दीपावली की रहस्यमयी महानिशा और गंगोलीहाट का आदि-रहस्य: देवदार के घने कुहासे में गूंजता महाकाली का वह अमर शंखनाद!

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उत्तराखंड के जनपद पिथौरागढ़ की उपत्यकाओं में बसा गंगोलीहाट केवल देवभूमि का एक मनोरम अंचल नहीं, बल्कि परात्पर चेतना और प्रकृति के सम्मोहन का एक जाग्रत रहस्य लोक है। यहाँ आकाश को छूते प्राचीन देवदार के वृक्ष जब घने कुहासे की चादर ओढ़कर खड़े होते हैं, तो ऐसा आभास होता है मानो युगों-युगों से खड़े ये मूक तपस्वी किसी अदृश्य महाशक्ति की प्रतीक्षा में मौन साधना कर रहे हों। सर्द हवा के झोंकों में जब देवदार की शाखाएं सन्नाटे को चीरती हुई सरसराती हैं, तो रोंगटे खड़े कर देने वाली एक दिव्य सिहरन अंतर्मन को छू जाती है।

कार्तिक मास की अमावस्या—यानी दीपावली की वह पावन महानिशा—जब संपूर्ण संसार केवल प्रकाशोत्सव में लीन होता है, तब गंगोलीहाट के इन सघन वनों में एक अलग ही रहस्यमयी स्पंदन जन्म लेता है। यहाँ जलने वाला प्रत्येक दीप केवल मिट्टी का दीया नहीं, अपितु उस आदि-शक्ति ‘कालनाशिनी’ के सम्मुख जलता हुआ एक अमर विश्वास है, जिसने कभी देवताओं के अंधकारमय भाग्य को प्रकाश की नई दिशा दी थी। सीमांत कुमाऊं के गाँव-गाँव से ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने से साधक, सैनिक और श्रद्धालु अपनी श्रद्धा की पोटली बांधे इस निस्तब्ध वनखंड में हाट कालिका के चरणों में खिंचे चले आते हैं।

किंतु मन में यह कौतूहल बरबस उठता है कि जिस महाशक्ति का निवास कैलाश के धवल शिखरों और विंध्याचल की कंदराओं में था, वह अचानक विंध्य और हिमालय को छोड़कर पिथौरागढ़ के इस शांत शैल-अंचल में क्यों अंतर्धान हो गईं? इस गूढ़ रहस्य की अमर कथा स्कन्दपुराण के मानसखण्ड (अध्याय ९७) के पृष्ठों में जीवंत हो उठती है।

१. ऋषियों की व्याकुलता और वह अनुत्तरित प्रश्न

नैमिषारण्य के तपोवन में जब महर्षि वेदव्यास जी ने यह रहस्य खोला कि आदि-पराशक्ति महाकाली कुमाऊं के ‘शैल पर्वत’ पर जाग्रत रूप में विराजमान हैं, तो शौनक आदि ऋषियों की सांसें थम गईं। उन्होंने विस्मय से हाथ जोड़कर पूछा:

शैलोद्देशे महाकालीं विन्ध्यं च तुहिनं तथा। सन्त्यज्य मुनिशार्दूल! न्यवसत् केन हेतुना॥ (स्कन्दपुराण, ९७.१४)

भावार्थ: हे मुनिश्रेष्ठ! उस जगन्माता महाकाली ने हिमवान पर्वत (हिमालय) तथा विंध्याचल जैसे दिव्य स्थानों का परित्याग कर इस ‘शैल प्रदेश’ को अपना स्थायी निवास किस गूढ़ कारण से बनाया?

व्यास जी ने रहस्य की परतें खोलते हुए बताया कि यह कथा उस कालखंड की है, जब स्वर्ग पर दानवों का एकछत्र क्रूर राज हो चुका था।

२. देवलोक का संहार और देवताओं का गुप्त क्रंदन

दैत्यराज शुम्भ और निशुम्भ के भीषण अत्याचारों से तीनों लोक कांप उठे थे। स्वर्ग छिन चुका था, इंद्र का सिंहासन धूल-धूसरित था और पराजित देवगण अपने प्राण बचाने के लिए ब्रह्मांड के सबसे एकांत और दुर्गम वनखंड—इसी शैल पर्वत की घाटियों में आ छिपे। भय से थर-थर कांपते हुए देवताओं ने उस महाशक्ति का स्मरण किया, जिनकी कृपा से ब्रह्मांड की धुरी टिकी हुई है:

देव्या यया त्रिभुवनं सचराचरं च व्याप्तं बिभर्षि भुवनं च धराधरं च। शेषः फणाशतशतैरपि नम्रभूतो सा वै धराधरसुतावतु देवपालम्॥ (स्कन्दपुराण, ९७.१६)

भावार्थ: जिस जगदम्बा ने संपूर्ण चराचर ब्रह्मांड को अपने विस्तार में समेट रखा है और जो पर्वतों सहित पूरी पृथ्वी को धारण करती हैं; जिनके महाविराट तेज के आगे सैकड़ों फणों वाले शेषनाग भी नतमस्तक हो जाते हैं, वही पर्वतराज सुता हम असहाय देवों की रक्षा करें!

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देवताओं ने विलाप करते हुए पुकारा कि हे माँ! जैसे आपने विष्णु की योगनिद्रा बनकर मधु-कैटभ का संहार करवाया और जैसे महिषासुर का मर्दन किया, वैसे ही अब इस गहन अरण्य में हमारी रक्षा करो।

३. जाह्नवी जलप्रपात और अलौकिक अवतरण

देवताओं का करुण रुदन जब देवदार के वृक्षों से टकराया, तब गंगोलीहाट मंदिर के समीप स्थित पावन ‘जाह्नवी’ जलप्रपात के कल-कल बहते जल में एक अलौकिक हलचल हुई। झरने की शीतल फुहारों के बीच एकाएक सूर्य से भी सहस्र गुना दिव्य तेज प्रस्फुटित हुआ और जलधारा से साक्षात दुर्गतिनाशिनी प्रकट हो गईं:

इति संस्तुवतां तत्र देवानां परमेश्वरी। आविर्बभूव पुरतः संस्नात्वा जाह्नवीजले॥ उवाच सा महाभागा दुर्गा दुर्गतिनाशिनी॥ (स्कन्दपुराण, ९७.२२-२३)

भावार्थ: देवताओं द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर, परमेश्वरी भगवती दुर्गा उस पावन ‘जाह्नवी’ तीर्थ के जल में स्नान कर प्रत्यक्ष प्रकट हुईं और उन दुर्गतिनाशिनी महादेवी ने देवताओं से उनका संताप पूछा।

देवराज इंद्र ने कांपते हाथों से प्रणाम कर कहा, “हे माँ! दानवों ने हमें स्वर्ग से निष्कासित कर दिया है, अब आपके अतिरिक्त इस चराचर में हमारा कोई त्राता नहीं है।”

४. देवदार के वनों में महाकालिका का भीषण संकल्प

इंद्र के आर्तनाद को सुनकर भगवती के नयनों में प्रलयंकारी अग्नि धधक उठी। उन्होंने देवदार के सन्नाटे को चीरते हुए वह महाप्रतिज्ञा ली, जिसने पाताल तक दैत्यों के सिंहासन को हिलाकर रख दिया:

हनिष्यामि दुराचारं सह मित्रं सबान्धवम्। शुम्भं चैव निशुम्भं च चण्डमुण्डावुभावपि॥ तावत् तत्र वसिष्यामि यावत् तं दितिजाधमम्। हनिष्यामि दुराचारं शैलोद्देशे न संशयः॥ (स्कन्दपुराण, ९७.३०-३१)

भावार्थ: मैं शुम्भ, निशुम्भ, चण्ड और मुण्ड का उनके समस्त मित्रों और बांधवों सहित समूल नाश करूंगी। और जब तक मैं उन अधम दैत्यों का अंत नहीं कर देती, तब तक मैं इसी ‘शैल पर्वत’ के अंचल में निवास करूंगी, इसमें रंचमात्र भी संशय नहीं है।

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५. ‘मसीवर्ण’ का रहस्य: जब प्रकृति काली स्याही में बदल गई

वह प्रतिज्ञा केवल वाणी नहीं थी, ब्रह्मांड का कायापलट थी। देवताओं के कार्य की सिद्धि हेतु भगवती का मुखमंडल भयानक क्रोध से भर गया और उनका रूप घोर कृष्णवर्ण—काली स्याही (मसी) के समान गहरा हो गया:

इत्युक्त्वा मुनिशार्दूला दुर्गा दुर्गतिनाशिनी। कोपेनातिगरिष्ठेन मसीवर्णमभूत्ततः॥ देवानां कार्यसिद्धयर्थमाविर्भूता महेश्वरी। निवासं चकमे तत्र शैलोद्देशे सुशोभने॥ (स्कन्दपुराण, ९७.३२-३३)

भावार्थ: हे मुनिश्रेष्ठों! ऐसा कहकर दुर्गतिनाशिनी दुर्गा अत्यधिक भीषण कोप के कारण मसीवर्ण (स्याही के समान गहन काली) हो गईं। देवताओं के कार्य की सिद्धि हेतु आविर्भूत होकर उन महेश्वरी ने इसी अति-सुंदर ‘शैल प्रदेश’ को अपना स्थायी निवास चुन लिया।

यहीं से वे ‘कालिका’ कहलाईं। उन्होंने कौशिकी का रूप धरकर चण्ड और मुण्ड का शीश काट दिया और खप्पर में रक्तबीज की एक-एक रक्त-बूंद को समाहित कर लिया।

६. संहारक रौद्र रूप और मातृत्व का अमर संगम

शैल पर्वत के शिखर पर जब महाकाली ने अस्त्र उठाए, तो उनका रूप देखकर काल भी कांप उठा था। उनके हाथों में त्रिशूल, पट्टिश, पाश, मुद्गर और तीक्ष्ण बरछी चमक रही थी:

शैलोद्देशे महापुण्या कालिका कालनाशिनी। घोररूपा विशालाक्षी भक्तानां परिरक्षिणी॥ (स्कन्दपुराण, ९७.५-६)

भावार्थ: इस शैल प्रदेश पर वास करने वाली महापुण्यमयी कालिका साक्षात काल का भी संहार करने वाली हैं। वे अत्यंत घोररूपा और विशालाक्षी (विशाल नेत्रों वाली) हैं, किंतु अपने अनन्य भक्तों के लिए वे सदा वात्सल्यमयी परिरक्षिका (रक्षा करने वाली) हैं।

पुराण कहता है कि कुटिल, दंभी और पापी नेत्र कभी इस महापीठ में देवी के सत्य स्वरूप को नहीं देख पाते; केवल धर्मनिष्ठ और निष्कपट हृदय ही इस सघन वन में उनके वरदहस्त की अनुभूति कर पाते हैं।

७. समस्त तीर्थों से श्रेष्ठ: शैल पर्वत का अनुप्रमाण

व्यास जी ऋषियों से कहते हैं कि संसार के अन्य तीर्थों की गाथाएं केवल तब तक कही जाती हैं, जब तक कि इस शैल पर्वत की महिमा का रहस्य न खुला हो:

दुर्गतैस्तरणोपायं नास्त्यन्यन्मुनिसत्तमाः। सन्त्यज्य कालिकां देवीं शैलवासां हरप्रियाम्॥ तावत् क्षेत्राणि सर्वाणि देव्याश्चान्यानि वै द्विजाः। कथितानि पुराणादौ यावच्छैलं न वर्णितम्॥ (स्कन्दपुराण, ९७.३६-३७)

भावार्थ: हे मुनिश्रेष्ठों! घोर संकट और दुर्गति से पार पाने का इस संसार में शैल-शिखर पर निवास करने वाली शिवप्रिया कालिका के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है। पुराणों में अन्य तीर्थ-क्षेत्रों की महिमा केवल तभी तक कही गई है, जब तक कि इस शैल पर्वत का वर्णन न किया गया हो।

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८. भय, ग्रह-दोष और कलिकल्मष का समूल नाश

जो भी मनुष्य सांसारिक व्याधियों, नजर-दोष अथवा अनिष्ट ग्रहों के कोप से पीड़ित होता है, उसके लिए गंगोलीहाट का यह महाकाली धाम साक्षात संजीवनी है:

स्मृत्वापि कालीं कलिकल्मषघ्नीं बालग्रहा ये ग्रहनायकाश्च। द्रवन्ति रक्षांसि भयप्रदानि सिद्धिं ह्यभीष्टां मनुजाः प्रयान्ति॥ (स्कन्दपुराण, ९७.१०)

भावार्थ: कलिकाल के समस्त पापों को हरने वाली महाकाली का केवल मन में स्मरण कर लेने मात्र से ही बाल-ग्रह, क्रूर ग्रह-नायक और भय उत्पन्न करने वाले समस्त राक्षस-पिशाच दूर भाग जाते हैं तथा मनुष्यों को उनकी अभीष्ट सिद्धियाँ अनायास प्राप्त हो जाती हैं।

९. दीपावली की रात्रि, कालिका-तोय और दारिद्र्य-मुक्ति का वरदान

गंगोलीहाट के इस शैल पर्वत की बाईं दिशा से जो पावन ‘कालिका धारा’ प्रवाहित होती है, उसके जल से देवी का अभिषेक करने वाला जीव शिवलोक का अधिकारी बन जाता है। विशेषकर दीपावली की महानिशा में जो साधक तांत्रिक अथवा वैदिक (आगमोक्त) विधि से गंध, अक्षत, पुष्प और धूप-दीप से माँ की अर्चना करते हैं, उनके जीवन की दरिद्रता सदा के लिए भस्म हो जाती है:

बलि-पूजोपहारेण गन्धपुष्पाक्षतैः शुभैः। आगमोक्तविधानेन कालिकां ये समाहिताः॥ पूजयन्ति महादेवीं पूजितां देवनायकैः। दुर्गतिं ते न पश्यन्ति तथा दारिद्र्यजं भयम्॥ (स्कन्दपुराण, ९७.३९-४०)

भावार्थ: जो व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर उत्तम गंध, पुष्प, अक्षत तथा आगम-शास्त्रों में वर्णित विधि के अनुसार देवों द्वारा पूजित महादेवी कालिका का अर्चन करते हैं, वे जीवन में कभी दुर्गति के दर्शन नहीं करते और न ही उन्हें कभी दरिद्रता, रोग या शत्रुओं का कोई भय सताता है।

आज भी जब दीपावली की गहन अंधियारी रात में पिथौरागढ़ की बर्फीली हवाएं गंगोलीहाट के देवदार कुंजों से टकराती हैं, तो घंटियों की तीव्र टंकार और शंखध्वनि के बीच ऐसा लगता है मानो समय ठहर गया हो। सदियों पहले देवों की रक्षा के लिए लिया गया वह दिव्य संकल्प आज भी इस वनखंड की हवाओं में स्पंदित है। घने अंधकार के बीच मंदिर के गर्भगृह में जलती अखंड ज्योत इस शाश्वत सत्य का उद्घोष करती है कि जब-जब संसार में अधर्म का कुहासा छाएगा, तब-तब शैल-शिखर की यह महाकाली अपने भक्तों की ढाल बनकर खड़ी रहेगी।

@ रमाकान्त पन्त

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