सहारनपुर (विशेष संवाददाता)।
मध्यरात्रि के सन्नाटे में जब घड़ी की सुइयां तड़के ठीक तीन बजे का संकेत करती हैं, तो सहारनपुर के बृज विहार क्षेत्र में फैले 22 बीघा के विशाल प्रांगण में एक अलौकिक नीरवता छा जाती है। स्थानीय पुजारियों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दशकों पूर्व श्रावण मास की एक रात बंद गर्भगृह के भीतर अचानक घंटे-घड़ियालों, शंख और मंजीरों की गूंज सुनाई देने लगी थी। जब भय और विस्मय के बीच पट खोले गए, तो शिवलिंग का दिव्य श्रृंगार हो चुका था, ताजे पुष्प अर्पित थे और कपूर की थाल से सुगंधित लौ उठ रही थी। जनमानस में यह विश्वास आज भी सुदृढ़ है कि रात के तीसरे पहर स्वयं देवगण यहाँ महादेव की गुप्त आराधना करने आते हैं। कई संतों ने इस प्रांगण में दिव्य योगियों की सूक्ष्म उपस्थिति की भी अनुभूति की है।
महाभारत कालीन तपोभूमि और पांडवों का विजय वरदान
इस पावन तीर्थ का इतिहास द्वापर युग से जुड़ा हुआ है। अज्ञातवास के कठिन कालखंड में जब पांडव हिंडन और पांवधोई नदियों के मध्य स्थित इस सघन अरण्य में पहुंचे, तब उन्होंने शक्ति, संबल और धर्मयुद्ध में विजय की कामना से देवाधिदेव महादेव की घोर तपस्या की थी। लोकमान्यता है कि भगवान आशुतोष ने पांडवों की अनन्य निष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें साक्षात दर्शन दिए और धर्म की अंतिम विजय का अमोघ आशीर्वाद प्रदान किया। उस कालखंड की तपोऊर्जा आज भी इस धरा पर महसूस की जाती है।
संत भूतेश्वर नाथ और अष्टकोणीय शिवलिंग का प्राकट्य
समय के साथ यह तपोवन शताब्दियों तक एकांत साधना का केंद्र बना रहा। 17वीं शताब्दी के आसपास उच्च कोटि के सिद्ध तपस्वी संत भूतेश्वर नाथ ने यहाँ अपनी पर्णकुटी स्थापित की। खेतों और बीहड़ों के बीच संत निरंतर महादेव के ध्यान और धूनी में लीन रहते थे। उनकी गहन समाधि के उपरांत भूमि को भेदकर एक अत्यंत दुर्लभ अष्टकोणीय (षट्कोणीय) स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ। पाषाण के आठ कोणों वाला यह विग्रह ब्रह्मांड की आठ दिशाओं और अष्ट-मूर्तियों (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चंद्रमा और आत्मा) का प्रतीक माना गया। सिद्ध संत के नाम पर ही इस तीर्थ को “श्री भूतेश्वर महादेव” के रूप में ख्याति मिली।
मराठा स्थापत्य का वैभव, गुप्त शिखर और नागा संतों की साधना
शिवलिंग के प्राकट्य की सूचना जब तत्कालीन मराठा शासकों तक पहुंची, तो उन्होंने इस स्थान पर पाषाण मंदिर का भव्य निर्माण कराया। मंदिर की मुख्य विशेषता इसका ‘गुप्त शिखर’ है—जो वास्तुकला का ऐसा नायाब नमूना है जो बाहर से सहज दिखाई नहीं देता, किंतु गर्भगृह के भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा को केंद्रित रखता है। इसके बाद यह धाम जूना अखाड़े के नागा संन्यासियों और हठयोगियों की प्रमुख तपस्थली रहा। परिसर में निरंतर प्रज्वलित रहने वाली पुरातन धूनी और ’28-7-38 लाला बसेसर दयाल’ के शिलालेख वाला ऐतिहासिक कुआं इस समृद्ध परंपरा के जीवंत साक्षी हैं।
’40 दिनों का नियम’ और मनोकामना सिद्धि का विधान
सहारनपुर के पांच प्रमुख सिद्धपीठों में अग्रणी इस दरबार की सबसे चमत्कारी मान्यता ’40 दिनों का नियम’ है। श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि यदि कोई भक्त पूर्ण शुचिता और निष्ठा के साथ लगातार 40 दिनों तक यहाँ आकर प्रतिदिन शिवलिंग पर जलाभिषेक करता है और दीप प्रज्वलित करता है, तो उसके जीवन की सबसे बड़ी बाधा भी टल जाती है। मान्यता है कि 40 दिन पूरे होने से पूर्व ही भक्तों की मनोकामना पूर्ण होती है। श्रावण मास में हरिद्वार से गंगाजल लेकर आने वाले लाखों कांवड़ियों के आगमन से यह संपूर्ण 22 बीघा परिसर शिवभक्ति के रंग में रंग जाता है।
विरासत का संरक्षण और आधुनिक तीर्थ स्वरूप
धरोहर को अक्षुण्ण रखने के उद्देश्य से वर्ष 1972 में मंदिर समिति का गठन किया गया। मूल गर्भगृह और प्राचीन स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए वर्ष 1998 से व्यापक सौंदर्यीकरण कार्य कराया गया। वर्तमान में इस परिसर में भूतेश्वर महादेव के साथ-साथ नवग्रह वाटिका, श्रीराम-सीता, राधा-कृष्ण, माँ दुर्गा, माँ शारदा और संकटमोचन हनुमान जी के भव्य मंदिर भी स्थापित हैं।
श्रद्धालुओं के लिए उपयोगी विवरण
दर्शन समय: प्रातः काल 05:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक एवं सायं काल 04:00 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक।
दैनिक आरती: प्रातः 08:30 से 09:00 बजे एवं सायं 08:30 से 09:00 बजे।
स्थान: बृज विहार कॉलोनी, भूतेश्वर मंदिर मार्ग (धोबीघाट के समीप), सहारनपुर, उत्तर प्रदेश।
आवागमन सुविधा: सहारनपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन और मुख्य बस स्टैंड से मंदिर की दूरी मात्र कुछ ही मिनटों की है। स्टेशन व बस अड्डे से ई-रिक्शा, ऑटो और स्थानीय वाहन सुलभ रूप से उपलब्ध रहते हैं।
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