कुर्सी के पीछे छुपा ‘अदृश्य’ हुक्मरान!

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व्यंग्य
नशा शराब में होता तो नाचती बोतल जैसा विमर्श भले ही तार्किक आधार पर सत्य हो, मगर कुर्सी का नशा सिर्फ़ कुर्सी पर विराजमान व्यक्ति पर ही नहीं चढ़ता, उसके परिवार पर भी चढ़ता है। यह कोई नई बात नहीं है। सदियों से ऐसा प्रचलन में रहा है। यदि श्रीमान जी कलेक्टर हैं, तो श्रीमती जी कलेक्टरनी कहलाएँगी ही। स्कूल मास्टर की पत्नी को मुहल्ले भर में मास्टरनी की संज्ञा दी जाती है,भले ही उसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर हो। इसी प्रकार श्रीमान दरोग़ा जी की श्रीमती जी दरोगन का तमग़ा पाकर रौब जमाने से परहेज़ नहीं करती। जब से सरकार ने जन प्रतिनिधियों के चुनाव को महिला, सामान्य, दलित, पिछड़ा जैसी श्रेणियों में बाँटा है, तब से कुछ विशेष पद स्वतः ही सृजित हो गए हैं, मसलन प्रधान पति, प्रधान पुत्र, प्रधान प्रतिनिधि, सांसद पति, सांसद पुत्र, सांसद पत्नी, मंत्री पुत्र, मंत्री पति, मंत्री पत्नी , श्रीमान मुख्यमंत्री, श्रीमती मुख्यमंत्री और भी न जाने क्या क्या ।
बहरहाल कुर्सी पर अधिकार किसी का और अधिकारों की हनक किसी में। सुविधाओं पर भी पूरे परिवार का व्यक्तिगत अधिकार। गाड़ी सरकारी हो तो परिवार को प्रयोग करने का अधिकार स्वतः प्राप्त होगा ही। एक मुख्यमंत्री जी की श्रीमती जी को एक दिन न जाने क्या सूझी, एक महाविद्यालय का निरीक्षण करने पहुँच गई। मुख्यमंत्री जी की श्रीमती थी, सो हनक स्वाभाविक थी। वहाँ जाकर उन्होंने शिक्षा व्यवस्था का जायज़ा लिया। यह तो बात मुख्यमंत्री जी की श्रीमती जी की थी। अब ग्राम प्रधानों के परिजनों के जलवे भी देख लीजिए। एक सज्जन की माता श्री ग्राम प्रधान चुनी गई। उस ग्राम की, जिसमें न वह सशरीर रहती हैं, न उनका बेटा। गाँववासियों ने अपनी प्रधान की शक्ल भी नहीं देखी। उनके पुत्र ने चुनाव प्रचार किया, चुनाव जीतने के लिए जुगत भिड़ाई और माता श्री के हिस्से में प्रधानी आ गई। अब प्रधानी चलाने की जिम्मेदारी भी प्रधान पुत्र की हो गई। उसने ग्राम प्रधानी की आड़ में सरकारी ज़मीनों पर कब्जे करने शुरू कर दिए। लाखों रुपए जो चुनाव में खर्च किए थे, उस धन की वसूली शुरू कर दी । आपसी विवादों में दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर सरीखी भूमिका निभाई और अपनी कमाई बढ़ाई। यही हाल सभासद पुत्र, सभासद पति, सभासद प्रतिनिधियों का है। कुर्सी पर अधिकार किसी का और हनक उनके मुतबन्नों की ।
लोकतंत्र में यही अजीब तमाशा है। कुर्सी किसी के नाम पर और अधिकार सगे संबंधियों के हाथ में। सवाल उठता है कि यदि मुख्यमंत्री जी की श्रीमती जी को निरीक्षण करने दिशा निर्देश देने का अधिकार है, तो सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों, शिक्षकों, जन प्रतिनिधियों की पत्नियों को भी अपने पति के कार्यों में मदद करने का अधिकार क्यों नही होना चाहिए ? लोकतंत्र में परिवार व्यवस्था का सम्मान करना तो बनता है। मुख्यमंत्री जी की श्रीमती जी ने लोकतंत्र को नई राह दिखाई है, जिसे नज़ीर मान कर किसी भी अधिकारी, किसी संगठन के पदाधिकारी, किसी जन प्रतिनिधि के परिजनों को हनक में रहने और हनक के अनुसार औरों पर अपनी हनक आज़माने से रोका नही जाना चाहिए।

(सुधाकर आशावादी-विभूति फीचर्स)

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*(विभूति फीचर्स)*

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