समान ही परम फल की प्राप्ति हो जाती है
इस बर्फीले और अलौकिक साम्राज्य के रहस्यों को और अधिक स्पष्ट करते हुए दत्तात्रेय जी कहते हैं कि दस हजार योजन की दूरी से भी यदि कोई प्राणी केवल हिम शब्द का उच्चारण करता है, तो वह अपने समस्त पापों से विमुक्त होकर विष्णु-स्वरूप हो जाता है। यहाँ तक कि मृत्युकाल उपस्थित होने पर, जब कंठ में प्राण अटक रहे हों, तब भी मनुष्य को हिम का ही स्मरण करना चाहिए। नारद आदि ऋषियों ने भी इसी हिमाचल के दर्शन, स्मरण और ध्यान से परम दुर्लभ विष्णुलोक को प्राप्त किया था। दत्तात्रेय जी कहते हैं कि देवताओं के सौ वर्षों में भी वे हिमाचल के पुण्यों का पूर्ण वर्णन करने में असमर्थ हैं। इसी पावन क्षेत्र में भगवान विष्णु के चरणों से निकली गंगा कमल-नाल के धागों की तरह चार भागों में विभक्त होती है। इस सम्पूर्ण भूमण्डल में हिमाचल जैसा कोई दूसरा स्थान नहीं है, क्योंकि इसके कण-कण में, जल-थल और गुफाओं में देवाधिदेव शंकर निवास करते हैं। विंध्य और मलय जैसे पर्वत भी इसकी समता नहीं कर सकते। इसी पावन पर्वतराज पर एक परम गोपनीय रहस्य मानस नामक सरोवर के रूप में प्रकाशित है, जहाँ भगवान शिव स्वयं राजहंस के रूप में साक्षात् विराजमान रहते हैं।
सृष्टि के इस सबसे पवित्र मानसरोवर की महिमा का अद्भुत चित्रण आगे मिलता है, जहाँ ब्रह्मा जी द्वारा अपने मन से निर्मित यह सरोवर तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ and पावन माना गया है। ध्रुव, नारद और मार्कण्डेय जैसे परम ज्ञानियों ने इस महातीर्थ की स्तुति करके विष्णुलोक प्राप्त किया, और वेणु के पुत्र राजा पृथु जैसे प्रतापी राजा यहाँ सदेह पहुंचे थेइस सरोवर का प्रभाव इतना चमत्कारी है कि इसकी मिट्टी या बालू का शरीर पर लेप करने मात्र से मनुष्य देवताओं के समान पूज्य हो जाता है। यहाँ स्नान करके शरीर त्यागने वाले परम ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं, और इसका केवल जल पीने मात्र से प्राणी शिवलोक के अधिकारी बन जाते हैं। दत्तात्रेय जी कहते हैं कि इस मानसरोवर के जल की एक बूंद का स्पर्श भी मनुष्य के सैकड़ों जन्मों के पापों को नष्ट कर देता है, और इसके जल कणों से सिंचित होकर स्नान करने वाले को साक्षात् गंगास्नान से भी बढ़कर फल मिलता है।
इस अलौकिक क्षेत्र के चमत्कारों की कथा में आगे बताया गया है कि मानसरोवर का जल किसी कीमती मोती की तरह चमकता है और उसकी बालू तांबे के समान चमकीली दिखाई देती है। सम्पूर्ण विष्णुलोक में इसके समान दूसरा कोई क्षेत्र नहीं है। यहीं पर परम पावन कैलाश पर्वत और मानसरोवर स्थित हैं, जहाँ सत्ययुग में अनेक राजा केवल स्मरण मात्र से सदेह ब्रह्मलोक चले गए थे। यहाँ भगवान शिव साक्षात् माता पार्वती और अपने गणों के साथ शयन करते हैं। केदारमार्ग से योगभ्रष्ट हुए योगी भी इसी उत्तर-पर्वत को प्राप्त कर शिवलिंग स्वरूप हो गए। हिमाचल के मूल भाग पर पैर पड़ने मात्र से मनुष्य के पाप वैसे ही विलीन हो जाते हैं जैसे सूर्योदय होने पर बर्फ पिघल जाती है। यहाँ तक कि पापी व्याध और शिकारी भी इस पर्वतराज के स्पर्श मात्र से परम पद को प्राप्त कर लेते हैं। इसका संपूर्ण महात्म्य कह पाने में स्वयं ब्रह्मा और देवराज इंद्र भी पूरी तरह असमर्थ हैं।
इस दिव्य वृत्तांत का समापन परम भव्यता के साथ होता है, जहाँ ब्रह्मा के मन से उत्पन्न इस मानसरोवर और कैलाश-हिमाचल की चोटियों का महत्व वर्णन करने में स्वयं भगवान शंकर, देवगुरु बृहस्पति और इंद्र भी असमर्थ हैं। इसी मानसरोवर की अगाध जलराशि से संसार की सर्वश्रेष्ठ नदियाँ निकलती हैं। राजा भगीरथ अपने रथ के पीछे-पीछे इसी पुण्य जलराशि को पृथ्वी पर लेकर आए थे। महर्षि वसिष्ठ द्वारा निर्दिष्ट मार्ग से परम कल्याणकारी सरयू नदी भी इसी मानसरोवर से प्रादुर्भूत हुई, जो अनेक प्रकार के पक्षियों और मछलियों से सुशोभित है। दत्तात्रेय जी अंत में बताते हैं कि इस परम पावन प्रदेश को ही मानस-खंड कहा जाता है, जिसके मध्य में साक्षात् हिमालय के पाँच भव्य शिखर दिखाई देते हैं जो विभिन्न खंडों के सुंदर विभाजक हैं। इस प्रकार स्कन्दपुराण के मानसखंड का यह आठवां अध्याय हमें काशी की महत्ता से लेकर कैलाश, हिमाचल और मानसरोवर के उन अलौकिक रहस्यों से परिचित कराता है, जो मनुष्य को सहज ही इस नश्वर संसार के बंधनों से मुक्त कर परम आनंद की ओर ले जाते हैं।

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