रहस्यमयी कुर्मांचल: आखिर लंका से उड़कर हिमालय की इस चोटी पर क्यों गिरा था कुंभकर्ण का सिर?

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चम्पावत (उत्तराखंड)। देवभूमि उत्तराखंड के कुर्मांचल पर्वत की वादियां सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य का केंद्र नहीं हैं, बल्कि अपने भीतर त्रेता और द्वापर युग के ऐसे अलौकिक रहस्य समेटे हुए हैं जो किसी को भी हैरत में डाल दें। क्या आप जानते हैं कि लंका में भगवान श्रीराम के हाथों मारे गए महाबली कुंभकर्ण के सिर और महाभारत युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए भीम पुत्र घटोत्कच के मोक्ष का सीधा नाता चम्पावत के पावन तीर्थों से है?
कुंभकर्ण का सिर और शिव का वरदान
स्कंद पुराण के मानस खंड के अनुसार, लंकापति रावण के भाई कुंभकर्ण ने बाल्यकाल में 17 वर्षों तक भगवान शिव की कठोर तपस्या कर यह दुर्लभ वरदान मांगा था कि मृत्यु के समय उसका सिर लंका में न गिरकर सीधे भगवान शिव के परम धाम में जलमग्न स्थान पर गिरे। जब प्रभु श्रीराम ने कुंभकर्ण का वध किया, तो महादेव के वरदान का मान रखते हुए पवनपुत्र हनुमान कुंभकर्ण के विशाल शीश को लेकर कुर्मांचल पर्वत पर पहुंचे। शीश के गिरते ही वह स्थान एक पावन सरोवर में बदल गया और महाबली को परम शांति प्राप्त हुई।
द्वापर युग में जब भटके घटोत्कच की आत्मा पहुंची कुर्मांचल
महाभारत युद्ध के बाद घटोत्कच की भटकती आत्मा ने पिता भीम के स्वप्न में आकर कुर्मांचल भूमि पर मुक्ति दिलाने की गुहार लगाई। भीम ने यहां आकर भगवान ऋषेश्वर महादेव की घोर आराधना की, जिससे प्रसन्न होकर मां अखिलतारिणी प्रकट हुईं। देवी के वरदान से भीम ने अपनी गदा से कुंभकर्ण के शीश के गण्डस्थल को खंडित किया, जिससे गण्डकी नदी की जलधारा फूट पड़ी। इसी संगम पर घटोत्कच को मोक्ष मिला। आज भी चम्पावत मुख्यालय से दो किलोमीटर दूर घटोत्कच और उनकी माता हिडिम्बा का जाग्रत मंदिर श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी करता है।
तप, बल और मोक्ष की त्रिवेणी: ऋषेश्वर महादेव
भगवान विष्णु के कूर्म (कछुआ) अवतार के पदचिह्नों से अंकित यह भूमि महर्षि वशिष्ठ और सप्तऋषियों की भी तपोभूमि रही है। वानरराज बाली ने भी यहीं शिव साधना कर अतुलनीय बल अर्जित किया था, जिसका साक्षी ऐतिहासिक बालेश्वर मंदिर है।
लोहाघाट में लोहावती नदी के पावन तट पर स्थित ऋषेश्वर महादेव का दर्शन अश्वमेघ यज्ञ के समान फलदायी माना जाता है। प्राचीन काल में कैलाश मानसरोवर यात्रा का प्रथम पड़ाव यही देवालय हुआ करता था, जहां यात्री लोहावती में स्नान कर भगवान ऋषेश्वर का आशीर्वाद लेते थे।
घने जंगलों के बीच 12 गांवों के आराध्य रहे इस पावन शिवलिंग स्थल को 1960 में 108 श्री बालक बाबा जी ने नदी तक सीढ़ियां बनवाकर सुगम किया। इसके बाद 1970 में श्री 108 बाबा हीरानंद जी की प्रेरणा से यहां विशाल धर्मशाला और राम, लक्ष्मण, काली, हनुमान, भैरव सहित अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण हुआ, जहां आज वर्ष भर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था उमड़ती है।