भक्ति और अध्यात्म की पावन त्रिवेणी: बेरीपड़ाव में सांसद अजय भट्ट ने लिया कथा व्यास मनोज कृष्ण जोशी से आशीर्वाद; नवधा भक्ति, प्रहलाद चरित्र व कृष्ण जन्मोत्सव से भावविभोर हुए श्रद्धालु
हल्द्वानी के बेरीपड़ाव स्थित ‘होटल उदय बाखई’ (निकट महालक्ष्मी मंदिर) में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा एवं शत चण्डी महायज्ञ के चौथे दिन वरिष्ठ जननेता एवं सांसद अजय भट्ट पहुंचे। उन्होंने व्यास पीठ पर विराजमान कथा व्यास पं. मनोज कृष्ण जोशी के दर्शन कर उनका पावन आशीर्वाद ग्रहण किया तथा कथा श्रवण कर आध्यात्मिक पुण्य लाभ अर्जित किया। इस धार्मिक आयोजन के आयोजक एवं निवेदक गोपाल गोस्वामी तथा नन्दन गोस्वामी ने सांसद का स्वागत व अभिनंदन किया। इस अवसर पर इन्द्र सिंह बिष्ट, लक्ष्मण खाती सहित क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालुओं व गणमान्य नागरिकों ने कथा श्रवण कर भक्ति का आनंद लिया।
व्यास पीठ से चौथे दिन की अमृतमयी कथा का विस्तृत सार
कथा के चौथे दिन व्यास पीठ से पं. मनोज कृष्ण जोशी ने श्रद्धालुओं को भक्ति रस की अविरल धारा में सराबोर करते हुए श्रीमद् भागवत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रसंगों का गूढ़ और मर्मस्पर्शी विवेचन किया:
- नवधा भक्ति की विस्तृत व्याख्या: व्यास जी ने माता शबरी और प्रहलाद के माध्यम से नवधा भक्ति के नौ सोपानों का सार समझाते हुए कहा कि प्रभु को पाने के नौ दिव्य मार्ग हैं—
- श्रवण: भगवान के गुण, लीला और नाम की कथा निष्ठापूर्वक सुनना।
- कीर्तन: प्रभु के पावन चरित्र और महिमा का गान करना।
- स्मरण: हर क्षण मन में परमात्मा के नाम व स्वरूप का ध्यान रखना।
- पादसेवन: संतों, माता-पिता और ईश्वर के चरणों की सेवा करना।
- अर्चन: निर्मल भाव से देव-पूजन और आराधना करना।
- वंदन: अहंकार शून्य होकर विनीत भाव से प्रभु को प्रणाम करना।
- दास्य: स्वयं को प्रभु का सेवक मानकर आज्ञापालन करना।
- सख्य: परमात्मा को अपना सच्चा मित्र, साथी व मार्गदर्शक मानना।
- आत्मनिवेदन: अपना सर्वस्व प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना।
व्यास जी ने स्पष्ट किया कि परमात्मा धन, वैभव या कुल से नहीं रीझते, वे केवल भक्त के निष्कपट भाव और समर्पण के भूखे हैं। इनमें से किसी एक भक्ति को भी सच्चे मन से जीवन में उतार लिया जाए, तो मानव भवसागर पार हो जाता है।
- भक्त प्रहलाद का अडिग विश्वास व नृसिंह अवतार: प्रहलाद चरित्र का वर्णन करते हुए व्यास जी ने कहा कि आस्था जब अडिग होती है, तो भगवान को भक्त की लाज रखने के लिए प्रकट होना ही पड़ता है। हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद पर अनेक अत्याचार किए—उन्हें विष पिलाया गया, अग्नि में बिठाया गया और पहाड़ से फेंका गया, किंतु हरि-स्मरण में लीन प्रहलाद का बाल भी बांका न हो सका। जब अहंकारी हिरण्यकश्यप ने पूछा कि ‘कहाँ है तेरा भगवान?’, तो प्रहलाद ने निर्भय होकर कहा कि ‘प्रभु सर्वत्र हैं, इस खंभे में भी हैं।’ भक्त की वाणी को सत्य करने के लिए भगवान ने खंभा फाड़कर नृसिंह रूप में अवतार लिया और अधर्म व अत्याचार का अंत किया। यह प्रसंग सिखाता है कि विपत्ति कितनी भी विकट हो, सत्य और धर्म का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
- वामन चरित्र व अहंकार का विसर्जन: इसके उपरांत व्यास जी ने राजा बलि और भगवान वामन के प्रसंग की कथा सुनाते हुए बताया कि दान और धर्म का अहंकार भी पतन का कारण बन जाता है। भगवान ने तीन पग भूमि मांगकर बलि का सारा अहंकार समाप्त किया और अंततः उसकी निष्काम भक्ति को देखकर स्वयं उसके द्वारपाल बन गए।
- श्रीकृष्ण जन्मोत्सव व नंदोत्सव का दिव्य उल्लास: चौथे दिन के समापन चरण में जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन प्रसंग आया, पूरा पंडाल “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयकारों से गूंज उठा। माखनचोर के प्राकट्य की मनमोहक झांकी के दर्शन कर इन्द्र सिंह बिष्ट, लक्ष्मण खाती सहित उपस्थित सैकड़ों भक्त भावविभोर होकर भक्ति रस में झूम उठे।
शत चण्डी व भागवत कथा पर सांसद अजय भट्ट के विचार
कथा श्रवण के उपरांत सांसद अजय भट्ट ने कहा:
“श्रीमद् भागवत कथा और शत चण्डी महायज्ञ का यह संयुक्त अनुष्ठान सनातन परंपरा का गौरव और समूचे क्षेत्र के लिए सौभाग्य का विषय है। एक ओर जहां शत चण्डी महायज्ञ के वैदिक मंत्रोच्चार, चण्डी पाठ और पावन आहुतियों से वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है तथा क्षेत्र और राष्ट्र में सुख-शांति व सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त होता है; वहीं दूसरी ओर श्रीमद् भागवत कथा मनुष्य को आंतरिक शांति, धर्म, सदाचार और कर्तव्यबोध की सीख देती है। भागवत कथा केवल कानों से सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में धारण करने की संजीवनी है। बेरीपड़ाव की इस पावन भूमि पर आयोजक गोपाल गोस्वामी एवं नन्दन गोस्वामी द्वारा कराया जा रहा यह देवकार्य समाज में समरसता और सनातन संस्कारों को सशक्त करेगा। इन्द्र सिंह बिष्ट, लक्ष्मण खाती व यहाँ उपस्थित सभी मातृशक्ति व श्रद्धालुजन इस पुण्य फल के भागीदार हैं।”
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