आखिर जाएं तो जाएं कहां गजराज? पेट की आग बुझाने को आबादी की ओर बढ़ते हाथी जंगल सिकुड़े,

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हल्दूचौड़/लालकुआं। पहाड़ और तराई का संतुलन बिगड़ चुका है। कभी जंगलों के स्वामी रहे हाथियों का आज गांवों और बस्तियों में धावा बोल देना किसी संयोग का नहीं, बल्कि मनुष्य की लालच, अवैध कटान और प्रशासनिक उदासीनता का दर्दनाक परिणाम है।
सवाल अब यह नहीं कि हाथी क्यों आ रहे हैं? असली सवाल यह है—
अब जाएं तो जाएं आखिर कहां गजराज?

पेट की आग और सिकुड़ते वन

हाथी कोई मनमौजी प्राणी नहीं। उसकी दिनचर्या, मार्ग और जीवनशैली सदियों से स्थिर रही है। परंतु अब जंगलों में न भोजन बचा है, न जल स्रोतों की स्थिति।
एक वयस्क हाथी को प्रतिदिन लगभग 200 किलो भोजन चाहिए, परंतु जंगलों में तेजी से हो रही अवैध कटान और वन क्षेत्रों के सिकुड़ने ने उसकी जीवनशैली की नींव ही हिला दी है। भूखे पशु आखिर कहां जाएं?

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अवैध कटान और वन माफिया जिम्मेदार

ग्रामीणों और वन्यजीव विशेषज्ञों का आरोप है कि वनों का हाल सिर्फ प्रकृति के कारण नहीं बल्कि मानव के लालच के कारण बदला है। लकड़ी माफियाओं ने वर्षों से जंगलों को खोखला किया है।
पेड़ कटते रहे और कागजों में संरक्षण की रिपोर्टें मोटी होती रहीं।
वन विभाग चाहे कुछ भी कहे, लेकिन हकीकत यह है कि जंगल सिकुड़ते गए और हाथी मजबूर होते गए।

 

वन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल

लोगों का यह भी आरोप है कि हाथियों की समस्या बढ़ने के बावजूद वन विभाग कागजी योजनाओं से आगे बढ़ नहीं पाया है।

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कई वर्षों से जंगलों में घासारोपण, तलाब निर्माण और हाथी कॉरिडोर विकास जैसे कार्यों का बजट आया, परंतु जमीन पर उसका सन्तोष जनक परिणाम नजर नहीं आता।

पारंपरिक मार्ग बाधित हाथी भटके

हाथियों के प्राकृतिक मार्गों पर अब

आवासीय कॉलोनियां उद्योग
सड़कें और रेल लाइनें
खनन क्षेत्र बन चुके हैं।
जब रास्ते ही छीन लिए जाएं तो हाथी गांवों के खेतों में प्रवेश न करें तो कहां जाएं?

ग्रामीण डरे किसान परेशान

जहां वन विभाग की बैठकें चल रही हैं, वहीं ग्रामीण रातों को जागकर खेतों की रखवाली कर रहे हैं।
रात होते ही दहशत फैलती है—क्योंकि किसी भी समय हाथी दल खेतों में फसल रौंद सकते हैं।

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किसानों का दर्द साफ है— क्षेत्र के किसान व वरिष्ठ समाज सेवी दया कृष्ण जोशी मानते है

 “हाथियों की गलती नहीं, हालात की गलती है।
अगर जंगल बचते और पानी-भोजन मिलता, तो वे कभी गांवों की ओर न आते।”

अब जरूरी है — समाधान, बहाना नहीं अवैध कटान पर सख्त कार्रवाई हो
जंगलों में पानी स्रोत और भोजन प्रबंधन मजबूत हो
किसानों को उचित मुआवजा और सुरक्षा व्यवस्था मिले

हाथी हमारे जंगलों की शान हैं, समस्या नहीं। समस्या है लालच, व्यवस्था की कमजोरी और प्रशासनिक लापरवाही।
यदि समय रहते हालात नहीं सुधरे तो मानव और वन्यजीवों के बीच यह संघर्ष और भयावह रूप ले सकता है।

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