छात्र राजनीति से राज्य आंदोलन और जन सरोकारों तक: उत्तराखंड के विकास में अमिट छाप छोड़ रहे प्रखर नेता एवं दर्जा राज्य मंत्री मोहन पाठक
हल्द्वानी । उत्तराखंड की धरती वीर सपूतों और आंदोलनकारियों की भूमि रही है, जिन्होंने अपने स्वार्थों को त्यागकर समाज और राज्य के नवनिर्माण में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इन्हीं महान विभूतियों में एक प्रखर नाम भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहन पाठक का है। वर्तमान में उत्तराखंड सरकार में दर्जा राज्य मंत्री की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे मोहन पाठक न केवल एक कुशल व दूरदर्शी राजनीतिज्ञ हैं, बल्कि वे उच्च मानवीय गुणों की एक अद्भुत मिसाल भी हैं। कृषक पृष्ठभूमि से आने वाले और समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर तक उच्च शिक्षा प्राप्त मोहन पाठक का संपूर्ण जीवन जन-संघर्षों, छात्र राजनीति, राज्य आंदोलन और जन-सरोकारों को समर्पित रहा है, जिसकी विस्तृत झलक उनके व्यक्तिगत परिचय में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। पिता श्री हरगोबिंद पाठक के संस्कारों को आत्मसात कर 24 नवंबर 1969 को जन्मे मोहन पाठक ने सदैव समाज के वंचित और युवा वर्ग के हक की लड़ाई को अपना मुख्य ध्येय बनाया है। अपनी सहज सरलता, सहृदयता और हर वर्ग के सुख-दुख में सदैव तत्पर रहने की अनूठी कार्यशैली के कारण ही आज क्षेत्र की जनता के बीच उनकी बेहद गहरी पैठ है।
उनकी नेतृत्व क्षमता की शुरुआत छात्र राजनीति के सुनहरे दौर से हुई, जब उन्होंने वर्ष 1992-93 में कुमाऊँ विश्वविद्यालय के अंतर्गत प्रतिष्ठित एम.बी.जी.पी.जी. कॉलेज हल्द्वानी के छात्रसंघ उपाध्यक्ष के रूप में छात्र राजनीति में कदम रखा। इसके बाद युवाओं के बीच उनकी बढ़ती लोकप्रियता और जन-आकर्षण के चलते वे वर्ष 1994-95 में इसी महाविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए और वर्ष 1997-98 में उन्होंने पूरे कुमाऊँ विश्वविद्यालय छात्र महासंघ के अध्यक्ष पद का दायित्व संभालकर छात्र राजनीति को एक नई दिशा दी। छात्रसंघ अध्यक्ष के पद पर रहते हुए उन्होंने अपनी राजनैतिक कुशलता का परिचय दिया और तत्कालीन महामहिम राज्यपाल उत्तर प्रदेश श्री मोतीलाल वोरा जी से राजकीय कन्या महाविद्यालय हल्द्वानी की ऐतिहासिक स्वीकृति दिलाकर क्षेत्र की बेटियों के लिए उच्च शिक्षा के द्वार खोले।
उत्तराखंड पृथक राज्य आंदोलन में मोहन पाठक का योगदान स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने योग्य है। राज्य की मांग को लेकर उन्होंने जो साहस दिखाया, उसने तत्कालीन सरकारों को हिलाकर रख दिया था। पृथक राज्य की मांग को बुलंद करने के लिए उन्होंने 19 अगस्त 1994 को उत्तर प्रदेश विधानसभा लखनऊ की दर्शक दीर्घा से पर्चे फेंके। यही नहीं, उनका ऐतिहासिक और सबसे साहसिक कदम 24 अगस्त 1994 को देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय संसद की दर्शक दीर्घा से सीधे नीचे कूदकर पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया। इस दुस्साहसिक और राष्ट्रव्यापी ध्यान खींचने वाले कदम के कारण उन्हें दो दिनों तक दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद रहकर कठोर यातनाएं सहनी पड़ीं। इसके अलावा राज्य आंदोलन के दौरान वे 48 दिनों तक हल्द्वानी कारागार में भी बंद रहे। उन्होंने उत्तराखंड में पूर्ण सचिवालय (नैनीताल) की स्थापना हेतु 19 दिसंबर 1995 से 10 फरवरी 1996 तक लगातार 53 दिनों का ऐतिहासिक धरना प्रदर्शन कर अद्वितीय सफलता अर्जित की थी।
राज्य निर्माण के पश्चात भी मोहन पाठक शांत नहीं बैठे और उन्होंने युवाओं के रोजगार व व्यवस्था परिवर्तन के लिए ऐतिहासिक संघर्ष किए। राज्य गठन के बाद उन्होंने बी.एड. पास अभ्यर्थियों के भविष्य के लिए लगातार 148 दिनों तक महा-धरना प्रदर्शन किया, जिसके सुखद परिणाम स्वरूप सरकार को विशिष्ट बी.टी.सी. हेतु शासनादेश (जी.ओ.) लागू करना पड़ा। इस ऐतिहासिक निर्णय के चलते आज राज्य के 1,00,000 से अधिक बी.एड. पास युवक और महिलाओं को प्राथमिक विद्यालयों में सरकारी रोजगार प्राप्त हो रहा है। इसी प्रकार, सिडकुल में स्थानीय युवाओं को रोजगार का हक दिलाने के लिए उन्होंने 13 महीने और 26 दिन का ऐतिहासिक धरना, क्रमिक अनशन व आमरण अनशन किया, जिससे मजबूर होकर तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित नारायण दत्त तिवारी को सिडकुल में स्थानीय युवाओं के लिए 70 प्रतिशत रोजगार का ऐतिहासिक शासनादेश जारी करना पड़ा, जिससे आज हजारों स्थानीय युवा आत्मनिर्भर बन रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने निजी बी.एड. कॉलेजों में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और अराजकता के खिलाफ कमिश्नरी नैनीताल में 374 दिनों का बेमिसाल धरना प्रदर्शन किया, जिसके फलस्वरूप बी.एड. कौन कराएगा, यह तय करने का सर्वाधिकार कुमाऊँ विश्वविद्यालय को प्राप्त हुआ।
जनता के स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के लिए लड़ना मोहन पाठक के स्वभाव में शामिल रहा है। कुमाऊँ मंडल की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने और क्षेत्र में एम्स की स्थापना के लिए उन्होंने कुमाऊँ के लगभग समस्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, आयुर्वेदिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला चिकित्सालयों में स्थानीय जनता के साथ मिलकर प्रत्येक जगह एक-दिवसीय धरना प्रदर्शन का सिलसिला लगातार डेढ़ वर्ष तक चलाया। इसी जन-आंदोलन का परिणाम रहा कि क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था में व्यापक सुधार हुआ और अंततः किच्छा (ऊधमसिंह नगर) में एम्स की सैटेलाइट व्यवस्था की ऐतिहासिक घोषणा हुई।
वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने हल्द्वानी विधानसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़कर 10 हजार से अधिक क्षेत्रवासियों का आशीर्वाद और वोट प्राप्त किए, जो उनकी मजबूत जन-पकड़ को दर्शाता है। वर्तमान में वैश्विक स्तर पर हो रहे देश के परिवर्तन और विकास की मुख्यधारा से जुड़ते हुए उन्होंने वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पूर्व पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की और भाजपा प्रत्याशियों को प्रचंड बहुमत से जिताने के लिए जी-जान से कार्य किया। वर्तमान समय में वे भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य और उत्तराखंड सरकार में दर्जा राज्य मंत्री के रूप में पूरी निष्ठा, ईमानदारी, अद्वितीय मानवीय संवेदनाओं और अटूट सेवाभाव के साथ संगठन व देवभूमि की जनता के कल्याण के लिए निरंतर सक्रिय हैं। आम जनता से सीधा संवाद और उनके कल्याण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के कारण वे सचमुच लोक-नायक के रूप में उभर कर सामने आए हैं और उनका यह संघर्षशील जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आदर्श है
लेटैस्ट न्यूज़ अपडेट पाने हेतु -
👉 वॉट्स्ऐप पर हमारे समाचार ग्रुप से जुड़ें
