सात दिनों का चक्रव्यूह और काल का रहस्य: भागवत जीना नहीं, गरिमा के साथ मरना सिखाती है

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सात दिनों का चक्रव्यूह और काल का रहस्य: भागवत जीना नहीं, गरिमा के साथ मरना सिखाती है
उदय बाखली में कथा से पूर्व शैल शक्ति से विशेष बातचीत में व्यास मनोज कृष्ण जोशी का रहस्योद्घाटन
शैल शक्ति ब्यूरो
बेरीपड़ाव।
बेरीपड़ाव के उदय बाखली में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन की कथा से पूर्व कथाव्यास पण्डित मनोज कृष्ण जोशी ने एक विचारोत्तेजक और गहरा दार्शनिक रहस्योद्घाटन किया है। शैल शक्ति से विशेष वार्ता के दौरान उन्होंने कहा कि संसार का हर दर्शन और आधुनिक विचार मनुष्य को जीने की कला सिखाता है, लेकिन भागवत मनुष्य को भयमुक्त होकर भव्यता के साथ मरना सिखाती है। जिसे मरना आ गया, वास्तव में उसी को जीना आ गया।
व्यास मनोज कृष्ण जोशी ने इस गूढ़ मर्म को उजागर करते हुए कहा कि भागवत का श्रोता कोई सांसारिक सुख भोगने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि चक्रवर्ती सम्राट परीक्षित थे, जिनके सिर पर तक्षक नाग के डसने के कारण केवल सात दिनों का जीवन शेष था। जिस मनुष्य के पास केवल सात दिन बचे हों, उसे धन जोड़ना, मकान बनाना या राजनीति करना नहीं सिखाया जाता, बल्कि देह और मोह की बेड़ियों को काटकर परमात्मा में लीन होना सिखाया जाता है। यह दिव्य कथा मनुष्य को यह बोध कराती है कि वह नश्वर शरीर नहीं, बल्कि अविनाशी आत्मा है।
शैल शक्ति से चर्चा में उन्होंने स्पष्ट किया कि संसार में कोई भी मनुष्य वास्तव में मृत्यु से नहीं डरता, बल्कि वह अपनी आसक्तियों के छूट जाने से डरता है। शुकदेव मुनि ने परीक्षित को कोई जादू करके विष से बचाने की प्रार्थना नहीं की, बल्कि उनके भीतर के मोह को काटा। यही कारण रहा कि जब अंत समय आया तो परीक्षित डरे नहीं, बल्कि प्रभु के ध्यान में लीन होकर मुक्त हो गए। भागवत मृत्यु को भयावह अंत नहीं, बल्कि परमात्मा से मिलन का उत्सव बना देती है।
उन्होंने इस दर्शन को आम जीवन से जोड़ते हुए कहा कि यह सात दिन केवल परीक्षित के नहीं, बल्कि समूची मानव जाति के हैं। सोमवार से रविवार के इन्हीं सात दिनों के चक्रव्यूह में हर सांस बंधी है और किसी न किसी सातवें दिन ही हर व्यक्ति की सांसें थमती हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को संसार में इस तरह व्यवहार करना चाहिए जैसे वह किसी होटल के कमरे में ठहरा हो, जहां वह सुविधाओं का उपयोग तो करता है लेकिन यह कभी नहीं भूलता कि एक दिन यह कमरा खाली करना है। मरना सीखने का सीधा अर्थ अहंकार को मिटाना और आत्मा को जगाना है। जब जीवन में हरि का नाम बस जाता है, तो अंत का भय अपने आप समाप्त हो जाता है।

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