आए दिन पहियों पर कैद होती जिंदगी: कैंची धाम की बेकाबू होड़ में कब तक सिसकेगी कुमाऊं की जीवनरेखा?

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 हल्द्वानी / काठगोदाम

देवभूमि की शांत वादियों में स्थित बाबा नीम करौली महाराज का पावन कैंची धाम समूचे विश्व के लिए अगाध श्रद्धा, आत्मिक शांति और मानवता का पावन केंद्र है। बाबाजी का दर हमेशा त्याग, सेवा और संयम का संदेश देता रहा है। किंतु विडंबना यह है कि आज उसी पावन धाम के नाम पर उमड़ने वाली अनियंत्रित भीड़ और प्रशासनिक नाकारापन के चलते कुमाऊं की जीवनरेखा आए दिन बंधक बन रही है। 2 अक्टूबर की छुट्टी हो या कोई भी सामान्य सप्ताहांत, आस्था की अंधी होड़ में यह समस्या अब किसी एक दिन का इत्तेफाक नहीं, बल्कि पहाड़ के बाशिंदों के लिए हर हफ्ते दोहराई जाने वाली एक त्रासद दिनचर्या बन चुकी है।

तराई के मुहाने पर दैनिक दुश्वारियां: जब घर लौटना ही जंग बन जाए

हल्द्वानी और काठगोदाम, जिन्हें कभी पहाड़ का सुगम प्रवेश द्वार कहा जाता था, अब अक्सर खुली जेल में तब्दील नजर आते हैं। शाम ढलते ही जब मैदानों से आने वाले वाहनों का रेला उमड़ता है, तो स्थानीय जनजीवन पूरी तरह ठहर जाता है।

  • थमे पहिए, टूटे सब्र के बांध: हल्द्वानी बाजार में अपनी रोजमर्रा की रोजी-रोटी कमाने आए काठगोदाम और रानीबाग के स्थानीय निवासियों को अपने ही घर लौटने के लिए घंटों सड़कों पर बेबस खड़ा रहना पड़ता है।
  • चालकों की बेबसी: थ्री-व्हीलर और टेंपो चालकों ने अब हाथ खड़े करना शुरू कर दिया है। उनका साफ कहना होता है—“शीशमहल से आगे पैर रखने की जगह नहीं है, गाड़ियां हिल नहीं रहीं; जहां जाम मिलेगा, वहीं उतार देंगे।”
  • पैदल चलना भी दूभर: स्कूल से लौटते बच्चे, दफ्तरों से निकलते कर्मचारी और बीमार बुजुर्ग घंटों चौराहों पर खड़े रहने को मजबूर हैं।
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सैकड़ों किलोमीटर तक हाहाकार: सात पहाड़ी जनपदों की सांसें अटकीं

यह जाम केवल काठगोदाम या हल्द्वानी की सीमा तक सीमित नहीं रहता। राष्ट्रीय राजमार्ग-109 के अवरुद्ध होते ही समूचे कुमाऊं मंडल के पर्वतीय जिलों का संपर्क देश-दुनिया से कट जाता है।

अल्मोड़ा, रानीखेत, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और बेरीनाग जाने वाले मुसाफिर अक्सर मीलों लंबे जाम में भूखे-प्यासे फंसे रहते हैं। पहाड़ का यह मुख्य संकरा मार्ग जब घंटों के लिए एक विशालकाय पार्किंग लॉट में बदलता है, तो सबसे दर्दनाक मंजर एंबुलेंस में दिखता है। उच्च हिमालयी और दूरस्थ क्षेत्रों से गंभीर मरीजों को लेकर हल्द्वानी के सुशीला तिवारी अस्पताल की ओर दौड़ने वाले आपातकालीन वाहन सायरन बजाते-बजाते वहीं दम तोड़ने लगते हैं। चंद घंटों का सफर चौदह से सोलह घंटे की मानसिक प्रताड़ना में बदल जाता है।

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बाबाजी का पावन संदेश बनाम सड़क पर बेलगाम हठधर्मिता

नीम करौली बाबा महाराज ने हमेशा दूसरों के सुख में सुख और परोपकार में ही प्रभु की प्राप्ति का मार्ग दिखाया। उनका दरबार कभी यह अनुमति नहीं देता कि किसी की राह रोककर, किसी लाचार की सांसें अटकाकर या पूरे पहाड़ के जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर पूजा की जाए।

किंतु सोशल मीडिया के दिखावे और रील संस्कृति के इस दौर में दर्शन की ऐसी बेलगाम होड़ मची है कि लेन अनुशासन, यातायात नियम और नागरिक कर्तव्य पूरी तरह हवा में उड़ा दिए जाते हैं। जब एक-दूसरे से आगे निकलने के चक्कर में आड़े-तिरछे वाहन खड़े कर पूरे हाईवे को सील कर दिया जाता है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ऐसी मनमानी और दूसरों को दी गई असह्य पीड़ा कभी ईश्वर को स्वीकार्य हो सकती है?

मूकदर्शक व्यवस्था: क्या जनता के सड़क पर उतरने का इंतजार है?

जनता का सबसे बड़ा आक्रोश इस बात को लेकर है कि जब यह संकट ‘आए दिन’ की हकीकत बन चुका है, तो शासन और प्रशासन हर बार हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठा रहता है?

  1. स्थाई समाधान की अनदेखी: हर बार जाम लगने पर केवल खानापूर्ति के लिए कुछ सिपाहियों को सड़क पर उतार दिया जाता है, जबकि काठगोदाम और गौलापार से आगे निजी वाहनों के कड़े नियमन और अनिवार्य शटल सेवा पर कोई ठोस नीति नहीं बनती।
  2. कैपेसिटी का निर्धारण न होना: जब संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में वाहनों की धारण क्षमता (Carrying Capacity) तय करने की वैज्ञानिक जरूरत है, तब असीमित गाड़ियों को सीधे घाटी में प्रवेश क्यों दिया जा रहा है?
  3. स्थानीय अधिकारों का हनन: क्या धार्मिक पर्यटन की आड़ में पहाड़ के मूल निवासियों के आवागमन, स्वास्थ्य और दैनिक जीवन के मौलिक अधिकारों को कुचलने की खुली छूट दे दी गई है?
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पहाड़ का समाज अपनी सहनशीलता और शांत स्वभाव के लिए पहचाना जाता है, लेकिन जब अपने ही घर के आंगन में रोज-रोज बेबसी का यह घूंट पीना पड़े, तो सब्र की दीवारें दरकने लगती हैं। यदि सरकार और प्रशासन ने इस आए दिन की बदइंतजामी पर तुरंत नकेल नहीं कसी और दीर्घकालिक व्यवस्था लागू नहीं की, तो जनता का यह दबा हुआ दर्द बहुत जल्द सड़कों पर मुखर जनाक्रोश बनकर उभरेगा।

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