माता पार्वती के तप की गाथा है हरतालिका तीज

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अंजनी सक्सेना – विभूति फीचर्स)

_भाद्रपदे शुक्लपक्षे तृतीयायां हस्तसंयुता।_
_हरतालिका व्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम्॥_
_सौभाग्यं संततिं देहि सर्वकामांश्च देहि मे।_

भविष्य पुराण के इस श्लोक के साथ ही हरतालिका तीज के महात्म्य का आरंभ होता है। अर्थात भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया जब हस्त नक्षत्र से युक्त होती है, तब हरतालिका नामक व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला और सौभाग्य तथा संतान प्रदान करने वाला होता है।
वर्षा ऋतु की सोंधी सुगंध, भादों के घुमड़ते मेघ और धरती पर बिछी हरियाली के बीच जब प्रकृति स्वयं सोलह श्रृंगार करती है, तब आता है नारी के तप और प्रेम का यह अनुपम पर्व। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला यह व्रत अविवाहित युवतियों के लिए मनोनुकूल पति की कामना का और सुहागिनों के लिए अपने सुहाग को अजर-अमर बनाए रखने का संकल्प है। धर्मशास्त्रों में षोडश मातृकाओं में सर्वोच्च स्थान गौरी को दिया गया है, और हरतालिका के दिन उसी गौरी स्वरूपा पार्वती की पूजा होती है।
इस व्रत की प्रामाणिकता भविष्य पुराण, शिव पुराण और स्कंद पुराण तीनों में मिलती है। भविष्य पुराण में भगवान शिव स्वयं माता पार्वती को इस व्रत का रहस्य बताते हैं। कथा है कि माता पार्वती ने सौ वर्षों तक कठोर तप करके शिव को प्राप्त किया था। उन्होंने शिव से वर मांगा था कि भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मैंने जिस कठिन व्रत से आपको प्राप्त किया है, वही व्रत पृथ्वी पर स्त्रियों के लिए अखण्ड सौभाग्यदायक हो। तब शिव ने तथास्तु कहा। शिव पुराण के रुद्र संहिता के पार्वती खण्ड में इसका अत्यंत मार्मिक वर्णन है। शिव पार्वती को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराते हुए कहते हैं कि सती रूप में देह त्याग के बाद जब तुमने हिमालय राज के घर में जन्म लिया, तब तुम मन ही मन मुझे पति मान चुकी थीं। तुम्हारी तपस्या देखकर तुम्हारे पिता चिंतित थे। तभी नारद जी ने आकर तुम्हारे पिता से तुम्हारा विवाह विष्णु से करने का प्रस्ताव रखा। तुम्हारे पिता सहमत हो गए। जब यह समाचार तुम्हें मिला तो तुम अत्यंत दुखी हुईं। तुम्हारी यह दशा देखकर तुम्हारी दो सखियां जया और विजया तुम्हें राजमहल से हर कर घने वन में एक गुफा में ले गईं। वहीं तुमने बालू के शिवलिंग की स्थापना करके घोर तपस्या आरंभ की। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में तुमने दिन-रात निराहार, निर्जल रहकर मेरी आराधना की और रात्रि जागरण किया। तुम्हारी इस निष्ठा से प्रसन्न होकर मैं प्रकट हुआ और तुम्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। स्कंद पुराण के केदार खण्ड में इसी व्रत को गौरी तृतीया कहा गया है। स्कंद पुराण कहता है कि जो स्त्री श्रद्धापूर्वक यह व्रत करती है, उसे सात जन्मों तक वैधव्य का दुख नहीं होता, वह सौभाग्यवती होकर पुत्र-पौत्रों के सुख को भोगती है।
हरतालिका शब्द की उत्पत्ति भी इसी कथा से हुई है। हरत का अर्थ है हरण करना और आलिका का अर्थ है सखी। सखियों द्वारा हरी गई होने के कारण ही यह हरतालिका कहलाई।
इस व्रत की पूजन विधि अत्यंत कठिन मानी गई है। व्रत करने वाली स्त्रियां ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर संकल्प लेती हैं कि वे अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए यह व्रत करेंगी। पूरे दिन वे निर्जल और निराहार रहती हैं। यह इस व्रत की सबसे बड़ी परीक्षा है। संध्या समय गोधूलि बेला में मिट्टी या बालू से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा बनाई जाती है। माता पार्वती को सुहाग का सारा श्रृंगार अर्पित किया जाता है, लाल जरी गोटे वाली साड़ी, चूड़ी, बिछिया, कंगन, सिंदूर, रोली, बिंदी, कंघी और काजल। भगवान शिव को पीला उत्तरीय, भस्म, बेलपत्र, धतूरा और आक के फूल चढ़ाए जाते हैं। बेल, धतूरा, तुलसी और आक के पत्तों के बिना यह पूजा अधूरी मानी जाती है। व्रती स्त्रियां स्वयं सोलह श्रृंगार करके शिव-पार्वती की पूजा करती हैं, कथा सुनती हैं और सारी रात भजन-कीर्तन के साथ जागरण करती हैं। अगले दिन सूर्योदय से पूर्व शिव-पार्वती की प्रतिमा को किसी पवित्र नदी, तालाब या कुंड में विसर्जित किया जाता है और ब्राह्मण को सुहाग सामग्री और दक्षिणा दान देकर व्रत का पारण किया जाता है।
यह व्रत केवल भूख-प्यास सहने का नाम नहीं है। यह प्रेम की साधना है। आज के समय में जब संबंध क्षणभंगुर होते जा रहे हैं, जब धैर्य और प्रतीक्षा शब्द पुराने लगने लगे हैं, तब हरतालिका तीज हमें याद दिलाती है कि सच्चा प्रेम तप मांगता है। पार्वती ने सती रूप में देह त्यागने के बाद भी हार नहीं मानी। उन्होंने प्रतीक्षा की, तप किया और अंततः अपने प्रेम को प्राप्त किया। यह कथा हर नारी को यह सिखाती है कि संकल्प में कितनी शक्ति होती है।
भारतीय संस्कृति में नारी को केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि संस्कृति की वाहक माना गया है। गणगौर, वट सावित्री अमावस्या, करवाचौथ और हरतालिका तीज जैसे व्रत इसी का प्रमाण हैं। ये व्रत तन से नहीं, मन से किए जाते हैं। यह व्रत उस आस्था का प्रतीक है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी माताओं से हम तक आती है और हमें यह विश्वास दिलाती है कि प्रेम, निष्ठा और समर्पण से बड़ी कोई शक्ति नहीं है। हरतालिका तीज आस्था की वह अजस्र धारा है जो हर युग में नारी को पार्वती बनने की प्रेरणा देती रहेगी। *(विभूति फीचर्स)*

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