गंगोलीहाट के पोखरी गाँव की माटी का वह संवेदन-दीप, जो नैनीताल की वादियों को अश्रुपूरित कर अनंत में विलीन हो गया
कुछ लोग इस संसार में सिर्फ एक पद या दायित्व निभाने नहीं आते, बल्कि वे व्यवस्था और इंसानी जज्बातों के बीच ऐसा आत्मीय सेतु बन जाते हैं, जिसकी मिसाल सदियों में कभी-कभार ही देखने को मिलती है। आज जब नैनीताल के वर्तमान जिला सूचना अधिकारी के असमय गोलोकगमन का समाचार मिला, तो ऐसा लगा जैसे पत्रकारिता और जनसेवा के पूरे फलक से आत्मीयता की एक मजबूत छत ही अचानक ढह गई हो। नैनीताल की गहरी-शांत झील से लेकर गंगोलीहाट के पोखरी गाँव तक, हवा में सिर्फ एक सन्नाटा और हर आँख में छलछलाते आंसू हैं।
पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट अंतर्गत पोखरी गाँव की पावन माटी से जिस संस्कार, सरलता और निश्छल मुस्कान की थाती लेकर वे चले थे, वह जीवन के अंतिम क्षण तक उनके व्यक्तित्व का गहना बनी रही। शासकीय सेवा में ओहदे अक्सर इंसान के इर्द-गिर्द दंभ का एक कठोर दायरा खींच देते हैं, मगर उनके सामने आकर हर औपचारिकता मानो अपना अर्थ खो देती थी। चाहे सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में सूचना तंत्र का कुशल संचालन रहा हो, सीमांत जनपद चंपावत में जन-जन व मीडिया के बीच निष्पक्ष संवाद का निर्माण हो, या फिर नैनीताल जैसे महत्वपूर्ण जनपद में जिला सूचना अधिकारी का गंभीर उत्तरदायित्व—उन्होंने हर तैनाती स्थल को सिर्फ दफ्तर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का मंदिर बना दिया था।
दफ्तर का कोई छोटा कर्मचारी हो या दूरदराज से आया कोई साधारण ग्रामीण, वे अफसर की तरह नहीं, बल्कि एक सच्चे अभिभावक और सहृदय मित्र की तरह पेश आते थे। पत्रकारिता जगत के संघर्षशील साथियों के लिए तो उनका कक्ष हमेशा एक सुरक्षित आशियाना था, जहाँ केवल शासकीय विज्ञप्तियां नहीं बांटी जाती थीं, बल्कि हर सुख-दुख को अपना मानकर साझा किया जाता था। किसी की परेशानी देखकर वे कागजी प्रक्रियाओं के फेर में उलझने के बजाय खुद आगे बढ़कर सहारा बनते थे, और वह भी इतनी खामोशी से कि किसी को अहसास तक न हो।
नियति का यह कैसा निष्ठुर प्रहार है कि जो इंसान ताउम्र दूसरों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरता रहा, वह जाते-जाते अपने पीछे आंसुओं का समंदर छोड़ गया। ममतामयी वृद्ध माँ, जीवनसंगिनी, पिता की छांव तलाशते दो मासूम बच्चे और भाई-बहनों से भरा-पूरा हंसता-खेलता परिवार आज रोता-बिलखता उस असहनीय शून्य में खड़ा है, जिसे संसार का कोई ढांढस नहीं भर सकता। जिस आंगन में उनकी सौम्य वाणी और अपनत्व की गूंज थी, वहाँ आज सिर्फ सिसकियों का चीत्कार है।
शोक की इस घड़ी में उनके गृहक्षेत्र से जुड़े आत्मीय जन भी सुध-बुध खो बैठे हैं। नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इण्डिया) के राष्ट्रीय सचिव कैलाश जोशी जब उनके असमय जाने की बात कर रहे थे, तो उनका कंठ पूरी तरह रुंध गया। आँखें लगातार छलछला रही थीं और होठों में एक असहज कंपन था। शब्दों को जुटाना उनके लिए नामुमकिन सा हो रहा था, क्योंकि यह बिछोह सिर्फ एक कर्मठ अधिकारी का नहीं, बल्कि पीढ़ियों से जुड़े पारिवारिक रिश्ते और अभिन्न मित्र का था। पास-पास के मूल गाँवों का वह पुराना नाता, बचपन से लेकर आज तक की अनगिनत सांझी यादें जब एक पल में इतिहास बन गईं, तो कैलाश जोशी की छलछलाई आँखों ने हर किसी के कलेजे को चीर कर रख दिया।
कर्तव्य की राह पर चलते हुए उनकी यह अचानक विदाई मन को भीतर तक झकझोर गई है। कुर्सियां और पद तो समय के साथ बदलते रहेंगे, मगर चंपावत, अल्मोड़ा से लेकर नैनीताल की वादियों तक उन्होंने इंसानियत, अपनत्व और शुचिता की जो पावन लकीर खींची है, वह हमारे दिलों में हमेशा जीवित रहेगी। पोखरी गाँव का यह पुण्यात्मा लाल आज भले ही अनंत यात्रा पर निकल गया हो, मगर उनकी सौम्य मुस्कान और आत्मीयता हर संवेदनशील हृदय में सदा महकती रहेगी।
दिवंगत जिला सूचना अधिकारी की शव यात्रा कल रविवार की प्रातः 8 बजे उनके हल्द्वानी स्थित आवास से निकाली जाएगी तथा चित्राशिला घाट में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
ईश्वर पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में परम शांति प्रदान करें और शोकाकुल परिवार को यह अपार वज्रपात सहने का संबल दें।
— रमाकान्त पन्त
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