कैलाश यात्रा भाग दो: रहस्यमय हिमशिखरों का गुप्त आख्यान: जब साक्षात महादेव ने खोला मानसरोवर और कैलाश का परम सत्य

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रहस्यमय हिमशिखरों का गुप्त आख्यान: जब साक्षात महादेव ने खोला मानसरोवर और कैलाश का परम सत्य
सनातन संस्कृति के प्राचीन ग्रंथों में छिपे रहस्य हमेशा से ही मानव चेतना को चमत्कृत करते रहे हैं। स्कन्द पुराण के अंतर्गत मानसखण्ड के सातवें अध्याय से प्राप्त प्राचीन प्रतियों से एक ऐसा ही अलौकिक और रहस्यमयी विवरण सामने आता है। इस दिव्य कथा का आरंभ राजा जनमेजय और सूत जी के संवाद से होता है, जहाँ शिव-पार्वती विवाह की पावन कथा सुनने के बाद राजा के मन में हिमालय के पुनीत चरित्र को गहराई से जानने की तीव्र जिज्ञासा उत्पन्न होती है। सूत जी इस जिज्ञासा को शांत करते हुए वेदव्यास द्वारा वर्णित उस परम रहस्यमयी गाथा को सामने लाते हैं जो सामान्य मनुष्यों की बुद्धि से परे है।
इस दिव्य प्रवाह में आगे बढ़ते हुए प्राचीन पृष्ठों से पता चलता है कि महर्षि वेदव्यास ने हिमालय को केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि समस्त पापों को नष्ट करने वाली एक जीवित चेतना के रूप में चित्रित किया है। मान्यता है कि सूर्योदय के समय जैसे बर्फ पिघलती है, वैसे ही इस पावन पर्वतराज के दर्शन मात्र से मनुष्यों के करोड़ों जन्मों के पाप विलीन हो जाते हैं। इसी महिमा से आकर्षित होकर महान योगी दत्तात्रेय अपने पुराने निवास सह्याद्रि को छोड़कर इस अलौकिक भूमि की ओर खिंचे चले आए, जहाँ की सुवर्ण खानें, कस्तूरी मृग और भोजपत्र के वृक्ष एक रहस्यमयी वातावरण का निर्माण करते हैं।
जब योगीराज दत्तात्रेय का आगमन हुआ, तो साक्षात हिमालय ने स्वयं साकार रूप धारण कर उनका भव्य स्वागत किया। इस अद्भुत मिलन के दौरान दत्तात्रेय ने विन्ध्याचल सहित संसार के अन्य पर्वतों की तुलना में हिमालय को सर्वश्रेष्ठ बताया क्योंकि यहाँ स्वयं देवाधिदेव महादेव का साक्षात वास है। शिव जी और माता गिरिजा के विवाह की सूचना पाकर वे इस दिव्य क्षेत्र के गुप्त तीर्थों और शिवलिंगों के दर्शन के लिए आतुर थे।
इसके बाद का रहस्य और भी गहरा जाता है जब आख्यान के अनुसार पर्वतराज हिमालय ने दत्तात्रेय को ब्रह्मा जी की मानस सृष्टि के प्रतीक अलौकिक मानसरोवर के दर्शन कराए। इस मानसरोवर के मध्य में भगवान शिव का एक अत्यंत चमकदार सुवर्णमय लिंग स्थापित था, जहाँ भोलेनाथ स्वयं राजहंस का रूप धारण कर विचरण करते थे। इस क्षेत्र में साक्षात गंगा का अवतरण और देवताओं द्वारा रचित गुप्त गुफाओं का ऐसा रहस्यमयी जाल था, जिसे देखकर स्वयं दत्तात्रेय भी भावविभोर हो उठे।
इस अलौकिक यात्रा का चरमोत्कर्ष तब होता है जब योगी दत्तात्रेय कैलाश पर्वत पर साक्षात महादेव के सम्मुख पहुँचते हैं। इतिहास के इस पावन प्रसंग के अनुसार, दत्तात्रेय ने घनी जटाओं वाले नीलकंठ की ऐसी अद्भुत स्तुति की कि महादेव अत्यंत प्रसन्न हो गए और उन्हें मनचाहा वरदान मांगने को कहा। दत्तात्रेय ने वर रूप में यह अनूठी शक्ति मांगी कि संपूर्ण पृथ्वी उनके लिए कभी भी अगम्य न रहे।
परंतु इस आख्यान का सबसे बड़ा रहस्य तब उजागर होता है जब स्वयं भगवान शंकर दत्तात्रेय के संशयों का निवारण करते हैं। इन दिव्य संवादों से स्पष्ट होता है कि महादेव ने स्वयं स्वीकार किया कि यद्यपि वे विन्ध्याचल में भी निवास करते हैं, परंतु हिमालय उनका सबसे प्रिय और अविनाशी धाम है जिसे उन्होंने तीनों कालों में कभी नहीं छोड़ा। इसके उत्तर भाग में स्थित नन्द-पर्वत पर स्वयं ब्रह्मा और विष्णु उनकी आराधना करते हैं।
महादेव की आज्ञा पाकर दत्तात्रेय ने उन गुप्त मार्गों का अनुसरण किया जो सीधे केदारमंडल और बदरिकाश्रम की ओर जाते थे। ग्रंथ के विवरण के अनुसार, उन्होंने जामुन के विशाल वृक्षों से घिरे सरोवर, नर-नारायण पर्वत और मंदाकिनी के पावन जल का स्पर्श कर अद्वितीय शांति प्राप्त की।
अंततः, इस परम रहस्यमयी और गोपनीय ज्ञान को अपने भीतर समेटकर योगी दत्तात्रेय पुनः काशी नगरी लौट आए, जैसा कि इस अध्याय के समापन भाग में अंकित है। स्कन्द पुराण का यह सातवां अध्याय आज भी उन साधकों के लिए एक गुप्त मार्गदर्शिका है जो हिमालय के भौतिक स्वरूप के पीछे छिपी आध्यात्मिक ऊर्जा को खोजना चाहते हैं।