आज राखी?! जब सारा देश पर्व मनाकर भूल चुका, तब कुमाऊं में आज सजी राखी की थालियां: जानिए ब्रह्मसभा का वह अनसुलझा रहस्य

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आज राखी?! जब सारा देश पर्व मनाकर भूल चुका, तब कुमाऊं में आज सजी राखी की थालियां: जानिए ब्रह्मसभा का वह अनसुलझा रहस्य

जब पूरे देश में रक्षाबंधन की चहल-पहल खत्म हुए पखवाड़ा बीत चुका है और लोग सावन के त्योहारों को पीछे छोड़ चुके हैं, ठीक उसी वक्त कुमाऊं की धरती पर एक चौंकाने वाला दृश्य दिखाई देता है। घरों में मंगलगीत गूंज रहे हैं, बहनें थाल सजाए खड़ी हैं और भाइयों की कलाइयों पर रक्षासूत्र सज रहे हैं। राह चलता कोई भी अजनबी यह देखकर ठिठक जाता है कि—आखिर आज राखी क्यों?

उत्तराखंड के लालकुआं, अल्मोड़ा, नैनीताल और पिथौरागढ़ की घाटियों में बसे तिवारी, तिवाड़ी और त्रिपाठी समाज के लिए रक्षाबंधन का वास्तविक दिन सावन की पूर्णिमा नहीं, बल्कि आज यानी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की ‘हरितालिका तीज’ है। सदियों से चली आ रही इस रहस्यमयी परंपरा के पीछे सतयुग की एक ऐसी घटना है, जिसने काल और पंचांग की दिशा ही बदल दी थी।

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ब्रह्मसभा का विवाद और खोया हुआ नक्षत्र

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में जब सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने समस्त वैदिक ऋषियों को आमंत्रित कर उपाकर्म और रक्षा विधान के लिए ‘हस्त नक्षत्र’ का दुर्लभ मुहूर्त तय किया था, तब उस सभा में सामवेद के प्रधान ऋषि महर्षि गौतम को भी उपस्थित होना था।

उसी समय ब्रह्मांड में धर्म और न्याय से जुड़ा एक अत्यंत जटिल विवाद छिड़ गया। महर्षि गौतम उस विवाद को सुलझाने में इस कदर व्यस्त हो गए कि जब तक वे ब्रह्मलोक पहुंचे, तब तक यज्ञोपवीत धारण करने के लिए निर्धारित ‘हस्त नक्षत्र’ का समय समाप्त हो चुका था।

सामवेदी परंपरा का कठोर नियम था कि बिना अभीष्ट नक्षत्र के जनेऊ बदलना और रक्षासूत्र स्वीकार करना शास्त्रसम्मत नहीं होगा। महर्षि गौतम ने नियमों को तोड़ने के बजाय प्रतीक्षा का कठिन मार्ग चुना। कालचक्र घूमा और वही पावन ‘हस्त नक्षत्र’ भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया (हरितालिका) को पुनः उदित हुआ। महर्षि गौतम और उनके शिष्यों ने उसी दिन पूर्ण विधि-विधान से यज्ञोपवीत धारण किया और बहनों से रक्षासूत्र बंधवाया। वही अटूट परंपरा आज सहस्राब्दियों बाद भी इस अंचल में ज्यों की त्यों जीवंत है।

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पुराणों का अमर श्लोक: रक्षा का वैदिक संकल्प

भविष्य पुराण और महाभारत में वर्णित रक्षासूत्र का मूल मंत्र इस दिन की आध्यात्मिक गंभीरता को प्रकट करता है:

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

भावार्थ: जिस पवित्र रक्षासूत्र से अत्यंत बलशाली और पराक्रमी दानवराज बलि को धर्म की मर्यादा में बांधा गया था, उसी मंगलकारी सूत्र से मैं तुम्हें बांधती हूँ। हे रक्षासूत्र! तुम अपने संकल्प से कभी विचलित न होना और सदा इसकी रक्षा करना।

हरितालिका के दिन ऐसे सजता है उत्सव

इस पावन तिथि पर कुमाऊं में परंपरा का निर्वहन चार प्रमुख चरणों में पूरा होता है:

  • पवित्र त्रिविध तर्पण: ब्रह्ममुहूर्त में सामवेदी ब्राह्मण नदियों, नौलों और पवित्र सरोवरों पर एकत्रित होते हैं। पंचगव्य स्नान के बाद वे कुश और जल से देव तर्पण, ऋषि तर्पण और पितृ तर्पण संपन्न कर अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं।
  • सामवेदी ऋचाओं के साथ जनेऊ परिवर्तन: वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पुराना यज्ञोपवीत विसर्जित कर नया त्रिगुण युक्त जनेऊ धारण किया जाता है।
  • बहनों का रक्षा-विधान: उपाकर्म संपन्न कर जब भाई घर लौटते हैं, तब बहनें रोली, अक्षत और दीप से उनकी आरती उतारती हैं और उनकी दीर्घायु व यश की कामना करते हुए कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं।
  • मातृशक्ति का निर्जला तप: परिवार की सुहागिन महिलाएं और कन्याएं अखंड सौभाग्य और समृद्धि के लिए 24 घंटे का कठोर निर्जला व्रत रखती हैं। शुद्ध मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाएं बनाकर रात्रि जागरण और षोडशोपचार पूजन किया जाता है।
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जब बाकी दुनिया अपने नित्य कामों में व्यस्त होती है, तब कुमाऊं का यह अंचल अपने वैदिक संकल्प और ऋषि-परंपरा की मर्यादा को निभाते हुए आज के दिन को सच्चे अर्थों में ‘रक्षा पर्व’ बनाकर मनाता है।

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